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कागजों में सिमट गई सपनों की हकीकत
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 08 Jan 2017 12:03 AM IST
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नजीबाबाद के आदर्शनगर में घरों के ऊपर से गुजर रही विद्युत लाइन।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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हिजनौर के नजीबाबाद में विधानसभा क्षेत्र के लोगों की समस्याएं जस की तस बनी हुई है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली और सड़कों की समस्या का कोई निराकरण नहीं हुआ। सारी योजनाएं केवल कागजों का पेट भरने तक सीमित रह गई। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान जनता को दिखाए गए सुनहरे सपने हकीकत में नहीं बदल सका। विधानसभा चुनाव की तिथि घोषित होते ही अब प्रत्याशी फिर से वोटरों को रिझाने में जुट गए हैं।
विधानसभा चुनाव शुरू होते ही राजनैतिक दलों के नेता सड़कों पर निकल पड़े हैं। ये नेता लोगों के बीच जाकर फिर से विकास कराने का वादा करते हुए नजर आ जाएंगे। नजीबाबाद विधानसभा सीट उत्तराखंड से सटी है। कोटद्वार और हरिद्वार लोग नजीबाबाद विधानसभा से होकर ही लोग जाते है। नजीबाबाबाद शहर बिजनौर को आजादी दिलाने के नायक नजीबुदौला के नाम से जाना जाता र्है। नजीबाबाद में नजीबुदौला के कई किले व मस्जिद हैं। मोरघ्वज का किला भी नजीबाबाद में है। जिले का सबसे बढ़ा रेलवे स्टेशन भी नजीबाबाद में है। यहां से हर जगह को ट्रेन जाती हैं। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार का गांव राजपुर नवादा भी इस विधानसभा क्षेत्र में ही हैं। इस विधानसभा में प्रत्याशी चुनाव समर में कूद गए हैं।
नजीबाबाद विधानसभा सीट पर कांग्रेस, माकपा और बसपा का दबदबा रहा है। 1977 में इस सीट से जनता पार्टी के मुकंदी सिंह विधायक बने थे। 1980 में कांग्रेस के रतिराम, 1985 में कांग्रेस के सुक्खन सिंह, 1989 मेें बसपा के बलेदव सिंह विधायक रहे। 1995 में भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। भाजपा के राजेंद्र प्रसाद विधायक बने। इसके बाद लगातार तीन बार 1993, 1996 व 2002 में माकपा के रामस्वरूप ने इस सीट पर अपना परचम लहराया। रामस्वरूप के सामने सपा अपना प्रत्याशी नहीं उतार कर रामस्वरूप को समर्थन देती रही ।रामस्वरूप एक ऐसे विधायक रहे, जिनके पास घोड़ा-गाड़ी कुछ नहीं था। वे पैदल चलकर ही लोगों की समस्याओं का निदान कराते थे। ट्रेन व रोडवेज बस से सफर करते थे। 2007 के चुनाव में इस सीट पर बसपा ने कब्जा कर लिया। बसपा के शीशराम सिंह यहां से विधायक बने 2012 में बसपा के तसलीम अहमद इस सीट से विधायक बने। अब तसलीम अहमद ने सपा का दामन थाम लिया हैं।
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विधानसभा चुनाव शुरू होते ही राजनैतिक दलों के नेता सड़कों पर निकल पड़े हैं। ये नेता लोगों के बीच जाकर फिर से विकास कराने का वादा करते हुए नजर आ जाएंगे। नजीबाबाद विधानसभा सीट उत्तराखंड से सटी है। कोटद्वार और हरिद्वार लोग नजीबाबाद विधानसभा से होकर ही लोग जाते है। नजीबाबाबाद शहर बिजनौर को आजादी दिलाने के नायक नजीबुदौला के नाम से जाना जाता र्है। नजीबाबाद में नजीबुदौला के कई किले व मस्जिद हैं। मोरघ्वज का किला भी नजीबाबाद में है। जिले का सबसे बढ़ा रेलवे स्टेशन भी नजीबाबाद में है। यहां से हर जगह को ट्रेन जाती हैं। मशहूर कवि दुष्यंत कुमार का गांव राजपुर नवादा भी इस विधानसभा क्षेत्र में ही हैं। इस विधानसभा में प्रत्याशी चुनाव समर में कूद गए हैं।
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नजीबाबाद विधानसभा सीट पर कांग्रेस, माकपा और बसपा का दबदबा रहा है। 1977 में इस सीट से जनता पार्टी के मुकंदी सिंह विधायक बने थे। 1980 में कांग्रेस के रतिराम, 1985 में कांग्रेस के सुक्खन सिंह, 1989 मेें बसपा के बलेदव सिंह विधायक रहे। 1995 में भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा जमा लिया। भाजपा के राजेंद्र प्रसाद विधायक बने। इसके बाद लगातार तीन बार 1993, 1996 व 2002 में माकपा के रामस्वरूप ने इस सीट पर अपना परचम लहराया। रामस्वरूप के सामने सपा अपना प्रत्याशी नहीं उतार कर रामस्वरूप को समर्थन देती रही ।रामस्वरूप एक ऐसे विधायक रहे, जिनके पास घोड़ा-गाड़ी कुछ नहीं था। वे पैदल चलकर ही लोगों की समस्याओं का निदान कराते थे। ट्रेन व रोडवेज बस से सफर करते थे। 2007 के चुनाव में इस सीट पर बसपा ने कब्जा कर लिया। बसपा के शीशराम सिंह यहां से विधायक बने 2012 में बसपा के तसलीम अहमद इस सीट से विधायक बने। अब तसलीम अहमद ने सपा का दामन थाम लिया हैं।
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