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जिले में बसपा और भाजपा का रहा है दबदबा
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Thu, 05 Jan 2017 12:41 AM IST
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बिजनौर में विधानसभा के पिछले तीन चुनाव में बसपा का जिले की सीटों पर दबदबा रहा है। 2007 के चुनाव में तो बसपा ने जिले की सभी सातों सीटों पर अपना परचम लहरा दिया था। बसपा के वोटों का काट ढूंढने के लिए अन्य दलों को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। इसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली। सपा और भाजपा के प्रत्याशी बसपा के प्रत्याशियों से चुनावी मैदान में लोहा लेते आए हैं।
बिजनौर विधानसभा सीट अब तक भाजपा का गढ़ रहा है। इस सीट पर दो बार भाजपा ने कब्जा किया है। 2002 व 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के भारतेंद्र सिंह बिजनौर विधानसभा सीट से दो बार विधायक चुने गए। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी तसलीम अहमद को भारतेंद्र सिंह ने चुनावी मैदान में मात दी थी। भारतेंद्र सिंह को 52,195 तथा तसलीम अहमद को 35,856 वोट मिले थे, तब भाजपा और रालोद का गठबंधन था। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया। बसपा प्रत्याशी शाहनवाज राणा ने भाजपा प्रत्याशी भारतेंद्र सिंह को चुनाव हरा दिया। शाहनवाज राना को 61,588 वोट मिले थे। भारतेंद्र सिंह को 61 हजार 31 वोट मिले। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी भारतेंद्र सिंह फिर से विधायक बन गए। उन्होंने चुनाव में बसपा प्रत्याशी महबूब अहमद को पटखनी दे दी। भारतेंद्र सिंह को 68,969 और महबूब अहमद को 51,133 वोट मिले। बसपा से निकाले जाने पर पाला बदलकर रालोद से चुनाव लड़े शाहनवाज राना तीसरे नंबर पर रहे।
चांदपुर विधानसभा से बसपा प्रत्याशी मोहम्मद इकबाल ठेकेदार का पिछले दो चुनाव से जलवा बरकरार रहा। मोहम्मद इकबाल के तिलिस्म को किसी पार्टी का प्रत्याशी नहीं तोड़ पाया। 2002 के विधानसभा चुनाव में रालोद व भाजपा गठबंधन के प्रत्याशी पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश चुनाव जीते थे। स्वामी ओमवेश ने बसपा प्रत्याशी रामअवतार सैनी को चुनाव में मात देकर दूसरी बार विधायक बने थे। स्वामी ओमवेश को 60, 595 तथा रामअवतार सैनी को 49,928 वोट मिले थे। इससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में स्वामी ओमवेश निर्दलीय विधायक बने थे। 2007 में इस सीट पर बसपा प्रत्याशी मोहम्मद इकबाल ठेकेदार ने कब्जा कर लिया। इकबाल ठेकेदार ने इस बार पाला बदलकर भाजपा से चुनाव लड़ रहे रामअवतार सैनी को शिकस्त दी। मोहम्मद इकबाल ठेकेदार को 58,808 वोट मिले थे। रामअवतार सैनी 28,797 वोट पर सिमट गए। 2012 के चुनाव में फिर से मोहम्मद इकबाल ठेकेदार विधायक बनने में कामयाब रहे। उन्होंने जेल से चुनाव लड़ रहे सपा प्रत्याशी शेरबाज पठान को पटखनी दी। मोहम्मद इकबाल ठेकेदार को 54,941 तथा शेरबाज पठान को 39, 928 वोट मिले। भाजपा प्रत्याशी कविता चौधरी तीसरे नंबर पर रही थीं।
