{"_id":"5f2852358ebc3eb0715a42fb","slug":"there-is-still-industry-alive-in-dayalwala-village-bijnor-news-mrt494489888","type":"story","status":"publish","title_hn":"दयालवाला गांव में आज भी जिंदा है मूढ़ा उद्योग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दयालवाला गांव में आज भी जिंदा है मूढ़ा उद्योग
विज्ञापन
दयालवाला गांव में आज भी जिंदा है मूढ़ा उद्योग
बिजनौर। मंडावर थाना क्षेत्र का दयालवाला गांव प्राचीन मूढ़ा उद्योग को आज भी जिंदा रखे हुए है। इस गांव के सैकड़ों परिवार मूढ़ा निर्माण कार्य से जुड़े हैं। करीब आधा गांव कांस और सर्वे से तैयार होने वाले मूढ़ों, कुर्सियों, मेजों और सोफा सेट को बनाकर अपने परिवार की गुजर-बसर करता है। इस गांव में निर्मित बेहद खूबसूरत मूढ़े देश के कई राज्यों में निर्यात किए जाते हैं। स्थानीय क्षेत्र में भी इस उत्पाद की जबरदस्त मांग है। कोरोना महामारी के चलते मूढ़ा उद्योग के काम में काफी गिरावट आई है। अब गांवों में फेरी लगाकर सामान बेचना पड़ रहा है।
दयालवाला मंडावर-बालावाली मार्ग पर बसा एक घनी आबादी वाला गांव है। इस गांव की करीब आधी आबादी मूढ़ा उद्योग से जुड़ी है। गांव के करीब 150 परिवार कई पीड़ियों से मूढ़ा बुनने के काम को करते आ रहे हैं। इस गांव में काफी बड़े स्तर पर मूढ़ा और उसके जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। आधुनिक युग में प्लास्टिक, लोहा और लकड़ी की बेहतरीन नक्काशी की कुर्सियों की मांग है। लेकिन आज भी कांस और सर्वे से निर्मित कुर्सी, मूढ़ा, सोफा सेट और मेज का अपना अलग महत्व है। बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए मूढ़ा उद्योग भी काफी समय से लाइलोन की रस्सी से निर्मित रंग-बिरंगे खूबसूरत मूढ़े बना रहा है। स्थानीय बाजार के अलावा दूसरे राज्यों में इस गांव के बने मूढ़ों की काफी मांग है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर आदि प्रदेशों में यहां के मूढ़े खूब पसंद किए जाते हैं। अधिकांश सामान दूसरे राज्यों को ही निर्यात किया जाता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक परिवार के सभी सदस्य इस कारोबार में अपनी भूमिका निभाते हैं। अलग-अलग जाति व धर्म के सैकड़ों परिवार इस काम के जरिए अपने परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं। पूरा परिवार सुबह से शाम तक मूढ़ा बनाने के काम शिद्दत से लगा रहता है।
मूढ़ा बनाने की विधि और आवश्यक सामग्री
कई दशकों से मूढ़ा बुनते आ रहे धर्मवीर सिंह (70) बताते हैं कि मूढ़ा बनाने में कांस और सर्वे (सरकंडे) का इस्तेमाल किया जाता है। कांस को काटकर एक सप्ताह तक धूप में सुखाया जाता है, जबकि सर्वे करीब एक से दो माह में सूखकर प्रयोग करने योग्य बन पाते हैं। कांस को सूखाने के बाद उसे अच्छी तरह से पीटकर बारीक किया जाता है। उसके बाद उससे रस्सी बांटकर धूप में सुखाई जाती है। रस्सी बांटने और सुखाने का काम परिवार के बच्चे और महिलाएं करते हैं। फिर सर्वे की छंटाई और कटाई का काम होता है। यह सब काम पूरा होने पर मूढ़ा बुनने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति को एक कुर्सी को तैयार करने में पूरा दिन लग जाता है। सोफा तैयार करने में चार से पांच दिन लगते हैं। वहीं एक दिन में दो मूढ़े और एक मेज तैयार होती है।
विज्ञापन
मूढ़ा बनाने की लागत और मुनाफा
