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Bijnor News: महाभारत कालीन शिव मंदिर है आस्था का प्रतीक
Fri, 14 Jul 2023 11:03 PM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
Updated Fri, 14 Jul 2023 11:03 PM IST
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मोहम्मद यूनुस
गजरौला शिव। शाहपुर गांगल के जंगल में गुजरातियों की ओर से बनवाया गया शिव मंदिर महाभारत कालीन है, जो आस्था का प्रतीक है। काफी दूर-दूर के लोग यहां जल चढ़ाने के लिए आते हैं। मंदिर के चारों ओर बाग है, जो मंदिर की संपत्ति है। यहां मांगी गईं मन्नतें पूरी होती हैं।
गांव के बुजुर्ग ठाकुर सिंह बताते हैं कि गजरौला शिव में गुजराती पंडितों का परिवार रहता था। इस परिवार के सदस्य बालावाली गंगा घाट पर स्नान करने गए थे तो उन्हें गंगा में शिव पिंड बहता नजर आया। उन्होंने लोगों की मदद से उसे गंगा से बाहर निकालवाया और बैलगाड़ी में चढ़ा लिया। जब वे वापस गजरौला आ रहे थे तो शाहपुर गांगल के जंगल में बैलगाड़ी के नीचे का हिस्सा टूट गया, शिव पिंडी जमीन पर रखी गई। गुजराती परिवार ने एक के बाद कई गाड़ियां बुलाईं जैसे ही शिव पिंडी को बैलगाड़ी में रखा तो नीचे का हिस्सा टूट गया। काफी कोशिशों के बाद जब शिव पिंडी नहीं उठा तो उन्होंने वहीं स्थापित कर शिवालय बना दिया।
नरेश कुमार एडवोकेट का कहना है कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि इसका नाम उन्होंने श्री सिद्ध पीठ मनका महेश्वर शिव मंदिर रखा। मंदिर के चारों ओर पुराना बाग है, मंदिर के नाम लगभग 50 बीघा जमीन है। आज भी यह मंदिर गुजरातियों के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर पर गजरौला शिव, गजरौला अचपल व मुकीमपुर धर्मसी के लोग होली, दशहरा पर जुलूस व अखाड़ों के साथ आते हैं, रंग खेलते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं।
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शिवरात्रि पर दूर-दूर के लोग हरिद्वार से गंगाजल लेकर आते हैं और चढ़ाते हैं। यह परंपरा सैकड़ों वर्ष से चली आ रही है। मंदिर पर साधु संत रहते हैं। गांव वाले भी यहां पूजा करते हैं। नरेंद्र कुमार एडवोकेट बताते हैं गुजराती पंडितों का परिवार 1938 में गांव छोड़कर चला गया, यह भूमि ब्रिटिश काल में गुजरातियों के नाम दर्ज थी। 1929 को बसंत लाल पुत्र कुंदन लाल ने अपने दादा की इच्छानुसार वक्फ कर दी। विवाद के चलते जब मामला अदालत पहुंचा तो जिला जज ने 25 मई 1983 को प्रबंध समिति बनाई। आज भी जिला जज के नियंत्रण में मंदिर की देखरेख समिति ही करती है। मंदिर पर जो चढ़ावा आता उसे गांव का ही एक जोगी परिवार ले जाता है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव के ही कुछ लोगों ने शिवपिंडी पर कुल्हाड़ी, हथौड़ा छैनी से प्रहार किया था, जिसके निशान आज भी मौजूद हैं। यह मंदिर आस्था का केंद्र है, यहां मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं। दूर-दूर के लोग यहां प्रसाद व जल चढ़ाने आते हैं। मंदिर पर एक कार्यक्रम में बिजनौर से पहुंचे राजाराम शास्त्री व डॉ. अरविंद शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने बताया कि शिवपिंडी महाभारत काल की है।
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गजरौला शिव। शाहपुर गांगल के जंगल में गुजरातियों की ओर से बनवाया गया शिव मंदिर महाभारत कालीन है, जो आस्था का प्रतीक है। काफी दूर-दूर के लोग यहां जल चढ़ाने के लिए आते हैं। मंदिर के चारों ओर बाग है, जो मंदिर की संपत्ति है। यहां मांगी गईं मन्नतें पूरी होती हैं।
गांव के बुजुर्ग ठाकुर सिंह बताते हैं कि गजरौला शिव में गुजराती पंडितों का परिवार रहता था। इस परिवार के सदस्य बालावाली गंगा घाट पर स्नान करने गए थे तो उन्हें गंगा में शिव पिंड बहता नजर आया। उन्होंने लोगों की मदद से उसे गंगा से बाहर निकालवाया और बैलगाड़ी में चढ़ा लिया। जब वे वापस गजरौला आ रहे थे तो शाहपुर गांगल के जंगल में बैलगाड़ी के नीचे का हिस्सा टूट गया, शिव पिंडी जमीन पर रखी गई। गुजराती परिवार ने एक के बाद कई गाड़ियां बुलाईं जैसे ही शिव पिंडी को बैलगाड़ी में रखा तो नीचे का हिस्सा टूट गया। काफी कोशिशों के बाद जब शिव पिंडी नहीं उठा तो उन्होंने वहीं स्थापित कर शिवालय बना दिया।
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नरेश कुमार एडवोकेट का कहना है कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि इसका नाम उन्होंने श्री सिद्ध पीठ मनका महेश्वर शिव मंदिर रखा। मंदिर के चारों ओर पुराना बाग है, मंदिर के नाम लगभग 50 बीघा जमीन है। आज भी यह मंदिर गुजरातियों के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर पर गजरौला शिव, गजरौला अचपल व मुकीमपुर धर्मसी के लोग होली, दशहरा पर जुलूस व अखाड़ों के साथ आते हैं, रंग खेलते हैं, प्रसाद चढ़ाते हैं।
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शिवरात्रि पर दूर-दूर के लोग हरिद्वार से गंगाजल लेकर आते हैं और चढ़ाते हैं। यह परंपरा सैकड़ों वर्ष से चली आ रही है। मंदिर पर साधु संत रहते हैं। गांव वाले भी यहां पूजा करते हैं। नरेंद्र कुमार एडवोकेट बताते हैं गुजराती पंडितों का परिवार 1938 में गांव छोड़कर चला गया, यह भूमि ब्रिटिश काल में गुजरातियों के नाम दर्ज थी। 1929 को बसंत लाल पुत्र कुंदन लाल ने अपने दादा की इच्छानुसार वक्फ कर दी। विवाद के चलते जब मामला अदालत पहुंचा तो जिला जज ने 25 मई 1983 को प्रबंध समिति बनाई। आज भी जिला जज के नियंत्रण में मंदिर की देखरेख समिति ही करती है। मंदिर पर जो चढ़ावा आता उसे गांव का ही एक जोगी परिवार ले जाता है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि गांव के ही कुछ लोगों ने शिवपिंडी पर कुल्हाड़ी, हथौड़ा छैनी से प्रहार किया था, जिसके निशान आज भी मौजूद हैं। यह मंदिर आस्था का केंद्र है, यहां मांगी गई मुरादें पूरी होती हैं। दूर-दूर के लोग यहां प्रसाद व जल चढ़ाने आते हैं। मंदिर पर एक कार्यक्रम में बिजनौर से पहुंचे राजाराम शास्त्री व डॉ. अरविंद शास्त्री ज्योतिषाचार्य ने बताया कि शिवपिंडी महाभारत काल की है।