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धामपुर विधानसभा सीट पर कई बार से सपा प्रत्याशी मूलचंद चौहान व अशोक राणा का ही कब्जा रहा है। विधायक ये दोनों ही बनते रहे हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा सरकार के मंत्री मूलचंद चौहान ने परचम लहराया था। मूलचंद चौहान ने रालोद-भाजपा गठबंधन प्रत्याशी अशोक राणा को शिकस्त दी थी। मूलचंद चौहान को 56, 597 तथा अशोक राणा को 46 हजार 44 वोट मिले थे। 2007 के चुनाव में बसपा से मैदान में उतरे अशोक राणा ने उलटफेर करते हुए मूलचंद चौहान को हरा दिया। अशोक राणा को 65,717 तथा मूलचंद चौहान को 45,191 वोट मिले थे। 2012 के चुनाव में मूलचंद चौहान ने बसपा प्रत्याशी को कड़े मुकाबले में चुनाव में पटखनी देकर अपनी पिछले चुनाव की हार का बदला चुका लिया। मूलचंद चौहान को 53, 365 वोट मिले तथा अशोक राणा को 52, 801 वोट मिले। भाजपा से राजेंद्र सिंह यहां तीसरे नंबर पर रहे थे। अशोक राणा स्योहारा सीट से पहली बार जनता दल प्रतयाशी के रूप में 89 में विधायक बने थे।
नगीना सुरक्षित विधानसभा सीट पर पिछले तीन बार के चुनाव से बसपा व सपा में ही शह मात का खेल चलता रहा है। 2002 के चुनाव में सपा प्रत्याशी पूर्व मंत्री ओमवती ने बसपा के मनोज पारस को शिकस्त दी थी। ओमवती को 42, 684 वोट तथा मनोज पारस को 40, 553 वोट मिले थे। 2007 में ओमवती पाला बदलकर बसपा में शामिल हो गईं, तो मनोज पारस ने सपा का दामन थाम लिया। दोनों फिर से आमने सामने चुनाव लड़े। मनोज पारस सपा से तो ओमवती बसपा से चुनाव लड़ीं। ओमवती मनोज पारस को चुनाव हराकर दूसरी बार विधायक बन गईं। ओमवती को 46, 551 तथा मनोज पारस को 36,764 वोट मिले। 2012 के चुनाव में सपा प्रत्याशी मनोज पारस ने बसपा प्रत्याशी ओमवती को पटखनी देकर अपनी दो हार का बदला चुका लिया। मनोज पारस को 83,997 वोट मिले तो पूर्व राज्यमंत्री ओमवती को 57,451 वोट पाकर ही सब्र करना पड़ा। भाजपा के लवकुश तीसरे नंबर पर रहे। अखिलेश सरकार ने ओमवती को हराने पर मनोज पारस को राज्यमंत्री बनाकर उनका रुतबा बढ़ा दिया। बाद में एक दुष्कर्म के मामले में नामजद होने पर मनोज पारस से लाल बत्ती छीन ली गई। नजीबाबाद विधानसभा सीट पर माकपा के रामस्वरूप सिंह का कब्जा रहा। माकपा प्रत्याशी के रूप में तीन बार इस सीट पर विधायक रहे हैं। ये एकमात्र ऐसे विधायक थे, जिनके पास गाड़ी, घोड़ा कुछ नहीं था। रामस्वरूप सिंह बस या ट्रेन से ही सफर करते थे। सपा मुखिया मुलायम सिंह का हर चुनाव में रामस्वरूप सिंह को समर्थन रहता था। रामस्वरूप सिंह के सामने सपा की ओर से कोई प्रत्याशी चुनावी मैदान में नहीं उतरता था। 2002 के चुनाव में रामस्वरूप सिंह नजीबाबाद सीट से तीसरी बार विधायक चुने गए। उन्होंने बसपा प्रत्याशी शीशराम सिंह को चुनाव मैदान में मात दी। रामस्वरूप सिंह को 40, 426 तथा शीशराम सिंह को 35,584 वोट मिले। पूर्व विधायक रामस्वरूप सिंह की मौत के बाद 2007 में इस सीट पर बसपा ने कब्जा कर लिया। बसपा के शीशराम सिंह ने पूर्व विधायक रामस्वरूप सिंह के बेटे राजकुमार को हरा दिया। शीशराम सिंह को 49, 984 तथा राजकुमार को 41, 860 वोट मिले। 2012 के चुनाव में बसपा का इस सीट पर कब्जा बरकरार रहा। बसपा ने विधायक शीशराम सिंह की जगह नजीबाबाद नगर पालिका के चेयरमैन तसलीम अहमद को चुनाव मैदान में उतारा। तसलीम अहमद चुनाव जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी राजीव अग्रवाल को हराया। तसलीम अहमद को 62,713 तथा राजीव अग्रवाल को 51,130 वोट मिले। सपा के शाहिद अली खां यहां तीसरे नंबर पर रहे।
