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Bijnor News: रोना नहीं...मां से लिया वचन और आजादी की जंग में हो गए शामिल

Sun, 11 Aug 2024 12:33 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 11 Aug 2024 12:33 AM IST
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Took a promise from mother not to cry and joined the fight for freedom.
-न्यादर सिंह गहलौत ने स्वतंत्रता आंदोलन में लिया था बढ़ चढ़कर हिस्सा
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विवेक गुप्ता
कोतवाली देहात। गांव रजपुरा में जन्मे न्यादर सिंह गहलौत ने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने 1941 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तारी दी थी। गिरफ्तारी देने से पहले मां से नहीं रोने का वचन लिया था।
न्यादर सिंह का जन्म 1920 में हुआ, उनके पिता किशन सिंह राजपूत एक कृषक थे। युवावस्था के दौरान इनका संपर्क नजीबाबाद के सेनानियों से हुआ। सेनानियों से प्रेरित होकर ये भी स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद गए। स्थानीय सेनानियों पर शोध कर रहे फीना निवासी हेमंत कुमार ने अपनी पुस्तक जनपद बिजनौर की बातें और डायरी के पदचिन्ह में न्यादर सिंह के बारे में बताया गया है।
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24 मार्च 1941 को असहयोग आन्दोलन में न्यादर सिंह ने स्वेच्छा से गिरफ्तारी दी थी। गिरफ्तार होने के लिए सेनानी पुलिस को पहले से सूचित किया करते थे। न्यादर सिंह ने भी पुलिस को सूचना दी कि वे असहयोग आन्दोलन में गिरफ्तार होकर जेल जाना चाहते हैं। इसके बाद पुलिस ने इन्हें इनके गांव रजपुरा से गिरफ्तार कर लिया।
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गिरफ्तारी से पहले मां से लिया न रोने का वचन



गिरफ्तारी से पहले न्यादर सिंह ने अपनी मां से कहा कि मैं एक चीज मांगना चाह रहा हूं परन्तु सुनकर रोना मत। इस संबंध में हेमंत आगे लिखते हैं कि इनकी मां सुखिया देवी ने कहा कि ठीक है नहीं रोऊंगी बताओ...। न्यादर सिंह बोले कि अंग्रेजों को ताकत दिखानी है। देश आजाद कराना है। इसलिए मैं महात्मा गांधी के जेल भरो आंदोलन में गिरफ्तार होना चाहता हूं। तुम मेरी गिरफ्तारी पर रोना मत। न्यादर सिंह अपने माता-पिता के इकलौते पुत्र थे। परन्तु देश की बात आई तो इनकी माता ने सहर्ष अनुमति दे दी और शपथ निभाते हुए बिल्कुल नहीं रोई।




उत्तर प्रदेश सरकार ने दिया था ताम्रपत्र



न्यादर सिंह के पुत्र रामकुमार ने बताया कि उनके पिता अक्सर आंदोलन और जेल के संस्मरण सुनाया करते थे। जेल में सेनानियों को बहुत प्रताड़ित किया जाता था। बेंत से पिटाई की जाती थी। खाना भी खराब मिलता था। जेल में पिता जी का स्वास्थ्य भी बिगड़ गया था। गांव लौटने पर लोगों ने बहुत अच्छा स्वागत किया था। 1972 में न्यादर सिंह को स्वतंत्रता आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान के लिए सरकार की तरफ से ताम्रपत्र प्रदान किया गया। न्यादर सिंह की मृत्यु 15 जनवरी 1998 को हुई। वह जीवन भर देश हित से जुड़े कार्यों में लग रहे और देश की आजादी के दौरान संघर्ष की कहानी गांव वालों को सुनाते रहे।
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