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खांडसारी इकाइयों के जल्द चलने के नहीं हैं आसार
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बिजनौर। खांडसारी इकाइयां जल्द चलने के आसार नहीं। खांडसारी इकाइयों का पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण व मंडी समिति नियमों को लेकर विरोध। इसका असर गन्ने की पेराई पर पड़ेगा। साथ ही गन्ना काटकर गेहूं की होने वाली बुवाई का रकबा कम हो सकता है।
जिले में 95 लाइसेंस धारक खांडसारी इकाई संचालित हैं। करीब 700 कोल्हू हैं। कोल्हू का लाइसेंस नहीं होता। किसान अपना गन्ना पेराई करता है। खांडसारी इकाई व कोल्हू अक्टूबर माह में पेराई शुरू कर देते हैं। इस बार खांडसारी इकाई अक्तूबर में नहीं चल रही है। संचालकों को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण को जारी निर्देशों पर एतराज है। उत्तर प्रदेश खांडसारी इकाई संगठन बिजनौर ने सहायक चीनी आयुक्त के माध्यम से शासन को ज्ञापन भेजा। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य ने बताया कि खांडसारी इकाइयों का कहना है कि जल्द पेराई शुरू नहीं हो सकती। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण नियमों से संचालक सहमत नहीं हैं। शासन जारी निर्देश पर पुनर्विचार करे।
इन नियमों पर है विरोध
शासन ने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण को 13 जून 2018 को निर्देश जारी किए थे। कुल नौ निर्देश हैं। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य ने बताया कि संगठन के अध्यक्ष अरुण कुमार अग्रवाल उनसे मिले हैं। संचालकों को नियम एक व सात पर अधिक आपत्ति है। नियम एक में कहा गया है कि खांडसारी इकाई गांव, बस्ती, मंदिर, अस्पताल आदि से 500 मीटर दूर स्थित हों। नियम सात में कहा गया है कि खांडसारी इकाई की चिमनी 10 मीटर अर्थात करीब 30 फुट ऊंची होनी चाहिए। सहायक चीनी आयुक्त के मुताबिक संचालकों ने बाकी सात नियमों में आवश्यकतानुसार सुधार का भरोसा दिया है।
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ये हैं संचालकों का तर्क
सहायक चीनी आयुक्त ने बताया कि खांडसारी इकाई संचालकों का नियम एक व सात को लेकर अपना तर्क है। संचालकों का कहना है कि जिले में खांडसारी इकाई बड़ी संख्या में संचालित हैं। अधिकांश इकाई वर्ष 1970 से संचालित हैं। संचालकों ने उस समय इकाई अपने खेतों में लगाई थी। इकाईयों के आसपास दुकान, अस्पताल बाद में बने। लोग भी बाद में आसपास बस गए। दूसरा चिमनी की ऊंचाई बढ़ाने से गन्ने का रस पकाने में बगास अर्थात खोई अधिक खर्च होगा। बगास की बरबादी भी होगी, माल कम बनेगा। इससे इकाईयों को नुकसान है।
ये है किसानों को नुकसान
खांडसारी इकाई व कोल्हू बड़ी मात्रा में गन्ना पिराई करते हैं। इकाई खांडसारी के साथ गुड़ भी बनाती है। जैविक गुड़ काफी बनता है। दिल्ली, गुजरात, राजस्थान समेत कई राज्यों में जिले से गुड़ सप्लाई होता है। जैविक गुड़ विदेशों में भेजा जाता है। खांडसारी इकाई अक्तूबर में गन्ना पेराई शुरू कर देती है। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य के अनुसार जिले की खांडसारी इकाई बिजनौर चीनी मिल की क्षमता वाली करीब दो इकाई के बराबर गन्ना पेराई कर लेती हैं। इससे चीनी मिलों पर गन्ना दबाव कम हो जाता है। किसान समय से गन्ना समाप्त कर लेता है। दूसरे किसान गन्ना काटकर गेहूं की बुवाई करता है। इकाई देरी से चलने पर गेहूं की रकबा बुवाई पर असर पड़ेगा। जिले में हजारों बीघा गेहूं की बुवाई गन्ना काटकर होती है।
