{"_id":"63f0edb0be06bc5b15097f23","slug":"the-fear-is-haunting-naginas-guldar-may-not-become-a-cannibal-like-chandak-bijnor-news-c-14-1-123630-2023-02-18","type":"story","status":"publish","title_hn":"बिजनौर: सता रहा डर, चंदक की तरह नरभक्षी न बन जाए नगीना का गुलदार","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बिजनौर: सता रहा डर, चंदक की तरह नरभक्षी न बन जाए नगीना का गुलदार
विज्ञापन
- मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट ने बताया था नरभक्षी गुलदार होता है बाघ से ज्यादा खतरनाक
- रुद्रप्रयाग के नरभक्षी ने ले ली थी 125 लोगों की जान
रजनीश त्यागी
बिजनौर। नगीना में 14 वर्षीय किशोरी को मारने वाले गुलदार को लेकर पकड़ने के लिए पिंजरे से लेकर ट्रैप कैमरे तक लगा दिए गए हैं, लेकिन इसी बीच चंदक के नरभक्षी गुलदार की याद ने सबकी नींद उड़ा दी है। वन विभाग हो या आम आदमी, डर इसी बात का सता रहा है कि कहीं नगीना का गुलदार नरभक्षी न बन जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर यह कितनी तबाही मचाएगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
पुरानी बात करें तो रुद्रप्रयाग क्षेत्र में सन् 1918 में एक गुलदार नरभक्षी हुआ और आठ साल तक यह किसी के हाथ नहीं लगा। इस दौरान इसने 125 लोगों को मार डाला। फिर शिकारी जिम कार्बेट ने 1926 में इस गुलदार को अपनी गोली का निशाना बनाया। इस गुलदार का खौफ इतना था कि उस क्षेत्र के लोग अंधेरा होते ही अपने घरों में घुस जाते थे। जिम कार्बेट ने मैन इटर ऑफ रुद्रप्रयाग में इसका विस्तार से जिक्र किया है। इसके बार में जिम कार्बेट ने लिखा है कि यह इतना खतरनाक था कि यदि गलती से इस क्षेत्र में कोई व्यक्ति घर से बाहर निकल गया, तो सुबह उसका क्षत विक्षत शव ही मिलता था। इसके आतंक की खबरें देश ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के अखबारों की भी सुर्खियां भी बनने लगी थी। ब्रिटेन की संसद में भी उसकी चर्चा होने लगी थी। सेना की विशेष यूनिट भी इस गुलदार को मारने में कामयाब न हो सकी थी, इसके बाद उत्तर प्रदेश के गवर्नर ने मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट से संपर्क किया। 1925 में उन्हें तेंदुए को मारने की इजाजत मिली। वहां पहुंचने के बाद भी उन्हें शातिर तेंदुए तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार 26 मई 1926 की रात जिम कॉर्बेट को कामयाबी मिल गई और उन्होंने गोली मारकर तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया।
किरतपुर-चंदक क्षेत्र के गुलदार ने ली थी पांच लोगों की जान
तीन साल पहले ऐसा ही हाल कुछ किरतपुर-चंदक के बीच में एक गुलदार का था। उसे पकड़ने के लिए खूब शिकारी लगाए गए। खूब पिंजरे, ड्रोन कैमरों की मदद ली गई, लेकिन कोई भी उसकी लोकेशन तक नहीं ढूंढ पाया। उसने एक के बाद एक पांच लोगों की जान ले ली थी।
विज्ञापन
शिकार को दूर ले जाकर खाए तो नरभक्षी होने के लक्षण
जोएल लॉयल रिसर्च स्कॉलर ऑफ जिम कार्बेट और द जंगल टेल के लेखक जोएल लॉयल कहते हैं कि यदि गुलदार अपने शिकार को हमले की जगह से दूर खींचकर ले जाता है और वहां जाकर उसे खाता है तो यह उसके नरभक्षी बनने के पहले संकेत हैं। एक बार इंसानी खून यदि गुलदार चख ले, तो फिर वह उसका आदी हो जाता है। तीन से चार दिन के भीतर वह दोबारा उसी जगह पांच किलोमीटर के दायरे में दोबारा हमला कर सकता है। नगीना में भी किशोरी को गुलदार खींचकर ले गया है, ऐसे में वहां के लोगों को रात में सतर्क रहने की आवश्यकता है।
घायल होने या बूढ़ा होने पर नरभक्षी बनता है गुलदार
यूं तो आमतौर पर गुलदार या बाघ इंसानों पर हमला नहीं करते। वन विशेषज्ञ बताते हैं कि इंसानों के झुके होने या बैठे होने पर अधिकांश हमले हुए हैं। इसके अलावा घायल होने या बूढ़ा होने पर गुलदार इंसानों पर हमला करता है। कुमाउं के नरभक्षी किताब में जिम कॉर्बेट ने इसका जिक्र करते हुए लिखा था कि जब उस बूढ़े तेंदुए को देखा तो पता चला कि उसका एक नुकीला दांत काफी पहले से टूटा हुआ था। असल में दो नौसिखिये शिकारियों ने आठ-नौ साल पहले उस जवान तेंदुए का शिकार करने की कोशिश की थी, गोली उसके दांत में लगी और तब से वो जंगली जानवरों का शिकार कर पाने में असक्षम हो गया। भूख से बेहाल तेंदुए ने पेट भरने के लिए इंसानों पर हमले शुरू कर दिए थे।
