फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bijnor News ›   Nagina's glass vial industry

अब्दुल के हाथ से बनी शीशी में आता है गंगाजल

Thu, 11 Mar 2021 12:13 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 11 Mar 2021 12:13 AM IST
विज्ञापन
Nagina's glass vial industry
नगीना के मोहल्ला मनिहारी सराय में अब्दुल सलाम के घर पर लगी भट्टी जिस पर बनती थी कांच की शीशी। - फोटो : BIJNOR
अब्दुल के हाथ से बनी शीशी में आता है गंगाजल
विज्ञापन

ऩगीना (बिजनौर)। महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक के लिए हरिद्वार से कांवड़िये कांवड़ में जिस कांच की शीशी में गंगाजल लेकर आते हैं उसे आज भी नगीना का अब्दुल सलाम का परिवार बनाता है। नगीना की विश्व प्रसिद्ध कांच की शीशियों को बनाने की हस्तकला को सरकारी प्रोत्साहन व रियायती मूल्य पर मिलने वाले कोयले के बंद हो जाने के कारण यह हस्तशिल्प कला विलुप्त हो गई है। इस काम में लगे परिवार दूसरे धंधों में लग गए हैं, लेकिन अब्दुल सलाम का परिवार ही कांच की शीशी बनाने का काम करता है।
नगीना के मनिहारी सराय मोहल्ले में रहने वाले मनिहार बिरादरी के अधिकांश परिवार पहले कोयले की भट्टियों पर कांच की शीशियां बनाने का काम करते थे। एक समय पर करीब 70 से अधिक भट्ठियां थीं। सरकार रियायती मूल्य पर कोयला मुहैया कराती थी। महाशिवरात्रि पर महीनों पहले से छोटे बड़े आकार की शीशियां बननी शुरू हो जाती थीं। ये हरिद्वार जाती थीं और शिवभक्त इन शीशियों में ही गंगाजल ले जाकर महादेव का जलाभिषेक करते थे। कांच की इन शीशियों का प्रयोग चिकित्सक भी दवाइयों को देने के लिए किया करते थे।
विज्ञापन

लेकिन, धीरे-धीरे कांच की शीशी का प्रयोग कम होता गया और प्लास्टिक की शीशी बाजार में आ गईं। सरकार ने कोयले पर रियायत देनी बंद कर दी तो बोतल बनाना महंगा हो गया। अब चिकित्सक भी प्लास्टिक की शीशी का ही प्रयोग करते हैं। कुछ लोगों ने प्लास्टिक की शीशियां बनाने की मशीनें भी लगाईं, लेकिन फैक्ट्रियों में बनी शीशियों की गुणवत्ता व कीमत के मामले में यह पिछड़ गईं। आधुनिकता की दौड़ में कांच की शीशियों का स्थान प्लास्टिक की शीशियों ने ले लिया। कांवड़िये अब प्लास्टिक की बोतल में ही गंगाजल ला रहे हैं। अब केवल अब्दुल सलाम ही कांच की शीशी बनाने के पुश्तैनी काम को कर रहे हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन

तीन, चार दिन ही चलती है भट्ठियां
अब्दुल सलाम का कहना है की यह काम उनके परिवार में सदियों से हो रहा है। लेकिन उनकी भट्ठी भी सप्ताह में तीन या चार दिन ही चलती है। अधिकांश लोगों व उनके परिवारों ने दूसरे कारोबार करने शुरू कर दिए हैं। बताया कि एक बार भट्ठी चढ़ने पर करीब 700 से 800 शीशी बन जाती हैं। कांवड़ के जल के लिए प्रयोग में होने वाली कांच की छोटी शीशी करीबन डेढ़ रुपये कीमत की जाती है। शिवरात्रि पर काफी डिमांड रही, लेकिन जितनी तैयार हो पाईं, उनकी सप्लाई हरिद्वार कर दी गई।
सरकारी मदद मिले तो फिर चलेगा कारोबार
मनिहारी सराय के सभासद मोहम्मद तालिब का कहना है कि कांच की शीशी की वजह से उनके मोहल्ले व नगर की पहचान पूरे देश भर में होती थी। लेकिन सरकार द्वारा इस उद्योग को प्रोत्साहन न देने की वजह से यह उद्योग बंद हो गया। कांच की शीशी में हरिद्वार से आने वाला गंगाजल काफी लंबे समय तक शुद्ध रहता था। सरकार पहले कोयले का परमिट बनाती थी। इससे कोयला सस्ता पड़ता था। सरकार अभी भी इस कारोबार में लगे लोगों को कुछ मदद करें तो यह पुन: जीवित हो सकता है।

मुख्यमंत्री के सामने रखेंगे मामला : सांसद
नगीना सांसद गिरीश चंद का कहना है की नगीना के शीशी कारोबार को पुन: जीवित कराने के लिए वह मुख्यमंत्री से मिलकर कारोबार को बढ़ावा दिलाने के लिए सरकारी मदद की मांग करेंगे। इससे नगीना को दोबारा पहचान मिलेगी और लोगाें को रोजगार भी मिलेगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed