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भूखे ही 11 दिन तक लड़ी जंग
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अफजलगढ़ के कर्नल आरएस सिरोही।
- फोटो : BIJNOR
भूखे ही 11 दिनों तक लड़ी जंग
अफजलगढ़ (बिजनौर)। कारगिल युद्ध के नायकों के सम्मान में 26 जुलाई को देश भर में विजय दिवस मनाया जाता है। कारगिल युद्ध में क्षेत्र सैनिकों ने भी दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। इस युद्ध में शामिल रहे कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ, सूबेदार पूरन सिंह, कर्नल आरएस सिरोही और कैप्टन भारत सिंह रावत ने अपने अनुभव साझा किए। इस सैनिकों को अपने ऊपर गर्व है कि ये सभी ऑपरेशन विजय का हिस्सा रहे। युद्ध के बाद इन सैनिकों को ऑपरेशन विजय स्टार, ऑपरेशन विजय मेडल जैसे सम्मान से नवाजा गया।
कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ पत्थरवाला फार्म कादराबाद ने बताया कि उस समय वह गुरेज में कमांडर थे। उनकी टुकड़ी में 20 लोग थे। इनमें 12 उनके साथ थे और बाकी इधर-उधर फैल गए। जो भी घुसपैठिया दिखाई दिया उनको मार गिराया। उन्होंने किसी पाकिस्तानी को आगे नहीं बढ़ने दिया। गुरेज सेक्टर में टीम को चौकन्ना रख 11 दिनों तक वहीं बिना खाने के रहे। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान पहाड़ियों पर चढ़ने में जान का खतरा ज्यादा होता था। किंतु वह बिना थके लड़े ओर ऑपरेशन विजय में सहयोगी बने।
सूबेदार पूरन सिंह असवाल निवासी विजयनगर ने बताया कि उस समय वह आठ पर्वतीय खंड सिग्नल रेजीमेंट, जो आठ पर्वतीय डिवीजन ट्रास सेक्टर का हिस्सा थी, वहां तैनात थे। उन्होंने कारगिल युद्ध में सैन्य मुख्यालय श्रीनगर कारगिल, बटालिक सेक्टर, ट्रास सेक्टर तक अपनी सैन्य टुकड़ियों व कमांडरों के साथ युद्ध के दौरान संचार व्यवस्था बनाए रखने का काम किया। दुर्गम पहाड़ियों में रेडियो व लाइन संचार व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती भरा काम था। परंतु सिग्नल के जाबांजों ने बहादुरी व साहस के साथ हर हाल में सैन्य कमांडरों के मध्य संचार व्यवस्था को बनाए रखा और लड़ाई के संदेशों को कमांडरों तक पहुंचाया। अंत में दुश्मन को ऊंची चोटियों से मार भगाने में अपना सफल योगदान दिया। जिसके लिए बाद में प्रशस्ति पत्र देकर उन्हें सम्मानित किया गया।
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कर्नल आरएस सिरोही मुरलीवाला ने बताया कि इस समय वह 21 पैरा एसएस के साथ थे। आठ अप्रैल से युद्ध के अंत तक वह बंकर व पत्थरों से बने सेंजरों में रहे। लड़ाई के हालात ऐसे थे कि कब बम ऊपर से आ पड़ेगा इसका कोई अनुमान नहीं था। बस जो जहां घुसपैठिया दिखा मार गिराने की धुन थी। बटालियन में 1760 जवान थे। जिसमें कोई क्षति नहीं हुई। ऑपरेशन विजय की जीत के बाद चोटियों पर झंडा लहराया गया तथा ऑपरेशन विजय स्टार व ऑपरेशन विजय मेडल से उन्हें नवाजा गया। इस युद्ध को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
अदम्य साहस से जीती थी लड़ाई : कैप्टन भारत सिंह
कैप्टन भारत सिंह रावत निवासी विजयनगर ने बताया कि कारगिल युद्ध में दो राष्ट्रीय राइफल्स में रहते हुए कारगिल सेक्टर की विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध में भाग लिया। उन ऊंची दुर्गम पहाड़ियों में लड़ाई लड़ना काफी कठिन था, क्योंकि दुश्मन ऊंची चोटियों कारगिल व बटालिक सेक्टर में बैठकर हमारी टुकड़ियों पर हमला कर रहा था। उस समय बस एक धुन सवार थी कि दुश्मन जहां भी दिखे, उसे मार गिराना है। परंतु हमारे जवानों ने अदम्य साहस, वीरता व सूझबूझ का परिचय देते हुए दुश्मन को उन चोटियों से भागने में सफलता हासिल की। आखिरकार चोटियों पर काबिज होकर भारतीय तिरंगा फहराया।
