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Bijnor News: गन्ने की मिठास नेे फीका किया दलहन का स्वाद

Thu, 09 Jul 2026 01:08 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 09 Jul 2026 01:08 AM IST
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The sweetness of sugarcane has dulled the taste of pulses
ब्रजवीर चौधरी
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बिजनौर। जनपद बिजनौर की खेती में पिछले 54 वर्षों में बदलाव आया है। वर्ष 1971-72 में 76 हजार हेक्टेयर में होने वाली गन्ने की खेती अब बढ़कर 2.65 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। वहीं अरहर, मूंग, चना, मटर, सांवा और कपास जैसी दलहन व परंपरागत फसलों का रकबा लगातार सिमटता जा रहा है।
नकदी फसल के रूप में गन्ने ने किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत की, लेकिन खेती का संतुलन बिगड़ने के साथ दलहन उत्पादन में भारी गिरावट आई है। कृषि विशेषज्ञ इसे पोषण और मिट्टी दोनों के लिए चिंता का विषय मान रहे हैं।
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बिजनौर में पांच दशकों में गन्ने का वर्चस्व लगातार बढ़ा है। जिला गजेटियर और कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1971-72 में जिले में 76 हजार हेक्टेयर में गन्ने की खेती होती थी, जबकि वर्ष 2026 में इसका रकबा बढ़कर 2 लाख 65 हजार हेक्टेयर हो गया है। जिले में वर्तमान में 10 चीनी मिलें संचालित हैं, जबकि पहले गन्ना प्रसंस्करण के लिए 844 गन्ना क्रेशर और पावर कोल्हू थे, जिनकी संख्या घटकर 130 रह गई है।
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दलहन और परंपरागत फसलों का क्षेत्रफल लगातार हुआ कम : वर्ष 1971-72 में 19,713 हेक्टेयर में चना, 3,332 हेक्टेयर में मसूर, 1,687 हेक्टेयर में अरहर और 1,274 हेक्टेयर में सांवा बोया जाता था। अब अरहर मात्र 9 हेक्टेयर, मूंग 219 हेक्टेयर, कपास 3 हेक्टेयर, चना 155 हेक्टेयर और मटर 110 हेक्टेयर तक सिमट गई है।
बढ़ाया जा रहा दलहन व मिलेट्स का रकबा : जिला कृषि अधिकारी जसवीर सिंह तेवतिया ने बताया कि जिले में दलहन और मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए किसानों को ज्वार, सांवा, उड़द और मसूर के बीज किट निशुल्क वितरित किए जा रहे हैं। सहफसली खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है और किसानों को दलहन के लाभों के प्रति जागरूक किया जा रहा है।

दलहन की खेती से लाभ : दलहन मिट्टी में प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ाकर उसकी उर्वरता बनाए रखती है।, दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं और मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभकारी हैं।, दलहन की खेती से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है।, फसल विविधीकरण से किसानों की आय और खेती दोनों अधिक टिकाऊ बनती हैं।
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