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देखो सरकार,जर्जर आवासों में रह रहे परिवार
Updated Mon, 11 Sep 2017 11:27 PM IST
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बदायूं। स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह के लखनऊ स्थित अपने सरकारी आवास की टपकती छत की तस्वीरें कुछ दिन पहले ट्विटर पर अपलोड की, यह खबर चर्चाओं में आई। इसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के सरकारी आवास की हालत ऐसी है तो सरकारी कर्मचारियों के आवास कैसे होंगे।
रविवार को अमर उजाला ने शहर स्थित सरकारी आवासों की पड़ताल की तो यहां रहने वालों कर्मचारियों ने अधिकारियों को जमकर कोसा। पड़ताल में अधिकारियों के आवास तो चकाचक मिले, लेकिन कर्मचारी के आवासों की स्थिति बड़ी दयनीय थी। कर्मचारी अपने परिवार की जान जोखिम में डालकर इन आवासों में रह रहे थे। 90 प्रतिशत मकानों के लिंटर और छज्जे गिरताऊ स्थिति में थे। तेज बारिश होने पर कई बार हादसे भी हुए हैं। कर्मचारियों का कहना है कि शिकायतों के बाद भी कोई अधिकारी इस ओर ध्यान ही नहीं देता है।
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पुलिस, स्वास्थ्य, रेलवे, प्रशासनिक आदि विभागों में तैनात कर्मचारी शासन की ओर से आवंटित हुए आवासों में परिवार के साथ रहते हैं। शहर स्थित अधिकारियों के आवास तो सफाई व्यवस्था से लेकर हर चीज में चकाचक हैं, लेकिन कर्मचारियों के आवासों की हालत दयनीय है। कर्मचारी बताते हैं कि आवास आवंटित करने के बाद न जाने कितने अधिकारी आकर चले गए, लेकिन किसी ने भी इन जर्जर आवासों की ओर ध्यान नहीं दिया।
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दम तोड़ते पुलिस लाइन के आवास
शहर के बीच स्थित पुलिस लाइन में सैकड़ों आवास बने हैं। यहां पुलिस कर्मी अपने परिवार के साथ सालों से जर्जर घरों में रहते हैं। महिलाओं ने बताया कि कई घरों की छतों का लिंटर लटका हुआ है। छज्जे गिर चुकें हैं तो कई गिरने की कगार पर हैं। अधिक बारिश होने पर मकानों की छतों के गिरने का खतरा बना रहता है। सभी लोग अपने मकानों के आसपास की सड़कों की सफाई तो खुद कर लेते हैं, मगर नालियों की सफाई करने कोई नहीं आता। सफाई के नाम पर वेतन से कटौती कर होती है, लेकिन सुविधा नहीं मिलती।
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जिला अस्पताल के आवासों की हालत सबसे ज्यादा खराब
शहर स्थित सरकारी भवनों में सबसे बुरी स्थिति जिला अस्पताल के आवासों की है। यहां हर घर के पास गंदगी के ढेर लगे हुए हैं। महिलाएं बताती हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने वाले जिला अस्पताल के डॉक्टरों की कॉलोनी में लगे कूढ़े के ढेर और गंदे पानी में पनमते मच्छर सरकार को नहीं दिखते। वह भी तब सीएमस से लेकर तमाम बड़े चिकित्सक इन आवासों में रहते हैं। घरों की हालत को लेकर कई बार शिकायत की गई लेकिन समस्या का समाधान नहीं हुआ।
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रेलवे कर्मचारियों के घरों में बाथरूम तक नहीं
रेलवे कॉलोनी में बने सरकारी आवासों के स्थिति बाहर से देखने में तो ठीक है, लेकिन अंदर की स्थिति बहुत बदहाल है। आवासों में न तो नहाने का बाथरूम है ना ही ढंग के शौचालय। कर्मचारियों ने बताया कि बारिश होने पर लिंटर से पपड़ी छूट कर बिस्तर पर गिरती है। मजबूरी में यहां रहने वाले लोग खुद ही घरों की मरम्मत कराते हैं। कॉलोनी में सड़कों पर नालियों का गंदा पानी भरा रहता है। लाख शिकायत करने के बाद भी समस्याओं का हल नहीं निकला है।
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परिवार की सुरक्षा को खुद कराई मरम्मत : विक्रांत
जिला अस्पताल की कॉलोनी में रहने वाले विक्रांत ने बताया कि घर की छत का लिंटर कभी भी गिर सकता है। परिवार की सुरक्षा के लिए खुद ही मरम्मत कराई है। कई बार अधिकारियों को लिखा फिर भी स्थिति नहीं सुधरी। यहां रहने वाले परिवारों की हर रात डर के साय में गुजरती है।
आवास तो दे दिए, सुविधा जीरो : मिथलेश
जिला अस्पताल की कॉलोनी निवासी मिथलेश ने बताया कि आवास की स्थित इतनी जर्जर है कि बरसात के पानी से गल कर दरवाजे खराब हो गए। कुछ समय पहले बाथरूम का लिंटर गिरने से परिवार वाले बाल-बाल मच गए थे। शिकायत के बाद भी मरम्मत तो दूर कोई देखने तक नहीं आया।