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अफजलगढ़ (बिजनौर)। कारगिल युद्ध के नायकों के सम्मान में 26 जुलाई को देश भर में विजय दिवस मनाया जाता है। कारगिल युद्ध में क्षेत्र सैनिकों ने भी दुश्मनों के दांत खट्टे किए थे। इस युद्ध में शामिल रहे कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ, सूबेदार पूरन सिंह, कर्नल आरएस सिरोही और कैप्टन भारत सिंह रावत ने अपने अनुभव साझा किए। इस सैनिकों को अपने ऊपर गर्व है कि ये सभी ऑपरेशन विजय का हिस्सा रहे। युद्ध के बाद इन सैनिकों को ऑपरेशन विजय स्टार, ऑपरेशन विजय मेडल जैसे सम्मान से नवाजा गया।
कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ पत्थरवाला फार्म कादराबाद ने बताया कि उस समय वह गुरेज में कमांडर थे। उनकी टुकड़ी में 20 लोग थे। इनमें 12 उनके साथ थे और बाकी इधर-उधर फैल गए। जो भी घुसपैठिया दिखाई दिया उनको मार गिराया। उन्होंने किसी पाकिस्तानी को आगे नहीं बढ़ने दिया। गुरेज सेक्टर में टीम को चौकन्ना रख 11 दिनों तक वहीं बिना खाने के रहे। उन्होंने कहा कि युद्ध के दौरान पहाड़ियों पर चढ़ने में जान का खतरा ज्यादा होता था। किंतु वह बिना थके लड़े ओर ऑपरेशन विजय में सहयोगी बने।
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सूबेदार पूरन सिंह असवाल निवासी विजयनगर ने बताया कि उस समय वह आठ पर्वतीय खंड सिग्नल रेजीमेंट, जो आठ पर्वतीय डिवीजन ट्रास सेक्टर का हिस्सा थी, वहां तैनात थे। उन्होंने कारगिल युद्ध में सैन्य मुख्यालय श्रीनगर कारगिल, बटालिक सेक्टर, ट्रास सेक्टर तक अपनी सैन्य टुकड़ियों व कमांडरों के साथ युद्ध के दौरान संचार व्यवस्था बनाए रखने का काम किया। दुर्गम पहाड़ियों में रेडियो व लाइन संचार व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती भरा काम था। परंतु सिग्नल के जाबांजों ने बहादुरी व साहस के साथ हर हाल में सैन्य कमांडरों के मध्य संचार व्यवस्था को बनाए रखा और लड़ाई के संदेशों को कमांडरों तक पहुंचाया। अंत में दुश्मन को ऊंची चोटियों से मार भगाने में अपना सफल योगदान दिया। जिसके लिए बाद में प्रशस्ति पत्र देकर उन्हें सम्मानित किया गया।
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कर्नल आरएस सिरोही मुरलीवाला ने बताया कि इस समय वह 21 पैरा एसएस के साथ थे। आठ अप्रैल से युद्ध के अंत तक वह बंकर व पत्थरों से बने सेंजरों में रहे। लड़ाई के हालात ऐसे थे कि कब बम ऊपर से आ पड़ेगा इसका कोई अनुमान नहीं था। बस जो जहां घुसपैठिया दिखा मार गिराने की धुन थी। बटालियन में 1760 जवान थे। जिसमें कोई क्षति नहीं हुई। ऑपरेशन विजय की जीत के बाद चोटियों पर झंडा लहराया गया तथा ऑपरेशन विजय स्टार व ऑपरेशन विजय मेडल से उन्हें नवाजा गया। इस युद्ध को कभी भुलाया नहीं जा सकता।
अदम्य साहस से जीती थी लड़ाई : कैप्टन भारत सिंह
कैप्टन भारत सिंह रावत निवासी विजयनगर ने बताया कि कारगिल युद्ध में दो राष्ट्रीय राइफल्स में रहते हुए कारगिल सेक्टर की विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध में भाग लिया। उन ऊंची दुर्गम पहाड़ियों में लड़ाई लड़ना काफी कठिन था, क्योंकि दुश्मन ऊंची चोटियों कारगिल व बटालिक सेक्टर में बैठकर हमारी टुकड़ियों पर हमला कर रहा था। उस समय बस एक धुन सवार थी कि दुश्मन जहां भी दिखे, उसे मार गिराना है। परंतु हमारे जवानों ने अदम्य साहस, वीरता व सूझबूझ का परिचय देते हुए दुश्मन को उन चोटियों से भागने में सफलता हासिल की। आखिरकार चोटियों पर काबिज होकर भारतीय तिरंगा फहराया।

अफजलगढ़ के कैप्टन रघुवीर सिंह बिष्ठ।- फोटो : BIJNOR

अफजलगढ़ के सूबेदार पुरन सिंह असवाल।- फोटो : BIJNOR