मूढ़ा बुनकर राहुल बताते हैं कि कांस की रस्सी और सर्वे से बनी कुर्सी को बनाने में करीब 400 रुपये की लागत आती है। मूढ़े में 150 रुपये, सोफे में 700 रुपये और मेज में 400 रुपये की लागत आती है। जबकि कुर्सी 700 रुपये, मेज 700 रुपये, मूढ़ा 300 रुपये और एक सोफा सेट करीब चार हजार रुपये में बिकता है। सोफा सेट में सोफे के साथ दो कुर्सी भी शामिल होती हैं। वहीं नाइलोन की रस्सी का प्रयोग करने में लागत 30 से 40 प्रतिशत बढ़ जाती है। नाइलोन की रंग-बिरंगी डोरी से बने मूढ़े देखने में बेहद खूबसूरत लगते हैं। इसलिए महंगे दामों पर आसानी से बिक भी जाते हैं। बताया कि अधिकांश सामान दूसरे राज्यों को निर्यात होता है। कुछ सामान घर से ही बिक जाता है। इसके अलावा गांव के कुछ लोग कमीशन बेस पर साईकिल और बाइक से ग्रामीण क्षेत्रों में फेरी करते हैं। इस तरह पूरी दिन की मेहनत के बाद मजदूरी निकल आती है। इस काम में सरकार की तरफ से कोई सहायता नहीं मिलती।
कोरोना महामारी से कारोबार में आई कमी
मूढ़ा बुनकर सोनू का कहना हैं कि कोरोना महामारी के कारण दूसरे राज्यों को सामान का निर्यात पूरी तरह से ठप पड़ा है। इस काम के अलावा उनके पास आमदनी का कोई दूसरा साधन नहीं है। इसलिए स्थानीय गांवों में फेरी वालों की संख्या बढ़ा काफी मशक्कत से सामान बेचाकर किसी तरह काम चलाया जा रहा है।
पूर्व सांसद भरतेंद्र ने किया था सूत के मूढ़ों का शुभारंभ
नितिन बताते हैं कि पूर्व सांसद भरतेंद्र सिंह ने करीब तीन साल पहले सूत की रस्सी से मूढ़े बुनने की योजना का शुभारंभ किया था लेकिन सूत की रस्सी के मूढ़ों को बनाने में खर्च अधिक आने के चलते योजना परवान नहीं चढ़ सकी। योजना के अनुसार सूत की रस्सी से तैयार मूढ़ों को बुनकरों से खरीदकर प्रशासनिक स्तर पर बाजारों में बेचा जाना था। लेकिन लागत अधिक और मुनाफा कम होने की बात कहकर बुनकरों नें सूत का मूढ़ा बनाने से हाथ खड़े कर दिए थे। लागत कम करने को पूर्व सांसद की तरफ से कोई सहयोग नहीं दिया गया।
विज्ञापन
बिजनौर। मंडावर थाना क्षेत्र का दयालवाला गांव प्राचीन मूढ़ा उद्योग को आज भी जिंदा रखे हुए है। इस गांव के सैकड़ों परिवार मूढ़ा निर्माण कार्य से जुड़े हैं। करीब आधा गांव कांस और सर्वे से तैयार होने वाले मूढ़ों, कुर्सियों, मेजों और सोफा सेट को बनाकर अपने परिवार की गुजर-बसर करता है। इस गांव में निर्मित बेहद खूबसूरत मूढ़े देश के कई राज्यों में निर्यात किए जाते हैं। स्थानीय क्षेत्र में भी इस उत्पाद की जबरदस्त मांग है। कोरोना महामारी के चलते मूढ़ा उद्योग के काम में काफी गिरावट आई है। अब गांवों में फेरी लगाकर सामान बेचना पड़ रहा है।
दयालवाला मंडावर-बालावाली मार्ग पर बसा एक घनी आबादी वाला गांव है। इस गांव की करीब आधी आबादी मूढ़ा उद्योग से जुड़ी है। गांव के करीब 150 परिवार कई पीड़ियों से मूढ़ा बुनने के काम को करते आ रहे हैं। इस गांव में काफी बड़े स्तर पर मूढ़ा और उसके जैसे उत्पाद तैयार किए जाते हैं। आधुनिक युग में प्लास्टिक, लोहा और लकड़ी की बेहतरीन नक्काशी की कुर्सियों की मांग है। लेकिन आज भी कांस और सर्वे से निर्मित कुर्सी, मूढ़ा, सोफा सेट और मेज का अपना अलग महत्व है। बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए मूढ़ा उद्योग भी काफी समय से लाइलोन की रस्सी से निर्मित रंग-बिरंगे खूबसूरत मूढ़े बना रहा है। स्थानीय बाजार के अलावा दूसरे राज्यों में इस गांव के बने मूढ़ों की काफी मांग है। हिमाचल प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर आदि प्रदेशों में यहां के मूढ़े खूब पसंद किए जाते हैं। अधिकांश सामान दूसरे राज्यों को ही निर्यात किया जाता है। बच्चे से लेकर बूढ़े तक परिवार के सभी सदस्य इस कारोबार में अपनी भूमिका निभाते हैं। अलग-अलग जाति व धर्म के सैकड़ों परिवार इस काम के जरिए अपने परिवार की गुजर-बसर कर रहे हैं। पूरा परिवार सुबह से शाम तक मूढ़ा बनाने के काम शिद्दत से लगा रहता है।
विज्ञापन
मूढ़ा बनाने की विधि और आवश्यक सामग्री
कई दशकों से मूढ़ा बुनते आ रहे धर्मवीर सिंह (70) बताते हैं कि मूढ़ा बनाने में कांस और सर्वे (सरकंडे) का इस्तेमाल किया जाता है। कांस को काटकर एक सप्ताह तक धूप में सुखाया जाता है, जबकि सर्वे करीब एक से दो माह में सूखकर प्रयोग करने योग्य बन पाते हैं। कांस को सूखाने के बाद उसे अच्छी तरह से पीटकर बारीक किया जाता है। उसके बाद उससे रस्सी बांटकर धूप में सुखाई जाती है। रस्सी बांटने और सुखाने का काम परिवार के बच्चे और महिलाएं करते हैं। फिर सर्वे की छंटाई और कटाई का काम होता है। यह सब काम पूरा होने पर मूढ़ा बुनने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति को एक कुर्सी को तैयार करने में पूरा दिन लग जाता है। सोफा तैयार करने में चार से पांच दिन लगते हैं। वहीं एक दिन में दो मूढ़े और एक मेज तैयार होती है।
विज्ञापन
मूढ़ा बनाने की लागत और मुनाफा
मूढ़ा बुनकर राहुल बताते हैं कि कांस की रस्सी और सर्वे से बनी कुर्सी को बनाने में करीब 400 रुपये की लागत आती है। मूढ़े में 150 रुपये, सोफे में 700 रुपये और मेज में 400 रुपये की लागत आती है। जबकि कुर्सी 700 रुपये, मेज 700 रुपये, मूढ़ा 300 रुपये और एक सोफा सेट करीब चार हजार रुपये में बिकता है। सोफा सेट में सोफे के साथ दो कुर्सी भी शामिल होती हैं। वहीं नाइलोन की रस्सी का प्रयोग करने में लागत 30 से 40 प्रतिशत बढ़ जाती है। नाइलोन की रंग-बिरंगी डोरी से बने मूढ़े देखने में बेहद खूबसूरत लगते हैं। इसलिए महंगे दामों पर आसानी से बिक भी जाते हैं। बताया कि अधिकांश सामान दूसरे राज्यों को निर्यात होता है। कुछ सामान घर से ही बिक जाता है। इसके अलावा गांव के कुछ लोग कमीशन बेस पर साईकिल और बाइक से ग्रामीण क्षेत्रों में फेरी करते हैं। इस तरह पूरी दिन की मेहनत के बाद मजदूरी निकल आती है। इस काम में सरकार की तरफ से कोई सहायता नहीं मिलती।
कोरोना महामारी से कारोबार में आई कमी
मूढ़ा बुनकर सोनू का कहना हैं कि कोरोना महामारी के कारण दूसरे राज्यों को सामान का निर्यात पूरी तरह से ठप पड़ा है। इस काम के अलावा उनके पास आमदनी का कोई दूसरा साधन नहीं है। इसलिए स्थानीय गांवों में फेरी वालों की संख्या बढ़ा काफी मशक्कत से सामान बेचाकर किसी तरह काम चलाया जा रहा है।
पूर्व सांसद भरतेंद्र ने किया था सूत के मूढ़ों का शुभारंभ
नितिन बताते हैं कि पूर्व सांसद भरतेंद्र सिंह ने करीब तीन साल पहले सूत की रस्सी से मूढ़े बुनने की योजना का शुभारंभ किया था लेकिन सूत की रस्सी के मूढ़ों को बनाने में खर्च अधिक आने के चलते योजना परवान नहीं चढ़ सकी। योजना के अनुसार सूत की रस्सी से तैयार मूढ़ों को बुनकरों से खरीदकर प्रशासनिक स्तर पर बाजारों में बेचा जाना था। लेकिन लागत अधिक और मुनाफा कम होने की बात कहकर बुनकरों नें सूत का मूढ़ा बनाने से हाथ खड़े कर दिए थे। लागत कम करने को पूर्व सांसद की तरफ से कोई सहयोग नहीं दिया गया।

धर्मवीर सिंह।(मूढ़ा बुनकर)- फोटो : BIJNOR

राहुल।(मूढ़ा बुनकर)- फोटो : BIJNOR

नितिन।(मूढ़ा बुनकर)- फोटो : BIJNOR