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Budaun News: जिला अस्पताल का ओएसटी सेंटर बदल रहा जिंदगी
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बदायूं। जिले में नशे की बढ़ती समस्या के बीच जिला अस्पताल का ओएसटी (ओपिऑयड सब्सटीट्यूशन थेरेपी) सेंटर नशा मुक्ति की दिशा में उम्मीद की किरण बनकर उभरा है। वर्ष 2024 से संचालित इस केंद्र में अब तक 294 लोगों का पंजीकरण किया जा चुका है, जिनमें से वर्तमान में 204 मरीजों का उपचार चल रहा है।
जिले में नशे की गिरफ्त में आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी गंभीर होती जा रही हैं। ऐसे में ओएसटी सेंटर पर मरीजों को नियंत्रित दवाओं, काउंसलिंग और नियमित निगरानी के माध्यम से धीरे-धीरे नशे से दूर किया जा रहा है। इस प्रक्रिया से मरीजों की निर्भरता कम होती है और वे सामान्य जीवन की ओर लौटने लगते हैं।
सेंटर पर आने वाले अधिकांश मरीज 20 से 40 वर्ष आयु वर्ग के हैं, जो नशे की आदत के कारण परिवार और समाज से कटते जा रहे थे। यहां उन्हें न केवल दवाएं दी जाती हैं, बल्कि मानसिक सहयोग भी प्रदान किया जाता है, ताकि वे दोबारा नशे की ओर न लौटें। जांच के दौरान एक चिंताजनक तथ्य भी सामने आया है।
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सेंटर पर पंजीकृत मरीजों की स्क्रीनिंग में पांच लोगों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. शिव मोहन कमल के अनुसार, नशे के दौरान असुरक्षित तरीकों के इस्तेमाल से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों को विशेष उपचार और परामर्श उपलब्ध कराया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि समय पर इलाज और जागरूकता के जरिए नशे की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। यह सेंटर न केवल मरीजों को नई जिंदगी दे रहा है, बल्कि समाज को नशा मुक्त बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (संवाद)
बीड़ी-तंबाकू के भी पहुंच रहे मरीज
ओएसटी सेंटर पर केवल गंभीर नशे के आदी ही नहीं, बल्कि बीड़ी और तंबाकू के सेवन करने वाले भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। रोजाना करीब 100 से 120 मरीज इस श्रेणी के आते हैं। डॉक्टर और स्टाफ उनकी काउंसलिंग करते हैं और नशा छोड़ने के लिए दवाएं भी उपलब्ध कराते हैं। नियमित दवा लेने वाले मरीजों को इसका लाभ भी मिल रहा है। खास बात यह है कि सेंटर पर आने वाले मरीजों में लगभग 30 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं, जो इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है।
इस वर्ष जनवरी से मार्च तक 60 नए मरीज बढ़े
जिले में नशे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, खासकर युवाओं में इसका असर अधिक देखा जा रहा है। ओएसटी सेंटर के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष जनवरी से मार्च तक 60 नए मरीज बढ़े हैं। हर वर्ष नए मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेरोजगारी, गलत संगत और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। नशे की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, साथ ही पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। ऐसे में समय रहते रोकथाम, उपचार और जनजागरूकता बेहद जरूरी हो गई है।
इलाज से सामान्य हो जाते हैं मरीज
सहसवान का एक युवक ट्रामाडोल इंजेक्शन का आदी हो गया था। दिन में कई बार इंजेक्शन लगाता था। हालत गंभीर होने पर उसे गाजियाबाद रेफर किया गया, जहां अब सुधार है। सिविल लाइंस क्षेत्र का एक व्यक्ति स्मैक पर हर माह 25-30 हजार रुपये तक खर्च कर देता था। पत्नी के प्रयास से सेंटर पहुंचने के बाद उसने नशा छोड़ दिया। वहीं दातागंज क्षेत्र का एक व्यक्ति शराब की लत के कारण लोगों से बातचीत तक बंद कर चुका था, लेकिन इलाज के बाद अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।
नशा मुक्ति में केवल दवाएं ही पर्याप्त नहीं होतीं। काउंसलिंग के माध्यम से मरीजों की मानसिक स्थिति को समझकर उन्हें नशा छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। डॉक्टर और काउंसलर की टीम मरीजों से नियमित संवाद करती है। साथ ही परिवार के सदस्यों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, ताकि मरीज को घर पर भी सहयोग मिल सके और वह पूरी तरह सामान्य जीवन में लौट सके। - डॉ. शिव मोहन कमल, वरिष्ठ फिजिशियन, नशा मुक्ति उपचार केंद्र
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जिले में नशे की गिरफ्त में आने वाले लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां भी गंभीर होती जा रही हैं। ऐसे में ओएसटी सेंटर पर मरीजों को नियंत्रित दवाओं, काउंसलिंग और नियमित निगरानी के माध्यम से धीरे-धीरे नशे से दूर किया जा रहा है। इस प्रक्रिया से मरीजों की निर्भरता कम होती है और वे सामान्य जीवन की ओर लौटने लगते हैं।
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सेंटर पर आने वाले अधिकांश मरीज 20 से 40 वर्ष आयु वर्ग के हैं, जो नशे की आदत के कारण परिवार और समाज से कटते जा रहे थे। यहां उन्हें न केवल दवाएं दी जाती हैं, बल्कि मानसिक सहयोग भी प्रदान किया जाता है, ताकि वे दोबारा नशे की ओर न लौटें। जांच के दौरान एक चिंताजनक तथ्य भी सामने आया है।
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सेंटर पर पंजीकृत मरीजों की स्क्रीनिंग में पांच लोगों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई है। जिला अस्पताल के वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. शिव मोहन कमल के अनुसार, नशे के दौरान असुरक्षित तरीकों के इस्तेमाल से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे मरीजों को विशेष उपचार और परामर्श उपलब्ध कराया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि समय पर इलाज और जागरूकता के जरिए नशे की समस्या पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। यह सेंटर न केवल मरीजों को नई जिंदगी दे रहा है, बल्कि समाज को नशा मुक्त बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। (संवाद)
बीड़ी-तंबाकू के भी पहुंच रहे मरीज
ओएसटी सेंटर पर केवल गंभीर नशे के आदी ही नहीं, बल्कि बीड़ी और तंबाकू के सेवन करने वाले भी बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। रोजाना करीब 100 से 120 मरीज इस श्रेणी के आते हैं। डॉक्टर और स्टाफ उनकी काउंसलिंग करते हैं और नशा छोड़ने के लिए दवाएं भी उपलब्ध कराते हैं। नियमित दवा लेने वाले मरीजों को इसका लाभ भी मिल रहा है। खास बात यह है कि सेंटर पर आने वाले मरीजों में लगभग 30 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं, जो इस समस्या की व्यापकता को दर्शाता है।
इस वर्ष जनवरी से मार्च तक 60 नए मरीज बढ़े
जिले में नशे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है, खासकर युवाओं में इसका असर अधिक देखा जा रहा है। ओएसटी सेंटर के आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष जनवरी से मार्च तक 60 नए मरीज बढ़े हैं। हर वर्ष नए मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बेरोजगारी, गलत संगत और जागरूकता की कमी इसके प्रमुख कारण हैं। नशे की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है, साथ ही पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। ऐसे में समय रहते रोकथाम, उपचार और जनजागरूकता बेहद जरूरी हो गई है।
इलाज से सामान्य हो जाते हैं मरीज
सहसवान का एक युवक ट्रामाडोल इंजेक्शन का आदी हो गया था। दिन में कई बार इंजेक्शन लगाता था। हालत गंभीर होने पर उसे गाजियाबाद रेफर किया गया, जहां अब सुधार है। सिविल लाइंस क्षेत्र का एक व्यक्ति स्मैक पर हर माह 25-30 हजार रुपये तक खर्च कर देता था। पत्नी के प्रयास से सेंटर पहुंचने के बाद उसने नशा छोड़ दिया। वहीं दातागंज क्षेत्र का एक व्यक्ति शराब की लत के कारण लोगों से बातचीत तक बंद कर चुका था, लेकिन इलाज के बाद अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है।
नशा मुक्ति में केवल दवाएं ही पर्याप्त नहीं होतीं। काउंसलिंग के माध्यम से मरीजों की मानसिक स्थिति को समझकर उन्हें नशा छोड़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। डॉक्टर और काउंसलर की टीम मरीजों से नियमित संवाद करती है। साथ ही परिवार के सदस्यों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, ताकि मरीज को घर पर भी सहयोग मिल सके और वह पूरी तरह सामान्य जीवन में लौट सके। - डॉ. शिव मोहन कमल, वरिष्ठ फिजिशियन, नशा मुक्ति उपचार केंद्र