नहटौर विधानसभा सीट पर विधानसभा चुनाव में नए परिसीमन के तहत नहटौर विधानसभा सुरक्षित सीट पहली बार बनी। इस सीट पर सभी पार्टियों ने अपनी ताकत झोंक दी। हालांकि पहली बार चुनाव लड़ रहे ओम कुमार सबको मात देकर विधायक बन गए। ओम कुमार ने सपा प्रत्याशी राजकुमार राजू को चुनाव हरा दिया। ओम कुमार को 51,389 वोट मिले थे। राजकुमार राजू को 31, 991 वोट ही मिले। ओम कुमार ने अब बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है। वह इस सीट पर भाजपा के टिकट के बड़े दावेदार हैं।
नूरपुर विधानसभा से पहले यह सीट स्योहारा विधानसभा के नाम से थी। स्योहारा विधानसभा से 2002 में बसपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन ने भाजपा के डा. वेदप्रकाश सिंह को हराया। कुतबुद्दीन को 37,853 तथा डा.वेदप्रकाश सिंह को 35,704 वोट मिले। बाद में कुतबुद्दीन पाला बदलकर सपा में चले गए और राज्यमंत्री बने। 2007 के चुनाव में यह सीट फिर से बसपा के खाते में गई। बसपा ने यहां से ठाकुर यशपाल सिंह पर दांव खेला। ठाकुर यशपाल सिंह ने सपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन को हरा दिया। ठाकुर यशपाल सिंह को 47, 751 तथा कुतबुद्दीन को 32, 837 वोट मिले। बसपा की सरकार बनने पर ठाकुर यशपाल सिंह को राज्यमंत्री बनाया गया।
2012 के चुनाव में नए परिसीमन में स्योहारा की जगह नूरपुर विधानसभा सीट बनी। चुनाव से पहले ठाकुर यशपाल सिंह को बसपा से निष्कासित कर दिया गया तो वे रालोद से चुनाव मैदान में कूदे। हालांकि नए परिसीमन में यह सीट भाजपा के खाते में गई। भाजपा प्रत्याशी लोकेंद्र चौहान पहली बार यहां से विधायक बने। लोकेंद्र चौहान ने बसपा प्रत्याशी मोहम्मद उस्मान को हराया। लोकेंद्र चौहान को 47, 556 वोट मिले। बसपा के मोहम्मद उस्मान 42, हजार 93 वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। सपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन अंसारी तीसरे नंबर पर रहे।
बढ़ापुर विधानसभा सीट:पहले ये सीट अफजलगढ़ विधानसभा के नाम से थी। यहां पर पहले भाजपा का दबदबा रहा। भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह लगातार तीन बार इस सीट से विधायक रहे। 2002 में डा.इंद्रदेव सिंह ने बसपा प्रत्याशी मोहम्मद गाजी को हराया। डा.इंद्रदेव सिंह को 41, 532 वोट तथा मोहम्मद गाजी को 40, 805 वोट मिले। बसपा ने 2007 के विधानसभा चुनाव में मोहम्मद गाजी पर फिर से भरोसा जताया और उन्हें प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। इस बार मोहम्मद गाजी ने भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह का तिलिस्म तोड़ दिया। मोहम्मद गाजी पहली बार विधायक बने। मोहम्मद गाजी को 59, 496 तथा डा.इंद्रदेव सिंह को 51 हजार 66 सीट मिलीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में नए परिसीमन में अफजलगढ़ की जगह बढ़ापुर विधानसभा सीट बनी।
