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बिन ‘द्रोणाचार्य’ के ‘अर्जुन’ की आस
ब्यूरो /बदायूं
Updated Mon, 29 Aug 2016 11:01 PM IST
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रियो ओलंपिक में देश से प्रतिभाग करने गए अधिकांश खिलाड़ी न सिर्फ बिना मेडल लिए लौटे, बल्कि कुछ एक खिलाड़ियों को छोड़ दें तो अधिकांश संघर्ष करते भी नजर नहीं आए। युवाओं का देश कहे जाने वाले इस देश में बेहतरीन और सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों की कमी यूं ही नहीं है। देश के साथ ही जिले में खेलों की स्थिति बदतर है। जिले के स्पोर्ट्स स्टेडियम में अधिकांश खेलों के कोच नहीं है, जिससे खिलाड़ियों का मन भी स्टेडियम में जाने का नहीं करता है। यही वजह है कि अधिकांश समय स्टेडियम खाली रहता है।
जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में बिन कोच के ही हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद दद्दा जैसे खिलाड़ियों की खोज की जा रही है। या, यूं कहें कि स्पोर्ट्स स्टेडियम में बिन द्रोणाचार्य के ही अर्जुन जैसे तीरंदाज की तलाश की जा रही है, जो फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही है। यही वजह है कि तमाम प्रतिभावान खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका नहीं मिल पाता है, जिससे सवा करोड़ की आबादी वाले देश को रियो ओलंपिक में एक भी स्वर्ण पदक नहीं मिल पाता है, महज चंद रजत और कांस्य पदकों से संतोष करना पड़ता है। बावजूद इसके प्रशासनिक अमला इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
स्पोर्टस स्टेडियम में कबड्डी, वॉलीबाल, बास्केटबाल, कुश्ती, क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन जैसे खेलों के कोच ही नहीं हैं। वहीं, तैराकी और निशानेबाजी जैसे खेलों की यहां पर व्यवस्था ही नहीं है। भारोत्तोलन, एथलीट जैसे खेलों के कोच अंशकालिक रूप से रखे गए हैं, जबकि राष्ट्रीय खेल हॉकी का कोच भी एक पखवाड़े पहले ही स्पोर्ट्स स्टेडियम में रखा गया। टेनिस कोर्ट के कोच की जिम्मेदारी जिला क्रीड़ा अधिकारी पर है, लेकिन वह भी लखनऊ से संबद्ध रहने की वजह से इस खेल पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसे माहौल में जिले के खिलाड़ियों से प्रदेश स्तरीय, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी मेडल लाना महज बेमानी होगी। मेडल के बारे में सोचने से पहले खिलाड़ियों को कोच के सानिध्य में गेम खिलाने होंगे, उनकी प्रतिभा को निखारना होगा। तब जाकर ही ओलंपिक खेलों में भारत में स्वर्ण के साथ रजत और कांस्य पदकों की बौछार होगी।
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स्टेडियम में स्टॉफ की कमी
जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम महज चार कर्मचारियों के बूते पर चल रहा है, जिसमें एक बाबू और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी शामिल है। स्टॉफ की कमी के चलते तमाम खेलों का आयोजन भी नहीं हो पाता है। जिले की प्रतिभाओं को निखारने के लिए खेल हो सकें। इसके लिए स्टेडियम के कर्मचारियों की कमी को भी पूरा होना, जिससे कि मैदान तैयार हो सकें।
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स्पोर्ट्स स्टेडियम में कोच की कमी है। इस कमी को पूरा करने के लिए कोच का इंतजाम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी माह हॉकी का कोच लाया गया है। आगे भी कोच की कमी को पूरा करने की कोशिश की जाएगी।
-अनिल कुमार, जिला क्रीड़ा अधिकारी, स्पोर्ट्स स्टेडियम
जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में बिन कोच के ही हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद दद्दा जैसे खिलाड़ियों की खोज की जा रही है। या, यूं कहें कि स्पोर्ट्स स्टेडियम में बिन द्रोणाचार्य के ही अर्जुन जैसे तीरंदाज की तलाश की जा रही है, जो फिलहाल पूरी होती नजर नहीं आ रही है। यही वजह है कि तमाम प्रतिभावान खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका नहीं मिल पाता है, जिससे सवा करोड़ की आबादी वाले देश को रियो ओलंपिक में एक भी स्वर्ण पदक नहीं मिल पाता है, महज चंद रजत और कांस्य पदकों से संतोष करना पड़ता है। बावजूद इसके प्रशासनिक अमला इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
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स्पोर्टस स्टेडियम में कबड्डी, वॉलीबाल, बास्केटबाल, कुश्ती, क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन जैसे खेलों के कोच ही नहीं हैं। वहीं, तैराकी और निशानेबाजी जैसे खेलों की यहां पर व्यवस्था ही नहीं है। भारोत्तोलन, एथलीट जैसे खेलों के कोच अंशकालिक रूप से रखे गए हैं, जबकि राष्ट्रीय खेल हॉकी का कोच भी एक पखवाड़े पहले ही स्पोर्ट्स स्टेडियम में रखा गया। टेनिस कोर्ट के कोच की जिम्मेदारी जिला क्रीड़ा अधिकारी पर है, लेकिन वह भी लखनऊ से संबद्ध रहने की वजह से इस खेल पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसे माहौल में जिले के खिलाड़ियों से प्रदेश स्तरीय, राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में कोई भी मेडल लाना महज बेमानी होगी। मेडल के बारे में सोचने से पहले खिलाड़ियों को कोच के सानिध्य में गेम खिलाने होंगे, उनकी प्रतिभा को निखारना होगा। तब जाकर ही ओलंपिक खेलों में भारत में स्वर्ण के साथ रजत और कांस्य पदकों की बौछार होगी।
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स्टेडियम में स्टॉफ की कमी
जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम महज चार कर्मचारियों के बूते पर चल रहा है, जिसमें एक बाबू और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी शामिल है। स्टॉफ की कमी के चलते तमाम खेलों का आयोजन भी नहीं हो पाता है। जिले की प्रतिभाओं को निखारने के लिए खेल हो सकें। इसके लिए स्टेडियम के कर्मचारियों की कमी को भी पूरा होना, जिससे कि मैदान तैयार हो सकें।
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स्पोर्ट्स स्टेडियम में कोच की कमी है। इस कमी को पूरा करने के लिए कोच का इंतजाम करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसी माह हॉकी का कोच लाया गया है। आगे भी कोच की कमी को पूरा करने की कोशिश की जाएगी।
-अनिल कुमार, जिला क्रीड़ा अधिकारी, स्पोर्ट्स स्टेडियम