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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Budaun News ›   Even before the second of seven people Lives lost in the provinces

पहले भी सात लोगों की दूसरे प्रांतों में खत्म हो चुकी जिंदगी

Thu, 21 May 2015 07:22 PM IST
Dataganj
Dataganj Updated Thu, 21 May 2015 07:22 PM IST
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गुजरात को मजदूरी करने जाते वक्त तीन लड़कों की यमुना में डूब जाने के हादसे ने मनरेगा की सच्चाई उजागर कर दी है। इस योजना के तहत काम नहीं मिलने के कारण ही मजबूरी में क्षेत्र के लोग मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं। इससे पहले भी क्षेत्र के दो गांवों के सात लोगों की मजदूरी के दौरान दूसरे स्थानों पर मौत हो चुकी है।

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शायद यमुना में डूबकर मरे लड़कों के परिवारीजनों ने एक पल को भी यह नहीं सोचा होगा कि उनके लाड़ले अब कभी घर नहीं लौट पाएंगे। जो खबर आएगी उनके पैरों तले जमीन ही खिसका देगी। तीन लड़कों की मौत की खबर के बाद से परिवारीजन बेहद चिंतिंत हैं, जिनके घर के सदस्य बाहर मजदूरी करने गए हैं। इस हादसे से पहले भी क्षेत्र के दो गांवों के सात लोग मजदूरी करते समय अपनी जान गंवा चुके हैं। कोतवाली क्षेत्र के गांव कुनिया रायपुर के कई लोग छह-सात साल पहले मजदूरी करने उत्तराखंड के जिला उधमसिंहनगर के कस्बा किच्छा में गए थे। वो सभी मजदूर रेता छानने का काम करते थे, जिस समय वह रेते से भरे ट्रक पर सवार थे, तभी ट्रक पलट गया था। इस दुर्घटना में कुनियारायपुर निवासी हरीओम, जगदीश और रामदास की मौत हो गई थी। इसके अलावा चार साल पहले थाना हजरतपुर क्षेत्र के गांव बमनपुरा निवासी ब्रह्मानंद, टुई लाल, रामबहादुर और उसके भाई नन्हूं की बाहर मजदूरी करते समय एक ट्रक हादसे में मौत हो गई थी।
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गांव कुनियारायपुर निवासी प्रमोद, हरीशंकर, दिनेश, बबलू, रामू और वीरेंद्र का कहना है कि उन्हें यहां काम नहीं मिलेगा, तो वह बच्चों को कैसे पालेंगे?  मरें या जिएं मजदूरी को उन्हें बाहर ही जाना पड़ेगा। इन लोगों ने मनरेगा की हकीकत को भी बयां किया। बोले, उन सभी के पास मनरेगा के जॉब कार्ड हैं किंतु बीते एक साल में उन्हें मात्र छह दिन ही काम मिला। उसके भी समय से पैसे नहीं मिले। इस स्थिति में वह कैसे परिवार का पालन-पोषण कर सकेंगे? इसी तरह गांव बमनपुरा के लोगों ने कहा कि पहले तो मनरेगा में उन्हें काम नहीं मिलता। यदि काम मिल भी जाए तो छह-छह माह पैसे नहीं मिलते। ऐसे में मजबूरन लोगों को बाहर मजदूरी करने जाना पड़ता है। लोगों का कहना है यदि मनरेगा के तहत उन्हें काम मिलता रहे, तो क्यों उन्हें बाहर जाना पड़े।
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