{"_id":"579a51274f1c1be41321e4cb","slug":"khader-monsoon-means-a-waste","type":"story","status":"publish","title_hn":"खादर में मानसून का मतलब बर्बादी ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खादर में मानसून का मतलब बर्बादी
ब्यूरो/अमर उजाला, बिजनौर
Updated Fri, 29 Jul 2016 12:08 AM IST
विज्ञापन
गांव मुस्वीखानपुर में बारिश से गिरा मकान दिखाता किसान।
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिजनौर अच्छे मानसून से देशभर में अच्छी फसल होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन खादर क्षेत्र में अच्छे मानसून का मतलब किसानों की बर्बादी बनकर रह गया है। पहाड़ों पर बरसा एक-एक बूंद पानी खादर में आकर किसानों की फसल बर्बाद कर रहा है।
गांव सीमली, मीरापुर खादर, कोहरपुर, मिर्जापुर, रावली, ब्रह्मपुरी, डैबलगढ़, चाहड़वाला, रघुनाथपुर, वीरूवाला, कुंदनपुर टीप आदि गंगा और मालन के किनारे बसे हैं। पहाड़ों पर होने वाली बारिश इन गांवों के किसानों की हजारों बीघा जमीन को अपने आगोश में ले लेती है। विडंबना यह भी है कि गंगा की धारा के बीच में तो केवल फसलें बहती हैं, लेकिन तटीय खेतों की तो मिट्टी तक कटकर गंगा में हमेशा के लिए बह जाती है।
कई एकड़ बीघा वाले किसान भी फसल हीन हो जाते हैं। इस साल भी खादर क्षेत्र में यही हालात हैं। गांव कुंदनपुर निवासी बाबूराम शर्मा के अनुसार गंगा की धारा के पास उनकी 44 बीघा जमीन में खड़ी गन्ने की फसल गंगा में बह गई। गांव के पास वाले खड़ी फसल भी पानी में डूबी है। वे गांव वालों को अपने खेत में खड़ा गन्ना चारे के लिए कटवा रहे हैं। गांव के ही नौबहार सिंह की 42 बीघा फसल गंगा में समा गई। सुक्खेपुर निवासी तारे सिंह की दस बीघा जमीन धारा के बीच में थी।
विज्ञापन
गांव मीरापुर खादर निवासी लित्तर सिंह ने धारा के बीच में 20 बीघा जमीन में धान बोया था। सब जलमग्न हो गया। किसान बाबूराम के अनुसार गंगा की धारा के बीच में फसल बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन तटबंध बने तो गांव के पास के खेतों को बचाया जा सकता है। प्रशासन चाहे तो तटबंध बनवाकर गांवों के पास होने वाली तबाही को खत्म कर सकता है। वहीं शेरकोट में सिंचाई विभाग ने हाईवे को खो नदी के प्रकोप से बचाने के लिए स्टड बनाने का काम शुरू कर दिया है। सिंचाई विभाग के जेईविकास यादव ने बताया कि शेरकोट मनोकामना मंदिर को खो नदी के पानी से खतरा बढ़ रहा था, जिससे हाईवे के क्षतिग्रस्त होने का खतरा मंडरा रहा है। नुकसान से बचने के लिए बंदों पर बल्ली के स्टड बनाए गए हैं। इससे बरसात के पानी को नियंत्रित किया जा रहा है।
विज्ञापन
गांव सीमली, मीरापुर खादर, कोहरपुर, मिर्जापुर, रावली, ब्रह्मपुरी, डैबलगढ़, चाहड़वाला, रघुनाथपुर, वीरूवाला, कुंदनपुर टीप आदि गंगा और मालन के किनारे बसे हैं। पहाड़ों पर होने वाली बारिश इन गांवों के किसानों की हजारों बीघा जमीन को अपने आगोश में ले लेती है। विडंबना यह भी है कि गंगा की धारा के बीच में तो केवल फसलें बहती हैं, लेकिन तटीय खेतों की तो मिट्टी तक कटकर गंगा में हमेशा के लिए बह जाती है।
विज्ञापन
कई एकड़ बीघा वाले किसान भी फसल हीन हो जाते हैं। इस साल भी खादर क्षेत्र में यही हालात हैं। गांव कुंदनपुर निवासी बाबूराम शर्मा के अनुसार गंगा की धारा के पास उनकी 44 बीघा जमीन में खड़ी गन्ने की फसल गंगा में बह गई। गांव के पास वाले खड़ी फसल भी पानी में डूबी है। वे गांव वालों को अपने खेत में खड़ा गन्ना चारे के लिए कटवा रहे हैं। गांव के ही नौबहार सिंह की 42 बीघा फसल गंगा में समा गई। सुक्खेपुर निवासी तारे सिंह की दस बीघा जमीन धारा के बीच में थी।
विज्ञापन
गांव मीरापुर खादर निवासी लित्तर सिंह ने धारा के बीच में 20 बीघा जमीन में धान बोया था। सब जलमग्न हो गया। किसान बाबूराम के अनुसार गंगा की धारा के बीच में फसल बचाने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन तटबंध बने तो गांव के पास के खेतों को बचाया जा सकता है। प्रशासन चाहे तो तटबंध बनवाकर गांवों के पास होने वाली तबाही को खत्म कर सकता है। वहीं शेरकोट में सिंचाई विभाग ने हाईवे को खो नदी के प्रकोप से बचाने के लिए स्टड बनाने का काम शुरू कर दिया है। सिंचाई विभाग के जेईविकास यादव ने बताया कि शेरकोट मनोकामना मंदिर को खो नदी के पानी से खतरा बढ़ रहा था, जिससे हाईवे के क्षतिग्रस्त होने का खतरा मंडरा रहा है। नुकसान से बचने के लिए बंदों पर बल्ली के स्टड बनाए गए हैं। इससे बरसात के पानी को नियंत्रित किया जा रहा है।