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कृष्णा जन्मोत्सव पर सजी महात्मा विदुर की कुटी
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बिजनौर में सजा विदुर कुटी मंदिर।
- फोटो : BIJNOR
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कृष्ण जन्मोत्सव पर सजी महात्मा विदुर की कुटी
गंज दारानगर/बिजनौर। भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ने पावन हुई विदुरकुटी पर सोमवार को कान्हा के जन्म की भव्य तैयारी की गईं। यहां तीन दिन से भागवत कथा चल रही है, वहीं महात्मा विदुर के आश्रम को झालरों, भूलों से सजाया गया। प्रशासनिक अधिकारी और अन्य श्रद्धालु विदुरकुटी पर कान्हा के जन्म पर खुशियां मनाने के लिए पहुंचे।
सालों से बदहाल पड़ी विदुरकुटी का जीर्णोद्घार हुआ तो यहां की रंगत ही बदल गई। कान्हा के जन्म के स्वागत में विदुर आश्रम, मंदिर को झालरों और फूलों से सजाया गया। कान्हा के जन्म की खुशियां मनाने के लिए आसपास के गांवों से श्रद्धालु दिन में ही विदुरकुटी पहुंच गए। वहीं, कई वर्षों में पहली बार प्रशासनिक अफसर भी यहां कान्हा के जन्म की खुशियों में शामिल होने पहुंचे। सोमवार शाम तक वहां भजन, कीर्तन, भागवत कथा चलती रही। श्रद्धालु विदुर कुटी पर दर्शन के लिए पहुंचे।
महात्मा विदुर की कुटी का महाभारतकालीन धार्मिक महत्व है। महात्मा विदुर ने महाभारत काल में वानप्रस्थ आश्रम में जाने का निर्णय लिया था और वे गंगा किनारे आकर बस गए थे। यहीं रहकर वे ईश्वर की आराधना करने लगे थे। कौरव और पांडवों में संधि कराने के लिए जब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर पहुंचे थे तो उन्होंने दुुर्योधन के 36 प्रकार के व्यंजन के बजाए महात्मा विदुर की कुटिया में आकर बथुए का साग खाया था। यहां बथुए के साग का विशेष महत्व है। श्री कृष्ण के वरदान से यहां साल भर बथुआ पैदा होता है।
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गंज दारानगर/बिजनौर। भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ने पावन हुई विदुरकुटी पर सोमवार को कान्हा के जन्म की भव्य तैयारी की गईं। यहां तीन दिन से भागवत कथा चल रही है, वहीं महात्मा विदुर के आश्रम को झालरों, भूलों से सजाया गया। प्रशासनिक अधिकारी और अन्य श्रद्धालु विदुरकुटी पर कान्हा के जन्म पर खुशियां मनाने के लिए पहुंचे।
सालों से बदहाल पड़ी विदुरकुटी का जीर्णोद्घार हुआ तो यहां की रंगत ही बदल गई। कान्हा के जन्म के स्वागत में विदुर आश्रम, मंदिर को झालरों और फूलों से सजाया गया। कान्हा के जन्म की खुशियां मनाने के लिए आसपास के गांवों से श्रद्धालु दिन में ही विदुरकुटी पहुंच गए। वहीं, कई वर्षों में पहली बार प्रशासनिक अफसर भी यहां कान्हा के जन्म की खुशियों में शामिल होने पहुंचे। सोमवार शाम तक वहां भजन, कीर्तन, भागवत कथा चलती रही। श्रद्धालु विदुर कुटी पर दर्शन के लिए पहुंचे।
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महात्मा विदुर की कुटी का महाभारतकालीन धार्मिक महत्व है। महात्मा विदुर ने महाभारत काल में वानप्रस्थ आश्रम में जाने का निर्णय लिया था और वे गंगा किनारे आकर बस गए थे। यहीं रहकर वे ईश्वर की आराधना करने लगे थे। कौरव और पांडवों में संधि कराने के लिए जब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर पहुंचे थे तो उन्होंने दुुर्योधन के 36 प्रकार के व्यंजन के बजाए महात्मा विदुर की कुटिया में आकर बथुए का साग खाया था। यहां बथुए के साग का विशेष महत्व है। श्री कृष्ण के वरदान से यहां साल भर बथुआ पैदा होता है।
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