{"_id":"6197ea6846fb29773b58e4cb","slug":"wheat-is-selling-11-and-sugarcane-is-25-percent-cheaper-than-msp-bijnor-news-mrt565526282","type":"story","status":"publish","title_hn":"गेहूं 11 और गन्ना एमएसपी से 25 प्रतिशत बिक रहा सस्ता","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
गेहूं 11 और गन्ना एमएसपी से 25 प्रतिशत बिक रहा सस्ता
विज्ञापन
गेहूं 11 और गन्ना एमएसपी से 25 प्रतिशत बिक रहा सस्ता
बिजनौर। जिले के किसानों ने कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और कानून वापस भी करा लिए, लेकिन किसानों के हाथ इसके सिवा कुछ नहीं आया है। फसलों के उचित दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदारी आज भी सपना ही बनी हुई है। मंडियों में अब भी किसानों को फसलों के उचित दाम नहीं मिल पा रहे हैं। किसानों की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से 11 से 25 प्रतिशत तक सस्ती बिक रही हैं।
कृषि कानूनों में जिले के सभी किसान संगठन किसानों को अपने साथ जोड़ने में लगे रहे। किसानों ने कानूनों को वापस कराने के लिए जितना जोर लगाया, किसानों के हित में घोषणाएं कराने में उतनी दिलचस्पी नहीं ली। वर्तमान में किसानों की सबसे बड़ी जरूरत न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल बिकना है, लेकिन ऐसा कहीं नहीं हो रहा है। आमतौर पर सरकार द्वारा जितनी फसलों के दाम तय किए जाते हैं उनमें मुख्य रूप से गन्ना, धान और गेहूं की बुवाई ही जिले में होती है। सरकार द्वारा गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य दो हजार 15 रुपये, धान का 1960 और गन्ने का 350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है लेकिन जिले में कहीं पर भी इसका पालन नहीं हो रहा है। मंडियों में किसानों से गेहूूं 1800 रुपये प्रति क्विंटल तक खरीदा जा रहा है जबकि यह गेहूं का ऑफ सीजन चल रहा है और इस समय गेहूं के दाम चढ़े होते हैं। क्रेशर व कोल्हुओं पर गन्ना 250 से 280 और धान तो 1500 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर ही बिक रहे हैं। यानी गेहूं करीब 11 प्रतिशत, गन्ना 25 प्रतिशत और धान करीब 24 प्रतिशत सस्ता बिक रहा है। किसान संगठनों ने पूरा जोर कृषि कानूनों को वापस कराने में लगाया उतना एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी का कानून बनाने पर नहीं लगाया। केवल राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ही कानूनों में संशोधन कराकर एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी का कानून बनाने की मांग करता रहा। (संवाद)
किसानों का रहता है मिलों से सट्टा
कृषि सुधार कानूनों में अनुबंध खेती भी शामिल थी। किसान संगठन अनुबंध खेती को गलत बता रहे थे, जबकि चीनी मिलों को गन्ना बेचने वाले जिले के साढ़े तीन लाख से ज्यादा किसानों का मिलों से अनुबंध रहता है। मिल इनका गन्ना खरीदना तय करती है जिससे आम भाषा में सट्टा कहा जाता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
बिजनौर। जिले के किसानों ने कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और कानून वापस भी करा लिए, लेकिन किसानों के हाथ इसके सिवा कुछ नहीं आया है। फसलों के उचित दाम और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदारी आज भी सपना ही बनी हुई है। मंडियों में अब भी किसानों को फसलों के उचित दाम नहीं मिल पा रहे हैं। किसानों की फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य से 11 से 25 प्रतिशत तक सस्ती बिक रही हैं।
कृषि कानूनों में जिले के सभी किसान संगठन किसानों को अपने साथ जोड़ने में लगे रहे। किसानों ने कानूनों को वापस कराने के लिए जितना जोर लगाया, किसानों के हित में घोषणाएं कराने में उतनी दिलचस्पी नहीं ली। वर्तमान में किसानों की सबसे बड़ी जरूरत न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल बिकना है, लेकिन ऐसा कहीं नहीं हो रहा है। आमतौर पर सरकार द्वारा जितनी फसलों के दाम तय किए जाते हैं उनमें मुख्य रूप से गन्ना, धान और गेहूं की बुवाई ही जिले में होती है। सरकार द्वारा गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य दो हजार 15 रुपये, धान का 1960 और गन्ने का 350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है लेकिन जिले में कहीं पर भी इसका पालन नहीं हो रहा है। मंडियों में किसानों से गेहूूं 1800 रुपये प्रति क्विंटल तक खरीदा जा रहा है जबकि यह गेहूं का ऑफ सीजन चल रहा है और इस समय गेहूं के दाम चढ़े होते हैं। क्रेशर व कोल्हुओं पर गन्ना 250 से 280 और धान तो 1500 रुपये प्रति क्विंटल के दाम पर ही बिक रहे हैं। यानी गेहूं करीब 11 प्रतिशत, गन्ना 25 प्रतिशत और धान करीब 24 प्रतिशत सस्ता बिक रहा है। किसान संगठनों ने पूरा जोर कृषि कानूनों को वापस कराने में लगाया उतना एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी का कानून बनाने पर नहीं लगाया। केवल राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ही कानूनों में संशोधन कराकर एमएसपी पर फसल खरीद की गारंटी का कानून बनाने की मांग करता रहा। (संवाद)
विज्ञापन
किसानों का रहता है मिलों से सट्टा
कृषि सुधार कानूनों में अनुबंध खेती भी शामिल थी। किसान संगठन अनुबंध खेती को गलत बता रहे थे, जबकि चीनी मिलों को गन्ना बेचने वाले जिले के साढ़े तीन लाख से ज्यादा किसानों का मिलों से अनुबंध रहता है। मिल इनका गन्ना खरीदना तय करती है जिससे आम भाषा में सट्टा कहा जाता है।
विज्ञापन