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बदायूं के गुरुकुल को चाहिए पुनर्जीवन

Wed, 29 Mar 2017 12:29 AM IST
राजीव शर्मा बदायूं।
राजीव शर्मा बदायूं। Updated Wed, 29 Mar 2017 12:29 AM IST
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Badaun's Gurukul should revive
गुरुकुल - फोटो : अमर उजाला
- 114 साल पुरानी वैदिक शिक्षण संस्था को संजोने की जरूरत
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बदायूं की पहचान जिन एतिहासिक धरोहरों और प्राचीन शिक्षण संस्थाओं से है, उनमें गुरुकुल महाविद्यालय सूर्यकुुंड प्रमुख है लेकिन 114 साल पुरानी यह वैदिक शिक्षक संस्था आज संसाधनों के अभाव में अपना अस्तित्व खोती जा रही है। लगभग 22 बीघा जमीन पर चल रहे इस महाविद्यालय के भवन जर्जर हो चुके हैं। कक्षाओं के अंदर बच्चों को बैठाने से शिक्षक डरते हैं। उनको खुले मैदान में बैठाकर पढ़ाना पड़ता है। महाविद्यालय का छात्रावास भी रहने लायक नहीं है। हाल ही बमुश्किल चंदा करके बनवाए गए एक हॉल में यहां रहने वाले बच्चों को सुलाया जाता है। हालात यह हैं कि जहां वेदमंत्र गूंजते थे, वह स्थान अब बदहाली का शिकार होकर रह गया है। महाविद्यालय के भवन को जीर्णोद्धार की जरूरत है और इसके लिए सरकारी या फिर सामाजिक आर्थिक सहयोग की दरकार है।
शहर में दातागंज रोड पर गुरुकुल महाविद्यालय की स्थापना आर्य समाज की देन है। आर्य पुरोहित स्वामी दर्शनानंद सरस्वती महाराज ने इसकी स्थापना 22 फरवरी 1903 में की थी। वह पंजाब से बदायूं आए थे और यहां वेद प्रचार का काम करने लगे। पड़ोसी गांव मझिया के पंडित रामजीमल ने 22 बीघा का अपना बगीचा स्वामी दर्शनानंद महाराज को दान कर दिया था। इसी पर गुरुकुल की स्थापना की गई। स्वामी दर्शनानंद ने भ्रमण करते हुए ऐसी ही और भी कई शिक्षण संस्थाएं देश-प्रदेश में स्थापित कराईं। स्थापना के बाद गुरुकुल में वेदपाठन, संस्कृत अध्ययन प्रारंभ हो गया। यहां छात्रों की आवासीय व्यवस्था के लिए छात्रावास भी स्थापित कराया गया। गुरुकुल विश्वविद्यालय वृंदावन और संपूर्णानंद विश्वविद्यालय से पूर्व मध्यमा और उत्तर मध्यमा की माध्यमिक कक्षाएं तथा शास्त्री और आचार्य की डिग्री स्तरीय कक्षाएं संचालित होने लगीं। इनका अध्ययन अभी भी हो रहा है। पूर्व मध्यमा और उत्तर मध्यमा की कक्षाएं अब उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद से संचालित हैं। महाविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य जगन्नाथ प्रसाद शास्त्री बताते हैं कि लगभग एक सदी तक अपने दौर में संस्कृत शिक्षा के लिए इस गुरुकुल का बड़ा योगदान रहा। यहां पढ़े तमाम लोग देश-विदेश में उच्च स्तर तक पहुंचे। इनमें एक नाम डॉ. मंगलदेव शास्त्री का है, जो संपूर्णानंद विश्वविद्यालय बनारस के कुलपति बने। संस्कृत विद्वान आचार्य डॉ. विशुद्धानंद भी इसी गुरुकुल के छात्र रहे लेकिन अंग्रेजीकरण की होड़ में संस्कृत शिक्षा से समाज का मोह भंग होने के फलस्वरूप गुरुकुल में शिक्षा के प्रति लोगों का आकर्षण तो कम हुआ ही, सरकार ने भी इसको आर्थिक सहयोग नहीं दिया। नतीजतन, महाविद्यालय का भवन पुराना हो चुका है। 35 कमरों में कोई भी ऐसा नहीं है, जिसमें बच्चों को बैठाना सुरक्षित हो पाए। हालांकि यहां आज भी 147 बच्चे नियमित अध्ययनरत हैं। इनमें से 50-60 बच्चे हॉस्टल में रह रहे हैं, जिनके रहने-खाने का बंदोबस्त महाविद्यालय की मैनेजमेंट कमेटी सामाजिक सहयोग से करती है। ऐसे में, गुरुकुल की पहचान को कायम रखने के लिए बदायूं के लोगों को आगे आने की जरूरत है।
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आजादी में भी रहा गुरुकुल का योगदान
1947 की देश की आजादी के लिए हुए संग्राम में अंग्रेजों के विरुद्ध गुरुकुल के मैदान से भी हुंकार भरी गई थी। 1936 में गुरुकुल में महात्मा गांधी आए थे और उन्होंने यहां शहर के प्रमुख लोगों के संग बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाई थी। बैठक का आयोजन तब शहर के प्रमुख आर्य समाजियों ने किया था।
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गुरुकुल महाविद्यालय सूर्यकुंड को जीर्णोद्धार की आवश्यकता है। इसके कैंपस में बने सभी भवन पुराने और जर्जर हो चुके हैं। इनका पुनर्निर्माण कराया जाना है, लेकिन सरकार की ओर से भवन निर्माण को कोई आर्थिक सहायता नहीं दी जाती। मैनेजमेंट कमेटी अपने स्तर से निर्माण करा पाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में अगर सरकार या दानदाता आगे आएं तो गुरुकुल फिर से संवर सकता है।
- वेदरत्न आर्य, प्राचार्य
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