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गांव मसीत में हो रहा था मांगुर मछली का पालन
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गांव मसीत में हो रहा था प्रतिबंधित मांगुर मछली का पालन
हीमपुर दीपा/बिजनौर। जिले के एक तालाब में विदेशी थाई मांगुर मछली का पालन होता मिला। शिकायत पर अफसरों ने तालाब में जाल डलवा दिया। सभी मछलियां पकड़वाकर गड्ढे में दबवा दी गईं। दरअसल, थाई मांगुर का पालन और बिक्री को केंद्र सरकार ने साल 2000 में प्रतिबंधित कर दिया था। यह लोगों की सेहत और तालाब के ईको सिस्टम के लिए बेहद हानिकारक है।
चांदपुर तहसील के गांव मसीत के रहने वाले अबरार ने एक तालाब में प्रतिबंधित मछली के पालन की शिकायत की थी। इस पर शुक्रवार को राजस्व विभाग और मत्स्य विभाग की टीम गांव पहुंची। जिसने तालाब में जाल डलवाकर मछली तालाब से निकलवा लीं। जांच में पाया गया कि तालाब में विदेशी थाई मांगुर मछली का पालन किया जा रहा था। जिसके बाद सभी मछलियों को जमीन में दबवा दिया गया है। थाई मांगुर मछली तालाब के लाभकारी शैवाल और छोटी मछलियों को खाती है। जिस वजह से पानी का ईको सिस्टम ही खत्म हो जाता है। एनजीटी के आदेशों पर केंद्र सरकार ने इसे साल 2000 में ही प्रतिबंधित कर दिया था।
रंग होता है काला
विदेशी थाई मांगुर मछली का रंग काला होता है। देशी मांगुर का रंग भूरा होता है। थाई मांगूर तीन से चार महीने में ही चार किलो तक की हो जाती है। जबकि देशी मांगुर का वजन आधा किलो से ज्यादा नहीं हो पाता। ज्यादा लाभ के लालच में विदेशी मांगुर का पालन किया जाता है। शिकायत हुई तो जिले में विदेशी मांगुर के पालन का पहला मामला पकड़ में आ सका। ऐसे में जिले के दूसरे तालाबों में भी मांगुर के पालन से इनकार नहीं किया जा सकता है। विदेशी मांगुर को कैंसर और डायबिटीज के अलावा कई अन्य रोगों का कारण कहा जाता है।
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---------कोट
शिकायत मिली थी, जिस पर तहसील प्रशासन और मत्स्य विभाग की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की है। किसान को मालूम नहीं था, थाई मांगुर मछली प्रतिबंधित है। अगर इस मछली को प्रतिबंधित किया गया है तो इसके खाने से कुछ तो फर्क पड़ता ही होगा - सतेंद्र, निरीक्षक मत्स्य विभाग
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हीमपुर दीपा/बिजनौर। जिले के एक तालाब में विदेशी थाई मांगुर मछली का पालन होता मिला। शिकायत पर अफसरों ने तालाब में जाल डलवा दिया। सभी मछलियां पकड़वाकर गड्ढे में दबवा दी गईं। दरअसल, थाई मांगुर का पालन और बिक्री को केंद्र सरकार ने साल 2000 में प्रतिबंधित कर दिया था। यह लोगों की सेहत और तालाब के ईको सिस्टम के लिए बेहद हानिकारक है।
चांदपुर तहसील के गांव मसीत के रहने वाले अबरार ने एक तालाब में प्रतिबंधित मछली के पालन की शिकायत की थी। इस पर शुक्रवार को राजस्व विभाग और मत्स्य विभाग की टीम गांव पहुंची। जिसने तालाब में जाल डलवाकर मछली तालाब से निकलवा लीं। जांच में पाया गया कि तालाब में विदेशी थाई मांगुर मछली का पालन किया जा रहा था। जिसके बाद सभी मछलियों को जमीन में दबवा दिया गया है। थाई मांगुर मछली तालाब के लाभकारी शैवाल और छोटी मछलियों को खाती है। जिस वजह से पानी का ईको सिस्टम ही खत्म हो जाता है। एनजीटी के आदेशों पर केंद्र सरकार ने इसे साल 2000 में ही प्रतिबंधित कर दिया था।
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रंग होता है काला
विदेशी थाई मांगुर मछली का रंग काला होता है। देशी मांगुर का रंग भूरा होता है। थाई मांगूर तीन से चार महीने में ही चार किलो तक की हो जाती है। जबकि देशी मांगुर का वजन आधा किलो से ज्यादा नहीं हो पाता। ज्यादा लाभ के लालच में विदेशी मांगुर का पालन किया जाता है। शिकायत हुई तो जिले में विदेशी मांगुर के पालन का पहला मामला पकड़ में आ सका। ऐसे में जिले के दूसरे तालाबों में भी मांगुर के पालन से इनकार नहीं किया जा सकता है। विदेशी मांगुर को कैंसर और डायबिटीज के अलावा कई अन्य रोगों का कारण कहा जाता है।
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शिकायत मिली थी, जिस पर तहसील प्रशासन और मत्स्य विभाग की संयुक्त टीम ने कार्रवाई की है। किसान को मालूम नहीं था, थाई मांगुर मछली प्रतिबंधित है। अगर इस मछली को प्रतिबंधित किया गया है तो इसके खाने से कुछ तो फर्क पड़ता ही होगा - सतेंद्र, निरीक्षक मत्स्य विभाग