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23 साल बाद घर लौटा युवक
ब्यूरो / अमर उजाला, बिजनौर
Updated Wed, 18 Nov 2015 12:30 AM IST
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नींदडू। पिता की डांट से नाराज होकर 23 साल पहले घर छोड़ कर चला गया राजकुमार लौट आया। किसी फिल्मी सीन की तरह बेटे को अचानक सामने देख परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।
घर लौटे लतीफुल्लापुर उर्फ नवादा निवासी घासीराम प्रजापति के मंझले बेटे राज कुमार (35) ने बताया कि वह जनता इंटर कॉलेज बसेढ़ा में कक्षा छह का छात्र था। उस समय उसकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। रोजाना की तरह उस दिन भी स्कूल पढ़ने गया था, लेकिन घर से जाते समय पिता घासीराम से नोक झोंक हो गई थी।
पिता के बुरा भला कहने से नाराज होने के चलते वह घर नहीं लौटा था। अपना बस्ता और साइकिल गांव के व्यक्ति को देकर दिल्ली चला गया था। डेढ़ महीने दिल्ली रहने के बाद वह मुंबई पहुंच गया, जहां करीब दस वर्ष रहा। इस बीच उसने वहां चौकीदारी का कार्य किया।
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मालिक द्वारा वेतन नहीं देने के कारण वह वहां से गोवा चला गया। इसके बाद उसने कोलकाता, चेन्नई और गुजरात समेत देश के कई नगरों में मजदूरी और चौकीदारी का कार्य किया। उसने बताया कि एक दिन उसे घर वालों की याद आई।
वह बिना कोई देरी किए गुजरात से बिजनौर के लिए चल दिया। कहना था कि इस बीच गांव में काफी तब्दीली आ गई, लेकिन उसे गांव के रास्ते और घर याद था।
घर पहुंचने पर उसने बड़े भाई विजेंद्र, छोटे भाई हरिओम तथा मां निर्मला देवी को पहचान लिया। गांव के बुजुर्ग और ग्रामीणों ने भी राजकुमार को पहचान लिया।
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घर लौटे लतीफुल्लापुर उर्फ नवादा निवासी घासीराम प्रजापति के मंझले बेटे राज कुमार (35) ने बताया कि वह जनता इंटर कॉलेज बसेढ़ा में कक्षा छह का छात्र था। उस समय उसकी उम्र करीब 12 वर्ष थी। रोजाना की तरह उस दिन भी स्कूल पढ़ने गया था, लेकिन घर से जाते समय पिता घासीराम से नोक झोंक हो गई थी।
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पिता के बुरा भला कहने से नाराज होने के चलते वह घर नहीं लौटा था। अपना बस्ता और साइकिल गांव के व्यक्ति को देकर दिल्ली चला गया था। डेढ़ महीने दिल्ली रहने के बाद वह मुंबई पहुंच गया, जहां करीब दस वर्ष रहा। इस बीच उसने वहां चौकीदारी का कार्य किया।
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मालिक द्वारा वेतन नहीं देने के कारण वह वहां से गोवा चला गया। इसके बाद उसने कोलकाता, चेन्नई और गुजरात समेत देश के कई नगरों में मजदूरी और चौकीदारी का कार्य किया। उसने बताया कि एक दिन उसे घर वालों की याद आई।
वह बिना कोई देरी किए गुजरात से बिजनौर के लिए चल दिया। कहना था कि इस बीच गांव में काफी तब्दीली आ गई, लेकिन उसे गांव के रास्ते और घर याद था।
घर पहुंचने पर उसने बड़े भाई विजेंद्र, छोटे भाई हरिओम तथा मां निर्मला देवी को पहचान लिया। गांव के बुजुर्ग और ग्रामीणों ने भी राजकुमार को पहचान लिया।