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जिले में 95 लाइसेंस धारक खांडसारी इकाई संचालित हैं। करीब 700 कोल्हू हैं। कोल्हू का लाइसेंस नहीं होता। किसान अपना गन्ना पेराई करता है। खांडसारी इकाई व कोल्हू अक्टूबर माह में पेराई शुरू कर देते हैं। इस बार खांडसारी इकाई अक्तूबर में नहीं चल रही है। संचालकों को पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण को जारी निर्देशों पर एतराज है। उत्तर प्रदेश खांडसारी इकाई संगठन बिजनौर ने सहायक चीनी आयुक्त के माध्यम से शासन को ज्ञापन भेजा। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य ने बताया कि खांडसारी इकाइयों का कहना है कि जल्द पेराई शुरू नहीं हो सकती। पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण नियमों से संचालक सहमत नहीं हैं। शासन जारी निर्देश पर पुनर्विचार करे।
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इन नियमों पर है विरोध
शासन ने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण को 13 जून 2018 को निर्देश जारी किए थे। कुल नौ निर्देश हैं। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य ने बताया कि संगठन के अध्यक्ष अरुण कुमार अग्रवाल उनसे मिले हैं। संचालकों को नियम एक व सात पर अधिक आपत्ति है। नियम एक में कहा गया है कि खांडसारी इकाई गांव, बस्ती, मंदिर, अस्पताल आदि से 500 मीटर दूर स्थित हों। नियम सात में कहा गया है कि खांडसारी इकाई की चिमनी 10 मीटर अर्थात करीब 30 फुट ऊंची होनी चाहिए। सहायक चीनी आयुक्त के मुताबिक संचालकों ने बाकी सात नियमों में आवश्यकतानुसार सुधार का भरोसा दिया है।
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ये हैं संचालकों का तर्क
सहायक चीनी आयुक्त ने बताया कि खांडसारी इकाई संचालकों का नियम एक व सात को लेकर अपना तर्क है। संचालकों का कहना है कि जिले में खांडसारी इकाई बड़ी संख्या में संचालित हैं। अधिकांश इकाई वर्ष 1970 से संचालित हैं। संचालकों ने उस समय इकाई अपने खेतों में लगाई थी। इकाईयों के आसपास दुकान, अस्पताल बाद में बने। लोग भी बाद में आसपास बस गए। दूसरा चिमनी की ऊंचाई बढ़ाने से गन्ने का रस पकाने में बगास अर्थात खोई अधिक खर्च होगा। बगास की बरबादी भी होगी, माल कम बनेगा। इससे इकाईयों को नुकसान है।
ये है किसानों को नुकसान
खांडसारी इकाई व कोल्हू बड़ी मात्रा में गन्ना पिराई करते हैं। इकाई खांडसारी के साथ गुड़ भी बनाती है। जैविक गुड़ काफी बनता है। दिल्ली, गुजरात, राजस्थान समेत कई राज्यों में जिले से गुड़ सप्लाई होता है। जैविक गुड़ विदेशों में भेजा जाता है। खांडसारी इकाई अक्तूबर में गन्ना पेराई शुरू कर देती है। सहायक चीनी आयुक्त डीपी मौर्य के अनुसार जिले की खांडसारी इकाई बिजनौर चीनी मिल की क्षमता वाली करीब दो इकाई के बराबर गन्ना पेराई कर लेती हैं। इससे चीनी मिलों पर गन्ना दबाव कम हो जाता है। किसान समय से गन्ना समाप्त कर लेता है। दूसरे किसान गन्ना काटकर गेहूं की बुवाई करता है। इकाई देरी से चलने पर गेहूं की रकबा बुवाई पर असर पड़ेगा। जिले में हजारों बीघा गेहूं की बुवाई गन्ना काटकर होती है।