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Budaun News: कोयले पर युद्ध की मार, भाव 21 हजार रुपये टन के पार
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उझानी में ईंट- भट्ठे पर पड़ा कोयला। संवाद
उझानी। अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का असर कोयले पर भी पड़ता नजर आ रहा है। कीमतों में प्रति टन करीब चार हजार रुपये के उछाल के साथ भाव 21 हजार रुपये पार कर गया है। युद्ध के चलते दाम पांच हजार रुपये प्रति टन तक बढ़ चुके हैं।
भट्ठों पर ईंटें पकाने के लिए सरसों की तुर्री और लकड़ियों के अलावा अगर किसी अन्य चीज की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है तो वह कोयला है। युद्ध शुरू होने से पहले मय भाड़ा कोयले की कीमत प्रति टन करीब 17 हजार रुपये थी। कोयला आसानी से उपलब्ध हो रहा था, लेकिन जैसे ही युद्ध ने जोर पकड़ा, कोयले की कीमतों में उछाल आता गया।
इलाके के ईंट-भट्ठों पर पिछले सप्ताह 20 हजार रुपये प्रति टन कोयला आया था। दो दिन पहले ईंट-भट्ठा मालिकों ने कारोबारियों के जरिये संपर्क साधा तो अब उन्हें भाव 21 हजार रुपये प्रति टन बताया गया।
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कोयला झारखंड और ओडिशा से भी आता है, लेकिन उसकी गुणवत्ता ज्यादा अच्छी नहीं होने की वजह से ईंट-भट्ठा मालिक अमेरिका और इंडोनिशया से समुद्र के रास्ते पोर्ट पर पहुंचने वाले कोयले को तरजीह देते हैं। उसकी गुणवत्ता बेहतर बताई जाती है। ईंट पकाने में जिन भट्ठों पर कोयले और लकड़ी के अलावा किसी और वस्तु का इस्तेमाल नहीं होता, उन पर हर साल ढाई-तीन सौ टन कोयला की खपत हो जाती है। ऐसे में उन्हें करीब 15 लाख रुपये अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। बता दें कि जिले में बदायूं, बिल्सी, उझानी, बिसौली, सहसवान और इस्लामनगर आदि क्षेत्र में करीब दो सौ ईंट- भट्ठा हैं।
-- -- ईंट-भट्ठा मालिकों ने बताई अपनी-अपनी परेशानी-- --
ईंट-भट्ठा उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। युद्ध की मार तो अब पड़ी है, पहले से ही कुछ ऐसी दिक्कतें हैं जो व्यापार को पनपने नहीं दे रहीं। जीएसटी सुधार की दरें लागू होने के बाद भी कारोबारियों को राहत नहीं मिली है। पहले पांच फीसदी जीएसटी थी, सुधार के बाद 18 फीसदी शुल्क चुकाना पड़ रहा है। नुकसान भट्ठा मालिकों को हो रहा है। - भुवनेश माहेश्वरी, ईंट- भट्ठा मालिक
भट्ठों पर ईंटें पकाने के लिए कोयले के अलावा तुर्री और लकड़ियों का भी इस्तेमाल होता है। कुछ भट्ठे ऐसे हैं, जिन पर कोयले और लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है। खर्चा तो तुर्री के प्रयोग से भी कम नहीं आता, लेकिन कम कोयले से काम चल जाता है। युद्ध की मार पड़ने के बाद कोयले के भाव तेजी से बढ़े हैं। - ब्रजेश वार्ष्णेय, ईंट-भट्ठा मालिक
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भट्ठों पर ईंटें पकाने के लिए सरसों की तुर्री और लकड़ियों के अलावा अगर किसी अन्य चीज की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है तो वह कोयला है। युद्ध शुरू होने से पहले मय भाड़ा कोयले की कीमत प्रति टन करीब 17 हजार रुपये थी। कोयला आसानी से उपलब्ध हो रहा था, लेकिन जैसे ही युद्ध ने जोर पकड़ा, कोयले की कीमतों में उछाल आता गया।
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इलाके के ईंट-भट्ठों पर पिछले सप्ताह 20 हजार रुपये प्रति टन कोयला आया था। दो दिन पहले ईंट-भट्ठा मालिकों ने कारोबारियों के जरिये संपर्क साधा तो अब उन्हें भाव 21 हजार रुपये प्रति टन बताया गया।
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कोयला झारखंड और ओडिशा से भी आता है, लेकिन उसकी गुणवत्ता ज्यादा अच्छी नहीं होने की वजह से ईंट-भट्ठा मालिक अमेरिका और इंडोनिशया से समुद्र के रास्ते पोर्ट पर पहुंचने वाले कोयले को तरजीह देते हैं। उसकी गुणवत्ता बेहतर बताई जाती है। ईंट पकाने में जिन भट्ठों पर कोयले और लकड़ी के अलावा किसी और वस्तु का इस्तेमाल नहीं होता, उन पर हर साल ढाई-तीन सौ टन कोयला की खपत हो जाती है। ऐसे में उन्हें करीब 15 लाख रुपये अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है। बता दें कि जिले में बदायूं, बिल्सी, उझानी, बिसौली, सहसवान और इस्लामनगर आदि क्षेत्र में करीब दो सौ ईंट- भट्ठा हैं।
ईंट-भट्ठा उद्योग संकट के दौर से गुजर रहा है। युद्ध की मार तो अब पड़ी है, पहले से ही कुछ ऐसी दिक्कतें हैं जो व्यापार को पनपने नहीं दे रहीं। जीएसटी सुधार की दरें लागू होने के बाद भी कारोबारियों को राहत नहीं मिली है। पहले पांच फीसदी जीएसटी थी, सुधार के बाद 18 फीसदी शुल्क चुकाना पड़ रहा है। नुकसान भट्ठा मालिकों को हो रहा है। - भुवनेश माहेश्वरी, ईंट- भट्ठा मालिक
भट्ठों पर ईंटें पकाने के लिए कोयले के अलावा तुर्री और लकड़ियों का भी इस्तेमाल होता है। कुछ भट्ठे ऐसे हैं, जिन पर कोयले और लकड़ी का ही इस्तेमाल होता है। खर्चा तो तुर्री के प्रयोग से भी कम नहीं आता, लेकिन कम कोयले से काम चल जाता है। युद्ध की मार पड़ने के बाद कोयले के भाव तेजी से बढ़े हैं। - ब्रजेश वार्ष्णेय, ईंट-भट्ठा मालिक

उझानी में ईंट- भट्ठे पर पड़ा कोयला। संवाद

उझानी में ईंट- भट्ठे पर पड़ा कोयला। संवाद