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शब-ए-बरात पर घरों में इबादत करें मुसलमान
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शब-ए-बरात पर घरों में इबादत करें मुसलमान
नींदडू़। जामा मस्जिद के इमाम मुफ्ती मोहम्मद मुजम्मिल हुसैन कासमी ने शब-ए-बरात को अपने रब की इबादत कर गुनाहों से छुटकारा पाने की रात बताया। कहा कि नबी पाक अपनी जिंदगी में केवल एक बार मदीने के जन्नतुल बकी नामक कब्रिस्तान तशरीफ ले गए। इसके बाद वह स्वयं या उनके सहाबा शब-ए-बरात के मौके पर कभी कब्रिस्तान नहीं गए। आजकल शब-ए-बरात की रात में कब्रिस्तान जाना, रोशनी करना, इबादत के नाम पर रतजगा करना, हलवा आदि तकसीम करना, आतिशबाजी छोड़ना, रास्तों व चौराहों पर जमा होकर दूसरे लोगों के लिए परेशानी बनना और बाइकों पर बेमतलब घूमते हुए हंगामा करने की कोई असलियत नहीं है। यह सब इस्लाम विरोधी और नबी के तरीके के खिलाफ है। शब-ए-बरात की रात में मस्जिदों में रहकर इबादत करना भी जरूरी नहीं है। इस समय कोरोना महामारी के कारण हुकूमत की ओर से 21 दिवसीय लॉकडाउन चल रहा है, इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए अपने घरों से बाहर न निकलें। घरों में रहकर अपना समय नमाज, कुरआन की तिलावत, तस्बीह और दुआ आदि के साथ इबादत में गुजारें। मुमकिन हो तो अगले दिन का रोजा रखें। मृतक परिजनों की आत्मा को सवाब पहुंचाएं तथा नाराज लोगों में सुलह कराएं।
इसी तरह के विचार मुफ्ती मोहम्मद अशरफ मजाहिरी, मौलवी शमशीर अहमद और कारी राशिद हमीदी ने भी व्यक्त करते हुए लोगों से अपने घरों में अलग अलग इबादत करें तथा गैरजरूरी बातों को बढ़ावा न दें। उन्होंने कहा कि साल भर में एक रात जागने की बजाय मुसलमान रोजाना पांच वक्त की नमाज की पाबंदी करें।
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नींदडू़। जामा मस्जिद के इमाम मुफ्ती मोहम्मद मुजम्मिल हुसैन कासमी ने शब-ए-बरात को अपने रब की इबादत कर गुनाहों से छुटकारा पाने की रात बताया। कहा कि नबी पाक अपनी जिंदगी में केवल एक बार मदीने के जन्नतुल बकी नामक कब्रिस्तान तशरीफ ले गए। इसके बाद वह स्वयं या उनके सहाबा शब-ए-बरात के मौके पर कभी कब्रिस्तान नहीं गए। आजकल शब-ए-बरात की रात में कब्रिस्तान जाना, रोशनी करना, इबादत के नाम पर रतजगा करना, हलवा आदि तकसीम करना, आतिशबाजी छोड़ना, रास्तों व चौराहों पर जमा होकर दूसरे लोगों के लिए परेशानी बनना और बाइकों पर बेमतलब घूमते हुए हंगामा करने की कोई असलियत नहीं है। यह सब इस्लाम विरोधी और नबी के तरीके के खिलाफ है। शब-ए-बरात की रात में मस्जिदों में रहकर इबादत करना भी जरूरी नहीं है। इस समय कोरोना महामारी के कारण हुकूमत की ओर से 21 दिवसीय लॉकडाउन चल रहा है, इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए अपने घरों से बाहर न निकलें। घरों में रहकर अपना समय नमाज, कुरआन की तिलावत, तस्बीह और दुआ आदि के साथ इबादत में गुजारें। मुमकिन हो तो अगले दिन का रोजा रखें। मृतक परिजनों की आत्मा को सवाब पहुंचाएं तथा नाराज लोगों में सुलह कराएं।
इसी तरह के विचार मुफ्ती मोहम्मद अशरफ मजाहिरी, मौलवी शमशीर अहमद और कारी राशिद हमीदी ने भी व्यक्त करते हुए लोगों से अपने घरों में अलग अलग इबादत करें तथा गैरजरूरी बातों को बढ़ावा न दें। उन्होंने कहा कि साल भर में एक रात जागने की बजाय मुसलमान रोजाना पांच वक्त की नमाज की पाबंदी करें।
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