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अब नहीं दिखता डाकिया, एप से बंट रही डाक
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अब नहीं दिखता डाकिया, एप से बंट रही डाक
बिजनौर। अब कहीं भी डाकिया डाक बांटते दिखाई नहीं देते। चार दशक पहले तक पैदल घूम कर चिट्ठी बांटने वाले डाकिया दौर के साथ बदल गए हैं। अब मोबाइल एप से डाक बंट रही हैं और बाइक से डाकिया आता है। समय ने तमाम बदलाव कर दिए हैं। अब अपनों की खबर लेने देने वाली चिट्ठी नहीं आती, सिर्फ जरूरी डाक आती हैं। फोन, ईमेल से लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है।
एक अप्रैल 1854 को देश में पहले डाकघर की शुरुआत हुई थी। इसके बाद पूरे देश में डाक विभाग का नेटवर्क बना। मनी ऑर्डर और तार जैसी सुविधाएं डाक विभाग ही देता रहा। शादीपुर के रहने वाले गोविंद गुप्ता बताते हैं कि अब गांव में डाकिया आता है तो मालूम नहीं पड़ता। साल 1985 आते आते डाकिया भी बदलने शुरू हो गए थे। पहले डाकिया घोड़ा तांगे में बैठकर आता था। गांव में पैदल ही घूमकर चिट्ठी बांट देता था। पूरे मोहल्ले को जानकारी हो जाती थी कि उनके यहां चिट्ठी आई है। अब डाकिया बाइक से आते हैं और चले जाते हैं।
नवनीत गुप्ता ने सहेज रखी हैं दशकों पुरानी चिट्ठी
शादीपुर के ही रहने वाले नवनीत गुप्ता को पुरानी चिट्ठी सहेजने का शौक है। इनके पास 1959 तक की चिट्ठियां सुरक्षित हैं। उनके पिता ने अमरोहा रहकर पढ़ने के दौरान 1960 के दशक में काफी चिट्टियां लिख कर घर भेजीं। हालांकि अब उनके पिता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे हुए वह पत्र आज भी सुरक्षित रखे हैं। नवनीत गुप्ता के पास छह पैसे वाला पोस्टकार्ड भी सुरक्षित है। साथ ही अंतर्देशीय पत्र, मनी ऑर्डर, सरकारी पावती रशीद तथा सैनिकों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले पत्र भी उन्होंने सहेज रखे हैं।
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रेडियो का लाइसेंस देेता था डाक विभाग
पोस्टमास्टर लक्ष्मीकांत जोशी बताते हैं कि डाक तार विभाग तार अधिनियम 1885 के तहत रेडियो सुनने का लाइसेंस भी जारी करता था। कई लोगों के एक साथ सुनने पर कामर्शियल लाइसेंस लेना होता था। जिसका लाइसेंस शुल्क बीस रुपये होता था। प्राइवेट का शुल्क कम था। बाद में इसे बंद कर दिया गया। इसके अलावा टेलीग्राम भी डाकखाने में ही आते थे। अब तार बंद हो चुके हैं। पोस्टकार्ड नाममात्र ही आते हैं, पत्रिका आदि की पोस्ट काफी आती जाती हैं। उन्होंने बताया कि अब नई तकनीक आ गई है, रिकॉर्ड रखने में आसानी है। डाक डिलीवर होते ही मोबाइल पर संदेश आ जाता है।
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बिजनौर। अब कहीं भी डाकिया डाक बांटते दिखाई नहीं देते। चार दशक पहले तक पैदल घूम कर चिट्ठी बांटने वाले डाकिया दौर के साथ बदल गए हैं। अब मोबाइल एप से डाक बंट रही हैं और बाइक से डाकिया आता है। समय ने तमाम बदलाव कर दिए हैं। अब अपनों की खबर लेने देने वाली चिट्ठी नहीं आती, सिर्फ जरूरी डाक आती हैं। फोन, ईमेल से लेकर सोशल मीडिया के माध्यम से संदेशों का आदान-प्रदान किया जाता है।
एक अप्रैल 1854 को देश में पहले डाकघर की शुरुआत हुई थी। इसके बाद पूरे देश में डाक विभाग का नेटवर्क बना। मनी ऑर्डर और तार जैसी सुविधाएं डाक विभाग ही देता रहा। शादीपुर के रहने वाले गोविंद गुप्ता बताते हैं कि अब गांव में डाकिया आता है तो मालूम नहीं पड़ता। साल 1985 आते आते डाकिया भी बदलने शुरू हो गए थे। पहले डाकिया घोड़ा तांगे में बैठकर आता था। गांव में पैदल ही घूमकर चिट्ठी बांट देता था। पूरे मोहल्ले को जानकारी हो जाती थी कि उनके यहां चिट्ठी आई है। अब डाकिया बाइक से आते हैं और चले जाते हैं।
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नवनीत गुप्ता ने सहेज रखी हैं दशकों पुरानी चिट्ठी
शादीपुर के ही रहने वाले नवनीत गुप्ता को पुरानी चिट्ठी सहेजने का शौक है। इनके पास 1959 तक की चिट्ठियां सुरक्षित हैं। उनके पिता ने अमरोहा रहकर पढ़ने के दौरान 1960 के दशक में काफी चिट्टियां लिख कर घर भेजीं। हालांकि अब उनके पिता इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके लिखे हुए वह पत्र आज भी सुरक्षित रखे हैं। नवनीत गुप्ता के पास छह पैसे वाला पोस्टकार्ड भी सुरक्षित है। साथ ही अंतर्देशीय पत्र, मनी ऑर्डर, सरकारी पावती रशीद तथा सैनिकों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले पत्र भी उन्होंने सहेज रखे हैं।
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रेडियो का लाइसेंस देेता था डाक विभाग
पोस्टमास्टर लक्ष्मीकांत जोशी बताते हैं कि डाक तार विभाग तार अधिनियम 1885 के तहत रेडियो सुनने का लाइसेंस भी जारी करता था। कई लोगों के एक साथ सुनने पर कामर्शियल लाइसेंस लेना होता था। जिसका लाइसेंस शुल्क बीस रुपये होता था। प्राइवेट का शुल्क कम था। बाद में इसे बंद कर दिया गया। इसके अलावा टेलीग्राम भी डाकखाने में ही आते थे। अब तार बंद हो चुके हैं। पोस्टकार्ड नाममात्र ही आते हैं, पत्रिका आदि की पोस्ट काफी आती जाती हैं। उन्होंने बताया कि अब नई तकनीक आ गई है, रिकॉर्ड रखने में आसानी है। डाक डिलीवर होते ही मोबाइल पर संदेश आ जाता है।