बढ़ापुर सीट पर भी मोहम्मद गाजी का जलवा बरकरार रहा। मोहम्मद गाजी ने भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह को फिर से हराया और दूसरी बार विधायक बने। मोहम्मद गाजी को 68,436 तथा डा.इंद्रदेव सिंह को 41 हजार 51 वोट मिले। महान दल की साधना सिंह तीसरे नंबर पर रहीं। साधना सिंह मुरादाबाद के सांसद कुंवर सर्वेश सिंह की पत्नी हैं।
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बिजनौर विधानसभा सीट अब तक भाजपा का गढ़ रहा है। इस सीट पर दो बार भाजपा ने कब्जा किया है। 2002 व 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के भारतेंद्र सिंह बिजनौर विधानसभा सीट से दो बार विधायक चुने गए। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी तसलीम अहमद को भारतेंद्र सिंह ने चुनावी मैदान में मात दी थी। भारतेंद्र सिंह को 52,195 तथा तसलीम अहमद को 35,856 वोट मिले थे, तब भाजपा और रालोद का गठबंधन था। 2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने इस सीट पर कब्जा कर लिया। बसपा प्रत्याशी शाहनवाज राणा ने भाजपा प्रत्याशी भारतेंद्र सिंह को चुनाव हरा दिया। शाहनवाज राना को 61,588 वोट मिले थे। भारतेंद्र सिंह को 61 हजार 31 वोट मिले। 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी भारतेंद्र सिंह फिर से विधायक बन गए। उन्होंने चुनाव में बसपा प्रत्याशी महबूब अहमद को पटखनी दे दी। भारतेंद्र सिंह को 68,969 और महबूब अहमद को 51,133 वोट मिले। बसपा से निकाले जाने पर पाला बदलकर रालोद से चुनाव लड़े शाहनवाज राना तीसरे नंबर पर रहे।
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चांदपुर विधानसभा से बसपा प्रत्याशी मोहम्मद इकबाल ठेकेदार का पिछले दो चुनाव से जलवा बरकरार रहा। मोहम्मद इकबाल के तिलिस्म को किसी पार्टी का प्रत्याशी नहीं तोड़ पाया। 2002 के विधानसभा चुनाव में रालोद व भाजपा गठबंधन के प्रत्याशी पूर्व मंत्री स्वामी ओमवेश चुनाव जीते थे। स्वामी ओमवेश ने बसपा प्रत्याशी रामअवतार सैनी को चुनाव में मात देकर दूसरी बार विधायक बने थे। स्वामी ओमवेश को 60, 595 तथा रामअवतार सैनी को 49,928 वोट मिले थे। इससे पहले हुए विधानसभा चुनाव में स्वामी ओमवेश निर्दलीय विधायक बने थे। 2007 में इस सीट पर बसपा प्रत्याशी मोहम्मद इकबाल ठेकेदार ने कब्जा कर लिया। इकबाल ठेकेदार ने इस बार पाला बदलकर भाजपा से चुनाव लड़ रहे रामअवतार सैनी को शिकस्त दी। मोहम्मद इकबाल ठेकेदार को 58,808 वोट मिले थे। रामअवतार सैनी 28,797 वोट पर सिमट गए। 2012 के चुनाव में फिर से मोहम्मद इकबाल ठेकेदार विधायक बनने में कामयाब रहे। उन्होंने जेल से चुनाव लड़ रहे सपा प्रत्याशी शेरबाज पठान को पटखनी दी। मोहम्मद इकबाल ठेकेदार को 54,941 तथा शेरबाज पठान को 39, 928 वोट मिले। भाजपा प्रत्याशी कविता चौधरी तीसरे नंबर पर रही थीं।
