Ram Mandir: 'जय श्री राम... मार दो गोली' कहते हुए फाटक खोलकर बाहर आ गए थे केशवनाथ; पढ़ें आंखों देखी
कारसेवक केशवनाथ वैश्य बताते हैं कि जिंदगी और मौत के बीच बस एक मिनट का अंतर था, यदि यह फासला मिट गया होता तो शायद आज एक बार फिर भगवान राम की सेवा करने के लिए जिंदा नहीं होते। उन्होंने कहा कि दो नवंबर 1990 का दिन वह कभी भुला नहीं पाएंगे, जब कारसेवकों पर पुलिस ने गोलियां बरसाईं थीं।
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अयोध्या में 22 जनवरी को दिव्य-भव्य श्रीराम मंदिर का उद्घाटन का होगा। रामलला अपने घर में विराजेंगे। हर रामभक्त को भी इस घड़ी का इंतजार है। भक्तों में उत्साह और जोश है तो प्राणप्रतिष्ठा का समय नजदीक आने के साथ हर तरफ राममय वातावरण भी बनने लगा है। इस अभूतपूर्व घड़ी को लाने में उन कारसेवकों के योगदान को भी नहीं भुलाया जा सकता जो दो नवंबर 1990 को पुलिस की गोली खाने से भी नहीं डरे थे। कई कारसेवकों की मौत के बाद भी उनके कदम पीछे नहीं हटे। इन्हीं कारसेवकों में बदायूं के भी तमाम लोग शामिल थे, जो आज भी उस दिन को याद करके एक बार फिर जोश से लबरेज हो उठते हैं। पेश है अयोध्या आंदोलन से जुड़े ऐसे ही कारसेवकों की कहानी उन्हीं की जुबानी....
बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक केशवनाथ वैश्य बताते हैं कि जिंदगी और मौत के बीच बस एक मिनट का अंतर था, यदि यह फासला मिट गया होता तो शायद आज एक बार फिर राम की सेवा करने के लिए जिंदा नहीं होते। पुलिस ने गोली मारने के लिए दिगंबर अखाड़े की दीवार पर सीढ़ी लगा ली थी, लेकिन भनक लगते ही फाटक खोलकर छाती पीटते और जय श्री राम का उद्घोष करते हुए ‘मार दो गोली’ -‘मार दो गोली’ चिल्लाते हुए बाहर निकल आए थे। उसी समय पत्रकारों की एक टोली वहां आ गई और पुलिस को बैकफुट पर आना पड़ा गया था।....जान जाने में बस एक मिनट ही बचा था, अगर पत्रकार वहां उस समय नहीं आते तो पुलिस उन समेत तमाम लोगों को गोली मार चुकी होती।’
कारसेवक रामगोपाल की आंखों देखी: अयोध्या में गोलीबारी के बीच आंसूगैस के गोले नाले में फेंक बढ़ते रहे आगे
रामजन्म भूमि और मंदिर निर्माण को लेकर 62 साल की उम्र में आज भी उत्साह से लबरेज केशवनाथ में 21- 22 साल की उम्र में तो जोश दोगुना था। जब 1990 में विश्व हिंदू परिषद ने रामज्योति यात्रा का आह्वान किया तो 23 सितंबर को कछला से यात्रा लेकर निकल पड़े थे। साथ में विहिप के तत्कालीन प्रांत संगठन मंत्री राजेंद्र सिंह पंकज भी थे। दोनों को बुटला के पास से गिरफ्तार किया गया था। केशव बताते हैं कि उन्हें फतेहगढ़ व राजेंद्र सिंह को बांदा जेल में रखा गया।
दो नवंबर को हर तरफ आ रही थीं गोलियों की आवाज
दो नवंबर 1990 का दिन रामभक्तों समेत अयोध्या के लोग भी कभी भुला नहीं पाएंगे, जब हर तरफ से गोलियों की आवाज आ रही थी। केशव बताते हैं कि उस समय उनकी ड्यूटी दिगंबर अखाड़े में थी। जब बाहर गोलियां चल रही थीं तो वह लोगों को खींचकर अखाड़े में बंद कर रहे थे। उसी दौरान पुलिस ने अखाड़े में सीढ़ी लगाकर अंदर बंद लोगों को भी गोली मारनी चाही थी लेकिन ऐन वक्त पर पत्रकारों के आने ने सबकी जान बच गई।
कच्छा बनियान पहनकर पुलिस के बीच से ही निकल लिए
शहर के मढ़ई चौक निवासी केशव बताते हैं कि जब गिरफ्तारी की सूचना मिली तो जो भगवा वस्त्र पहने थे। उन्हें उतारकर कच्छा और बनियान में ही पुलिस के बीच से होकर निकल गए थे और पुलिस पहचान नहीं पाई। पूरी रात हरप्रसाद मंदिर में गुजारी। सुबह सूचना मिली कि अयोध्या जाकर काम करना है तो वहां पहुंच गए। 15 से 29 अक्तूबर 1990 तक वहां रुककर कारसेवकों को इकट्ठा करने, उनके रुकने और भोजन आदि की व्यवस्था में लगे रहे।
विहिप के आह्वान पर 30 अक्तूबर को अयोध्या में करीब दस हजार कारसेवकों के साथ अंदर घुसे तो पुलिस ने हर जगह बैरियर लगा रखे थे। एक वाकये को याद करते हुए बताते हैं कि उसी समय हनुमान मंदिर पर एक बस खड़ी दिखाई दी थी तो कारसेवकों ने बस लेकर दौड़ा दी थी जो बैरियर तोड़ते हुए घुस गई थी। कारसेवा के दौरान दो कार्यकर्ता गंभीर घायल हो गए थे तो उनके पैरों में भी कई लाठियां पड़ीं थीं।