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जिले के साहित्यकारों ने मनाई बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि
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बिजनौर में डॉ ज्ञानेश दत्त हरित के साथ बाबा नागार्जुन। (फाइल फोटो)
- फोटो : BIJNOR
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जिले के साहित्यकारों ने मनाई बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि
बिजनौर। वैद्यनाथ मिश्र उर्फ बाबा नागार्जुन को जनकवि कहा जाता है। उन्होंने जन सरोकार वाली कविताओं से जनता की आवाज को बुलंद किया। देश की आजादी से पूर्व तथा आजादी के पश्चात वह सरकारों से लड़ते रहे। बिजनौर के वर्धमान कॉलेज में बीएड के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित ने बाबा नागार्जुन पर शोध किया था। बाबा नागार्जुन कई बार उनके आवास पर आए। शुक्रवार को बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर बिजनौर के साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
वर्धमान कॉलेज में प्रवक्ता रहे डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित बताते हैं कि उन्होंने बाबा नागार्जुन व्यक्तित्व और कृतित्व विषय पर अपना शोध कार्य किया। उन्हें शोध कार्य करने पर सन 1978 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई। बाबा नागार्जुन घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे तथा उन्हें घूमना बहुत पसंद था। शोध करते हुए उन्होंने बाबा नागार्जुन की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं को महसूस किया। वह गरीब की आवाज बन गए थे। डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित ने बताया कि बाबा नागार्जुन आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत से लड़ते रहे और आजादी के बाद गरीबों के हक में लड़ते रहे। देश की आजादी के बाद जब ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ का भारत में आगमन हुआ तब उन्होंने इस दौरे का विरोध किया और कविता लिखी ‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’। बाबा नागार्जुन कहते थे ‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हक लाऊं’।
इमरजेंसी के दौरान बाबा नागार्जुन की कविताओं को खूब पढ़ा गया तथा उनकी कविताएं आम आदमी की आवाज बन गई थीं। उन्होंने लिखा ‘रोजी रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा, कोई भी हो निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा’। बाबा नागार्जुन कई बार उनके आवास पर आए तथा हफ्तों तक रहे। इस दौरान बिजनौर में एक अखबार के कार्यालय में तथा आर्य समाज में उनके सम्मान में विचार गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें बाबा नागार्जुन ने भी काव्य पाठ किया था। पांच नवंबर 1998 को बाबा नागार्जुन का निधन हो गया।
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बिजनौर। वैद्यनाथ मिश्र उर्फ बाबा नागार्जुन को जनकवि कहा जाता है। उन्होंने जन सरोकार वाली कविताओं से जनता की आवाज को बुलंद किया। देश की आजादी से पूर्व तथा आजादी के पश्चात वह सरकारों से लड़ते रहे। बिजनौर के वर्धमान कॉलेज में बीएड के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित ने बाबा नागार्जुन पर शोध किया था। बाबा नागार्जुन कई बार उनके आवास पर आए। शुक्रवार को बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर बिजनौर के साहित्यकारों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
वर्धमान कॉलेज में प्रवक्ता रहे डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित बताते हैं कि उन्होंने बाबा नागार्जुन व्यक्तित्व और कृतित्व विषय पर अपना शोध कार्य किया। उन्हें शोध कार्य करने पर सन 1978 में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ से पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई। बाबा नागार्जुन घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे तथा उन्हें घूमना बहुत पसंद था। शोध करते हुए उन्होंने बाबा नागार्जुन की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं को महसूस किया। वह गरीब की आवाज बन गए थे। डॉ. ज्ञानेश दत्त हरित ने बताया कि बाबा नागार्जुन आजादी से पहले अंग्रेजी हुकूमत से लड़ते रहे और आजादी के बाद गरीबों के हक में लड़ते रहे। देश की आजादी के बाद जब ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ का भारत में आगमन हुआ तब उन्होंने इस दौरे का विरोध किया और कविता लिखी ‘आओ रानी हम ढोएंगे पालकी’। बाबा नागार्जुन कहते थे ‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊं, जनकवि हूं मैं साफ कहूंगा क्यों हक लाऊं’।
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इमरजेंसी के दौरान बाबा नागार्जुन की कविताओं को खूब पढ़ा गया तथा उनकी कविताएं आम आदमी की आवाज बन गई थीं। उन्होंने लिखा ‘रोजी रोटी हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा, कोई भी हो निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा’। बाबा नागार्जुन कई बार उनके आवास पर आए तथा हफ्तों तक रहे। इस दौरान बिजनौर में एक अखबार के कार्यालय में तथा आर्य समाज में उनके सम्मान में विचार गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें बाबा नागार्जुन ने भी काव्य पाठ किया था। पांच नवंबर 1998 को बाबा नागार्जुन का निधन हो गया।
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