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धामपुर विधानसभा सीट पर कई बार से सपा प्रत्याशी मूलचंद चौहान व अशोक राणा का ही कब्जा रहा है। विधायक ये दोनों ही बनते रहे हैं। 2002 के विधानसभा चुनाव में सपा सरकार के मंत्री मूलचंद चौहान ने परचम लहराया था। मूलचंद चौहान ने रालोद-भाजपा गठबंधन प्रत्याशी अशोक राणा को शिकस्त दी थी। मूलचंद चौहान को 56, 597 तथा अशोक राणा को 46 हजार 44 वोट मिले थे। 2007 के चुनाव में बसपा से मैदान में उतरे अशोक राणा ने उलटफेर करते हुए मूलचंद चौहान को हरा दिया। अशोक राणा को 65,717 तथा मूलचंद चौहान को 45,191 वोट मिले थे। 2012 के चुनाव में मूलचंद चौहान ने बसपा प्रत्याशी को कड़े मुकाबले में चुनाव में पटखनी देकर अपनी पिछले चुनाव की हार का बदला चुका लिया। मूलचंद चौहान को 53, 365 वोट मिले तथा अशोक राणा को 52, 801 वोट मिले। भाजपा से राजेंद्र सिंह यहां तीसरे नंबर पर रहे थे। अशोक राणा स्योहारा सीट से पहली बार जनता दल प्रतयाशी के रूप में 89 में विधायक बने थे।
नगीना सुरक्षित विधानसभा सीट पर पिछले तीन बार के चुनाव से बसपा व सपा में ही शह मात का खेल चलता रहा है। 2002 के चुनाव में सपा प्रत्याशी पूर्व मंत्री ओमवती ने बसपा के मनोज पारस को शिकस्त दी थी। ओमवती को 42, 684 वोट तथा मनोज पारस को 40, 553 वोट मिले थे। 2007 में ओमवती पाला बदलकर बसपा में शामिल हो गईं, तो मनोज पारस ने सपा का दामन थाम लिया। दोनों फिर से आमने सामने चुनाव लड़े। मनोज पारस सपा से तो ओमवती बसपा से चुनाव लड़ीं। ओमवती मनोज पारस को चुनाव हराकर दूसरी बार विधायक बन गईं। ओमवती को 46, 551 तथा मनोज पारस को 36,764 वोट मिले। 2012 के चुनाव में सपा प्रत्याशी मनोज पारस ने बसपा प्रत्याशी ओमवती को पटखनी देकर अपनी दो हार का बदला चुका लिया। मनोज पारस को 83,997 वोट मिले तो पूर्व राज्यमंत्री ओमवती को 57,451 वोट पाकर ही सब्र करना पड़ा। भाजपा के लवकुश तीसरे नंबर पर रहे। अखिलेश सरकार ने ओमवती को हराने पर मनोज पारस को राज्यमंत्री बनाकर उनका रुतबा बढ़ा दिया। बाद में एक दुष्कर्म के मामले में नामजद होने पर मनोज पारस से लाल बत्ती छीन ली गई। नजीबाबाद विधानसभा सीट पर माकपा के रामस्वरूप सिंह का कब्जा रहा। माकपा प्रत्याशी के रूप में तीन बार इस सीट पर विधायक रहे हैं। ये एकमात्र ऐसे विधायक थे, जिनके पास गाड़ी, घोड़ा कुछ नहीं था। रामस्वरूप सिंह बस या ट्रेन से ही सफर करते थे। सपा मुखिया मुलायम सिंह का हर चुनाव में रामस्वरूप सिंह को समर्थन रहता था। रामस्वरूप सिंह के सामने सपा की ओर से कोई प्रत्याशी चुनावी मैदान में नहीं उतरता था। 2002 के चुनाव में रामस्वरूप सिंह नजीबाबाद सीट से तीसरी बार विधायक चुने गए। उन्होंने बसपा प्रत्याशी शीशराम सिंह को चुनाव मैदान में मात दी। रामस्वरूप सिंह को 40, 426 तथा शीशराम सिंह को 35,584 वोट मिले। पूर्व विधायक रामस्वरूप सिंह की मौत के बाद 2007 में इस सीट पर बसपा ने कब्जा कर लिया। बसपा के शीशराम सिंह ने पूर्व विधायक रामस्वरूप सिंह के बेटे राजकुमार को हरा दिया। शीशराम सिंह को 49, 984 तथा राजकुमार को 41, 860 वोट मिले। 2012 के चुनाव में बसपा का इस सीट पर कब्जा बरकरार रहा। बसपा ने विधायक शीशराम सिंह की जगह नजीबाबाद नगर पालिका के चेयरमैन तसलीम अहमद को चुनाव मैदान में उतारा। तसलीम अहमद चुनाव जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी राजीव अग्रवाल को हराया। तसलीम अहमद को 62,713 तथा राजीव अग्रवाल को 51,130 वोट मिले। सपा के शाहिद अली खां यहां तीसरे नंबर पर रहे।
