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Bijnor News: पश्चिम उत्तर प्रदेश से एक और दलित नेता का उदय

Wed, 05 Jun 2024 12:48 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 05 Jun 2024 12:48 AM IST
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Rise of another Dalit leader from West Uttar PradesRise of another Dalit leader from West Uttar Pradeshh
बिजनौर। बिजनौर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नए नेता को मौका देने में जिले की जनता कोई कसर नहीं छोड़ती। एक और दलित नेता के लिए बिजनौर की धरती उपजाऊ साबित हुई। नगीना से पहली बार अपनी ही पार्टी आसपा के सिंबल पर चुनाव लड़े चंद्रशेखर ने करीब डेढ़ लाख वोटों से जीत हासिल की। इसे पश्चिम में एक बड़े दलित नेता का उदय माना जा रहा है, जो आने वाले विधानसभा चुनावों में भी अपना असर दिखाएगा। इतिहास पर नजर डालें तो यहां से चुनाव लड़े कई दलित नेता राजनीति के उच्च पदों तक पहुंचे। इनमें मायावती, मीराकुमार और रामविलास पासवान का जिक्र सबसे पहले होता है।
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बिजनौर लोकसभा सीट पर 1952 में पहला लोकसभा चुनाव हुआ। इसमें कांग्रेस के नेमीशरण जैन को जीत हासिल हुई। उन्होंने निर्दलीय गोविंद सहाय को हराया। उस समय नेमीशरण जैन को 75,018 और गोविंद सहाय को 43,520 वोट मिले थे। इसके बाद 1957 के चुनाव में भी इंडियन नेशनल कांग्रेस के अब्दुल लतीफ ने भारतीय जनसंघ के भूदेव सिंह को हरा दिया। 1962 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। निर्दलीय प्रकाशवीर शास्त्री ने इंडियन नेशनल कांग्रेस के अब्दुल लतीफ को चुनाव में पराजित कर दिया।
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इसके बाद 1967 में लोकसभा चुनाव हुआ। इसमें कांग्रेस को फिर से जीत मिली। इंडियन नेशनल कांग्रेस के स्वामी प्रसाद शास्त्री ने भारतीय जनसंघ के एसराम को हराया। 1971 के चुनाव में भी बिजनौर सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। इंडियन नेशनल कांग्रेस के स्वामी रामानंद शास्त्री ने भारतीय क्रांति दल के महीलाल को चुनाव में शिकस्त दी। 1974 के चुनाव में कांग्रेस के रामदयाल निर्विरोध सांसद चुने गए।
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1977 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर राजनीतिक परिदृश्य बदलना शुरू हो गया। भारतीय लोकदल के महीपाल इस बार चुनाव जीत गए। उन्होंने इंडियन नेशनल कांग्रेस के महीलाल को पराजित किया। 1980 में जनता पार्टी सेकुलर के मंगलराम प्रेमी विजयी घोषित हुए। उन्होंने जनता पार्टी के महीलाल को चुनाव हराया। 1984 के चुनाव में फिर से कांग्रेस ने कब्जा किया। इंडियन नेशनल कांग्रेस के गिरधारीलाल ने लोकदल प्रत्याशी मंगलराम प्रेमी को चुनाव में पटकनी दी।


पहली बार तीसरे नंबर पर रहीं, फिर 1989 में सांसद बनीं मायावती

गिरधारी लाल के निधन के बाद 1985 में उपचुनाव हुआ। इसमें इंडियन नेशनल कांग्रेस से मीरा कुमार चुनावी मैदान में उतरी और पहली बार सांसद बनीं। उन्होंने लोकदल प्रत्याशी केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान को चुनाव हराया। बसपा सुप्रीमो मायावती निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ीं और वे तीसरे नंबर पर रहीं। 1989 में हुए लोकसभा चुनाव में मायावती को जीत हासिल हुई और वह पहली बार बिजनौर सीट से सांसद बनीं। बसपा से चुनाव लड़ीं मायावती ने जनता दल के मंगलराम प्रेमी को हराया। इंडियन नेशनल कांग्रेस से चुनाव लड़ीं पूर्व सांसद गिरधारी लाल की पुत्री आशा चौधरी दूसरे नंबर पर रहीं। 1991 के लोकसभा चुनाव में इस सीट पर भाजपा ने पहली बार कब्जा किया। भाजपा से चुनाव लड़े मंगलराम प्रेमी ने मायावती को चुनाव हरा दिया। इसके बाद मायावती बिजनौर से चुनाव नहीं लड़ीं।




चंद्रशेखर ने पलट दिए सभी पार्टियों के समीकरण
नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर शुरूआत में सपा से टिकट मांग रहे थे। वहां सपा ने पूर्व अपर जिला जज मनोज कुमार को टिकट दे दिया। इसके बाद चंद्रशेखर अपनी आजाद समाज पार्टी के सिंबल केतली पर ही चुनाव लड़े। चुनाव शुरू हुआ तो इस सीट पर भाजपा, सपा और बसपा तीनों पार्टियों के समीकरण बिगाड़ दिए। दलित, मुस्लिमों में गहरी पैठ जमाई और इसके बाद भाजपा के कोर वोट में भी सेंधमारी कर दी। मतगणना में उनकी बढ़त ने यह साफ कर दिया।





बदलते रहे बिजनौर में नेताओं के सितारे

1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का कब्जा रहा। भाजपा से मंगलराम प्रेमी चुनाव लड़ें और उन्होंने सपा के सतीश कुमार को चुनाव हरा दिया। 1998 में हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट पर पहली बार सपा ने परचम लहराया। सपा की ओमवती ने भाजपा के मंगलराम प्रेमी को चुनाव हराया। 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के शीशराम रवि ने फिर से कब्जा कर लिया। शीशराम रवि ने सपा की ओमवती को हराया। 2004 में रालोद व सपा के गठबंधन में रालोद के मुंशीराम पाल ने पहली बार पार्टी को इस सीट पर जीत दिलाई। मुंशीराम पाल ने बसपा के घनश्याम चंद खरवाल को पराजित कर दिया।



बिजनौर में अब तक कौन-कौन रहे सांसद

1951 - कांग्रेस से नेमीशरण जैन

1957 - कांग्रेस से अब्दुुल लतीफ

1962- निर्दलीय प्रकाशवीर शास्त्री

1967 -कांग्रेस से स्वामी रामानंद शास्त्री

1971 - कांग्रेस से स्वामीरामानंद शास्त्री

1974 - कांग्रेस से रामदयाल

1977 - जनता पार्टी के महिलाल
1980- जनता पार्टी एस से मंगलराम प्रेमी

1984 - कांग्रेस से गिरीधारीलाल
1985 - कांग्रेस से मीरा कुमार

1989 - बसपा से मायावती

1991- भाजपा से मंगलराम प्रेमी

1996 - भाजपा से मंगलराम प्रेमी

1998- सपा से ओमवती

1999 - भाजपा से शीशराम रवि

2004 - रालोद से मुंशीरामपाल
2009 -रालोद से संजय चौहान

2014 -भाजपा से भारतेंद्र सिंह

2019 - बसपा से मलूक नागर


कौनसा दल कितनी बार जीता

- 07 बार रहे कांग्रेस के सांसद

-04 बार रहे भाजपा के सांसद

-02 बार रहे जनता पार्टी के सांसद

-02 बार हरे रालोद के सांसद

-02 बार रहे बसपा के सांसद

-01 बार रहे सपा के सांसद

-01 बार निर्दलीय सांसद रहे
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