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कभी खुद थी बीमार, आज बांटती है अपनापन और प्यार
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बिजनौर: बढ़ापुर क्षेत्र के ग्राम दोदराजपुर स्थित आशादीप के पालना भवन में सिस्टर के साथ रूमा।
- फोटो : BIJNOR
कभी खुद थी बीमार, आज बांटती है अपनापन और प्यार
बढ़ापुर(बिजनौर)। प्रेम और अच्छी देखभाल मिले, तो मनोरोगी को भी स्वस्थ किया जा सकता है। यहां तक कि याद्दाश्त भी वापस लाई जा सकती है। यह सिद्ध किया है आशादीप के पालना भवन की सिस्टर्स और स्टाफ ने। नेपाल की रूमा को यहां इतना अपनापन मिला कि अब वह यहां से जाना ही नहीं चाहती और अन्य मनोरोगी बच्चों, बालिकाओं और महिलाओं की सेवा में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहती है।
पुलिस को 11 मार्च 2011 को शहर की सड़कों एक महिला घूमती मिली थी, उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। पुलिस ने उसी दिन उसे आशादीप पालना भवन में भर्ती करा दिया। वह तब बेवजह चीखती-चिल्लाती थी और असामान्य व्यवहार करने लगती थी। वह बस अपना नाम रूमा बता पा रही थी। यहां उसकी देखभाल की गई। डॉक्टर से इलाज कराया गया। समय पर भोजन दिया गया, तो वह कुछ महीनों में ही स्वस्थ हो गई। उसकी याद्दाश्त भी वापस आ गई। इसके बाद उसने यहां हिंदी बोलना भी सीख लिया। 38 साल की हो चुकी रूमा ने बताया कि वह नेपाल के जिला रामपुर के गांव कावली निवासी केसरवाड़ औली की पुत्री है। उसकी शादी नेपाल के जिला लचीनपुर के गोधरा गांव निवासी तिलक के साथ हुई थी। उसकी दीपा और प्रीता नामक दो बेटियां हैं, जो नेपाल में पति के पास हैं। धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति खराब होने लगी थी। वह कब नेपाल से बस में सवार होकर दिल्ली और फिर बिजनौर आ गई, उसे नहीं पता।
परिवार से नहीं हो सका संपर्क
रूमा ने बताया कि कोई संपर्क सूत्र नहीं होने के चलते इन 9 सालों में परिवार से संपर्क नहीं हो सका। उसने भी नेपाल जाने की इच्छा नहीं दिखाई। अब वह यहां मनोरोगी बालिकाओं और महिलाओं की सेवा में ही अपना जीवन लगाता चाहती है। यहां की सिस्टर्स और स्टाफ ने इतना प्यार दिया कि अब उसे अपना परिवार भी याद नहीं आता है। आशादीप के पालना भवन की सिस्टर क्रिस्टी बताती हैं कि रूमा पालना भवन को ही अपना घर मान चुकी है। वह अपने अतीत के बारे में बात भी नहीं करना चाहती। रूमा सबका बेहद ख्याल रखती है। वह इसी में खुश है।
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41 मरीज हैं पालना भवन में
पालना भवन में 41 मनोरोगी बालिकाएं और महिलाएं हैं। फिजिकली चैलेंज्ड यूनिट में विभिन्न प्रांतों के 20 बच्चे हैं, जो शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हैं। मस्तिष्क सामान्य रूप से काम नहीं करने के चलते ये बच्चे 24 घंटे पालनों में ही लेटे रहते हैं। उनके अपने ही उन्हें यहां छोड़कर चले गए। रूमा इन बच्चों के खाने से लेकर कपड़े धोने और जरूरी क्रियाओं में सहयोग करती है।
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बढ़ापुर(बिजनौर)। प्रेम और अच्छी देखभाल मिले, तो मनोरोगी को भी स्वस्थ किया जा सकता है। यहां तक कि याद्दाश्त भी वापस लाई जा सकती है। यह सिद्ध किया है आशादीप के पालना भवन की सिस्टर्स और स्टाफ ने। नेपाल की रूमा को यहां इतना अपनापन मिला कि अब वह यहां से जाना ही नहीं चाहती और अन्य मनोरोगी बच्चों, बालिकाओं और महिलाओं की सेवा में ही अपना जीवन व्यतीत करना चाहती है।
पुलिस को 11 मार्च 2011 को शहर की सड़कों एक महिला घूमती मिली थी, उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। पुलिस ने उसी दिन उसे आशादीप पालना भवन में भर्ती करा दिया। वह तब बेवजह चीखती-चिल्लाती थी और असामान्य व्यवहार करने लगती थी। वह बस अपना नाम रूमा बता पा रही थी। यहां उसकी देखभाल की गई। डॉक्टर से इलाज कराया गया। समय पर भोजन दिया गया, तो वह कुछ महीनों में ही स्वस्थ हो गई। उसकी याद्दाश्त भी वापस आ गई। इसके बाद उसने यहां हिंदी बोलना भी सीख लिया। 38 साल की हो चुकी रूमा ने बताया कि वह नेपाल के जिला रामपुर के गांव कावली निवासी केसरवाड़ औली की पुत्री है। उसकी शादी नेपाल के जिला लचीनपुर के गोधरा गांव निवासी तिलक के साथ हुई थी। उसकी दीपा और प्रीता नामक दो बेटियां हैं, जो नेपाल में पति के पास हैं। धीरे-धीरे उसकी मानसिक स्थिति खराब होने लगी थी। वह कब नेपाल से बस में सवार होकर दिल्ली और फिर बिजनौर आ गई, उसे नहीं पता।
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परिवार से नहीं हो सका संपर्क
रूमा ने बताया कि कोई संपर्क सूत्र नहीं होने के चलते इन 9 सालों में परिवार से संपर्क नहीं हो सका। उसने भी नेपाल जाने की इच्छा नहीं दिखाई। अब वह यहां मनोरोगी बालिकाओं और महिलाओं की सेवा में ही अपना जीवन लगाता चाहती है। यहां की सिस्टर्स और स्टाफ ने इतना प्यार दिया कि अब उसे अपना परिवार भी याद नहीं आता है। आशादीप के पालना भवन की सिस्टर क्रिस्टी बताती हैं कि रूमा पालना भवन को ही अपना घर मान चुकी है। वह अपने अतीत के बारे में बात भी नहीं करना चाहती। रूमा सबका बेहद ख्याल रखती है। वह इसी में खुश है।
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41 मरीज हैं पालना भवन में
पालना भवन में 41 मनोरोगी बालिकाएं और महिलाएं हैं। फिजिकली चैलेंज्ड यूनिट में विभिन्न प्रांतों के 20 बच्चे हैं, जो शारीरिक और मानसिक रूप से दिव्यांग हैं। मस्तिष्क सामान्य रूप से काम नहीं करने के चलते ये बच्चे 24 घंटे पालनों में ही लेटे रहते हैं। उनके अपने ही उन्हें यहां छोड़कर चले गए। रूमा इन बच्चों के खाने से लेकर कपड़े धोने और जरूरी क्रियाओं में सहयोग करती है।