विज्ञापन
- रुद्रप्रयाग के नरभक्षी ने ले ली थी 125 लोगों की जान
रजनीश त्यागी
बिजनौर। नगीना में 14 वर्षीय किशोरी को मारने वाले गुलदार को लेकर पकड़ने के लिए पिंजरे से लेकर ट्रैप कैमरे तक लगा दिए गए हैं, लेकिन इसी बीच चंदक के नरभक्षी गुलदार की याद ने सबकी नींद उड़ा दी है। वन विभाग हो या आम आदमी, डर इसी बात का सता रहा है कि कहीं नगीना का गुलदार नरभक्षी न बन जाए। यदि ऐसा हुआ तो फिर यह कितनी तबाही मचाएगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
पुरानी बात करें तो रुद्रप्रयाग क्षेत्र में सन् 1918 में एक गुलदार नरभक्षी हुआ और आठ साल तक यह किसी के हाथ नहीं लगा। इस दौरान इसने 125 लोगों को मार डाला। फिर शिकारी जिम कार्बेट ने 1926 में इस गुलदार को अपनी गोली का निशाना बनाया। इस गुलदार का खौफ इतना था कि उस क्षेत्र के लोग अंधेरा होते ही अपने घरों में घुस जाते थे। जिम कार्बेट ने मैन इटर ऑफ रुद्रप्रयाग में इसका विस्तार से जिक्र किया है। इसके बार में जिम कार्बेट ने लिखा है कि यह इतना खतरनाक था कि यदि गलती से इस क्षेत्र में कोई व्यक्ति घर से बाहर निकल गया, तो सुबह उसका क्षत विक्षत शव ही मिलता था। इसके आतंक की खबरें देश ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन के अखबारों की भी सुर्खियां भी बनने लगी थी। ब्रिटेन की संसद में भी उसकी चर्चा होने लगी थी। सेना की विशेष यूनिट भी इस गुलदार को मारने में कामयाब न हो सकी थी, इसके बाद उत्तर प्रदेश के गवर्नर ने मशहूर शिकारी जिम कॉर्बेट से संपर्क किया। 1925 में उन्हें तेंदुए को मारने की इजाजत मिली। वहां पहुंचने के बाद भी उन्हें शातिर तेंदुए तक पहुंचने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। आखिरकार 26 मई 1926 की रात जिम कॉर्बेट को कामयाबी मिल गई और उन्होंने गोली मारकर तेंदुए को मौत के घाट उतार दिया।
विज्ञापन
किरतपुर-चंदक क्षेत्र के गुलदार ने ली थी पांच लोगों की जान
तीन साल पहले ऐसा ही हाल कुछ किरतपुर-चंदक के बीच में एक गुलदार का था। उसे पकड़ने के लिए खूब शिकारी लगाए गए। खूब पिंजरे, ड्रोन कैमरों की मदद ली गई, लेकिन कोई भी उसकी लोकेशन तक नहीं ढूंढ पाया। उसने एक के बाद एक पांच लोगों की जान ले ली थी।
विज्ञापन
शिकार को दूर ले जाकर खाए तो नरभक्षी होने के लक्षण
जोएल लॉयल रिसर्च स्कॉलर ऑफ जिम कार्बेट और द जंगल टेल के लेखक जोएल लॉयल कहते हैं कि यदि गुलदार अपने शिकार को हमले की जगह से दूर खींचकर ले जाता है और वहां जाकर उसे खाता है तो यह उसके नरभक्षी बनने के पहले संकेत हैं। एक बार इंसानी खून यदि गुलदार चख ले, तो फिर वह उसका आदी हो जाता है। तीन से चार दिन के भीतर वह दोबारा उसी जगह पांच किलोमीटर के दायरे में दोबारा हमला कर सकता है। नगीना में भी किशोरी को गुलदार खींचकर ले गया है, ऐसे में वहां के लोगों को रात में सतर्क रहने की आवश्यकता है।
घायल होने या बूढ़ा होने पर नरभक्षी बनता है गुलदार
यूं तो आमतौर पर गुलदार या बाघ इंसानों पर हमला नहीं करते। वन विशेषज्ञ बताते हैं कि इंसानों के झुके होने या बैठे होने पर अधिकांश हमले हुए हैं। इसके अलावा घायल होने या बूढ़ा होने पर गुलदार इंसानों पर हमला करता है। कुमाउं के नरभक्षी किताब में जिम कॉर्बेट ने इसका जिक्र करते हुए लिखा था कि जब उस बूढ़े तेंदुए को देखा तो पता चला कि उसका एक नुकीला दांत काफी पहले से टूटा हुआ था। असल में दो नौसिखिये शिकारियों ने आठ-नौ साल पहले उस जवान तेंदुए का शिकार करने की कोशिश की थी, गोली उसके दांत में लगी और तब से वो जंगली जानवरों का शिकार कर पाने में असक्षम हो गया। भूख से बेहाल तेंदुए ने पेट भरने के लिए इंसानों पर हमले शुरू कर दिए थे।