नहटौर विधानसभा सीट पर विधानसभा चुनाव में नए परिसीमन के तहत नहटौर विधानसभा सुरक्षित सीट पहली बार बनी। इस सीट पर सभी पार्टियों ने अपनी ताकत झोंक दी। हालांकि पहली बार चुनाव लड़ रहे ओम कुमार सबको मात देकर विधायक बन गए। ओम कुमार ने सपा प्रत्याशी राजकुमार राजू को चुनाव हरा दिया। ओम कुमार को 51,389 वोट मिले थे। राजकुमार राजू को 31, 991 वोट ही मिले। ओम कुमार ने अब बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया है। वह इस सीट पर भाजपा के टिकट के बड़े दावेदार हैं।
नूरपुर विधानसभा से पहले यह सीट स्योहारा विधानसभा के नाम से थी। स्योहारा विधानसभा से 2002 में बसपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन ने भाजपा के डा. वेदप्रकाश सिंह को हराया। कुतबुद्दीन को 37,853 तथा डा.वेदप्रकाश सिंह को 35,704 वोट मिले। बाद में कुतबुद्दीन पाला बदलकर सपा में चले गए और राज्यमंत्री बने। 2007 के चुनाव में यह सीट फिर से बसपा के खाते में गई। बसपा ने यहां से ठाकुर यशपाल सिंह पर दांव खेला। ठाकुर यशपाल सिंह ने सपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन को हरा दिया। ठाकुर यशपाल सिंह को 47, 751 तथा कुतबुद्दीन को 32, 837 वोट मिले। बसपा की सरकार बनने पर ठाकुर यशपाल सिंह को राज्यमंत्री बनाया गया।
2012 के चुनाव में नए परिसीमन में स्योहारा की जगह नूरपुर विधानसभा सीट बनी। चुनाव से पहले ठाकुर यशपाल सिंह को बसपा से निष्कासित कर दिया गया तो वे रालोद से चुनाव मैदान में कूदे। हालांकि नए परिसीमन में यह सीट भाजपा के खाते में गई। भाजपा प्रत्याशी लोकेंद्र चौहान पहली बार यहां से विधायक बने। लोकेंद्र चौहान ने बसपा प्रत्याशी मोहम्मद उस्मान को हराया। लोकेंद्र चौहान को 47, 556 वोट मिले। बसपा के मोहम्मद उस्मान 42, हजार 93 वोट पाकर दूसरे नंबर पर रहे। सपा प्रत्याशी कुतबुद्दीन अंसारी तीसरे नंबर पर रहे।
बढ़ापुर विधानसभा सीट:पहले ये सीट अफजलगढ़ विधानसभा के नाम से थी। यहां पर पहले भाजपा का दबदबा रहा। भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह लगातार तीन बार इस सीट से विधायक रहे। 2002 में डा.इंद्रदेव सिंह ने बसपा प्रत्याशी मोहम्मद गाजी को हराया। डा.इंद्रदेव सिंह को 41, 532 वोट तथा मोहम्मद गाजी को 40, 805 वोट मिले। बसपा ने 2007 के विधानसभा चुनाव में मोहम्मद गाजी पर फिर से भरोसा जताया और उन्हें प्रत्याशी बनाकर चुनाव मैदान में उतारा। इस बार मोहम्मद गाजी ने भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह का तिलिस्म तोड़ दिया। मोहम्मद गाजी पहली बार विधायक बने। मोहम्मद गाजी को 59, 496 तथा डा.इंद्रदेव सिंह को 51 हजार 66 सीट मिलीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में नए परिसीमन में अफजलगढ़ की जगह बढ़ापुर विधानसभा सीट बनी।
बढ़ापुर सीट पर भी मोहम्मद गाजी का जलवा बरकरार रहा। मोहम्मद गाजी ने भाजपा प्रत्याशी डा.इंद्रदेव सिंह को फिर से हराया और दूसरी बार विधायक बने। मोहम्मद गाजी को 68,436 तथा डा.इंद्रदेव सिंह को 41 हजार 51 वोट मिले। महान दल की साधना सिंह तीसरे नंबर पर रहीं। साधना सिंह मुरादाबाद के सांसद कुंवर सर्वेश सिंह की पत्नी हैं।