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तटीय गांवों में दिखावा बनी बाढ़ राहत चौकी
अमर उजाला/बिजनौर
Updated Sat, 25 Aug 2018 12:34 AM IST
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लापता लोगों को तलाश करते बाढ़ राहत दल की टीम।
- फोटो : अमर उजाला
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बिजनौर में प्रशासन के पास गंगा में डूबने वाले लोगों को बचाने के लिए कोई इंतजाम नहीं है। बाढ़ चौकी भी केवल दिखावा ही हैं। इन चौकियों पर कोई कर्मचारी तैनात नहीं रहता है। चौकी तो खुलती हैं लेकिन ये सब खाली पड़ी रहती हैं। मुसीबत आने पर कोई भी गांव वालों की मदद के लिए नहीं आता है। बरसात के दिनों में तटीय गांव के लोगों की जान को खतरा रहता है। चारा लाते समय या बाढ़ आने पर ये लोग गंगा में डूब जाते हैं। इन लोगों को बचाने के लिए प्रशासन के पास कोई इंतजाम नहीं है। गजब तो यह है कि बरसात के दिनों में गांव वालों की मदद के लिए बाढ़ राहत चौकी गंगा के क्षेत्र में या जहां बाढ़ आने का खतरा है वहां खोली जाती हैं। पर इन चौकियों पर कोई कर्मचारी तैनात नहीं रहता है। चौकी खाली पड़ी रहती हैं। इसे लेकर भी गांव वालों में भारी गुस्सा है।
गांव वालों के मुताबिक बाढ़ राहत चौकी केवल दिखावा ही हैं। ये सब चौकी खाली पड़ी हैं। रावली हो या कोई और गांव सब जगह चौकियों का यही हाल है। कोई गांव इन चौकियों के भरोसे पर नहीं रहता है। मुसीबत आने पर गांव वाले खुद ही अपनी मदद को आगे आते हैं। इतना ही नहीं इन चौकियों को आकर अफसर भी नहीं देखते हैं। बाढ़ या कोई अन्य मुसीबत आने पर गांव वालों से संपर्क करके हालात के बारे में तो मालूम किया जाता है। तटीय गांव के लोग मरें या जिएं इससे प्रशासन को कोई वास्ता नहीं है। अभी तक कोई भी अफसर उनकी सुध नहीं लेने नहीं आया है। मंडावर क्षेत्र में नाव पलटने पर शुक्रवार को जरूर अफसरों के चेहरे दिखाई दिए। अफसर केवल चेहरे दिखाने के लिए ही आए।
मजबूरी में हर रोज हथेली पर रखनी पड़ती है जान
बिजनौर। जान जोखिम में डालकर रोजाना गंगा पार पशुओं के लिए चारा लेने जाने वाले गांव वालों की जान बचाने का कोई साधन नहीं है। जान हथेली पर रखकर रोज वे नाव के सहारे गंगा पार जाते हैं। घास की गठरी ही उनकी जीवन रक्षक है। इसके सहारे ही वह अपनी जान बचाते हैं। शुक्रवार को भी नाव डूबते समय जिन किसानों के हाथ में चारे की गठरी आ गई वही बच पाए।
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बरसात के दिनों में गंगा उफान पर रहती है। इस दौरान गंगा से सटे गांव वालों को पशुओं के लिए चारा लाने में जान जोखिम में डालनी पड़ती है। ये लोग रोजाना इकट्ठा होकर नाव से जान हथेली पर रखकर पशुओं के लिए चारा लेने के लिए करीब चार किलोमीटर गंगा को पार करके जाते हैं। ये सभी एक साथ चारा लेकर आते हैं। इनकी जान बचाने का कोई साधन नहीं है। रोजाना जान की परवाह किए बगैर किसान ये जोखिम उठाने को मजबूर हैं। शुक्रवार को भी ये सब लोग इकट्ठा होकर चारा लेने के लिए घर से निकले थे। घर से निकलते समय इन्हें क्या मालूम था कि गंगा की लहरों में ही उनकी नाव समा जाएगी।
गंगा से निकाले गए गांव वालों के मुताबिक गंगा की लहरें समुद्र की तरह उफान मार रही थीं। नाव जब लहरों के बीच में आई तो उसमें पानी भर गया। नाव में 28 महिला पुरुषों के अलावा पशुओं के चारे के लिए घास की गठरी थीं। अचानक नाव गंगा में पलट गई। नाव में सवार लोगों में हाहाकार मच गया। कुछ लोगों ने घास की गठरी कब्जा ली और उसे नहीं छोड़ा। घास की गठरी पानी में डूबती नहीं है। गठरी के सहारे यह लोग गंगा में बहते चले आए। गठरी ने ही इन लोगों की जान बचाई। जिनके पास गठरी नहीं थी वे लोग गंगा में डूब गए। रावली गांव के मीर हसन के मुताबिक घास की गठरी ही गंगा पार चारा लाने वालों का सहारा है। इसके अलावा किसी और चीज से जान नहीं बच सकती। गठरी जिसके पास है वह गंगा में नहीं डूब सकता है। उन्होंने बताया कि गंगा पार से चारा लाने वाले इसलिए चारे की गठरी अपने पास ही रखते हैं।
कसकर बांधते हैं घास की गठरी
गांव वालों की मानें तो चारा लाते समय गठरी को मजबूती से इसलिए बांधा जाता है कि कहीं वह डूबने के दौरान खुल न जाए। गठरी खुलने पर इसे पकड़ने वाले की जान भी जा सकती है। सभी गठरी को मजबूती के साथ बांधकर लाते हैं।
गठरी ने बचाई थी पांच लोगों की जान
रावली गांव के मीर हसन के मुताबिक पिछले साल चारा लाते समय उनकी नाव भी गंगा की लहरों में पलट गई थी। नाव में उन समेत पांच लोग सवार थे। सभी के पास घास की गठरी थी। सभी ने नाव पलटते ही अपनी गठरी कब्जा ली और गठरी के सहारे बैराज पर आकर गंगा से बाहर निकल गए। उन्हें बचाने कोई नहीं आया था। इस हादसे के बाद भी वह रोज जान जोखिम में डालकर चारा लेने गंगा पार जाते हैं।
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गांव वालों के मुताबिक बाढ़ राहत चौकी केवल दिखावा ही हैं। ये सब चौकी खाली पड़ी हैं। रावली हो या कोई और गांव सब जगह चौकियों का यही हाल है। कोई गांव इन चौकियों के भरोसे पर नहीं रहता है। मुसीबत आने पर गांव वाले खुद ही अपनी मदद को आगे आते हैं। इतना ही नहीं इन चौकियों को आकर अफसर भी नहीं देखते हैं। बाढ़ या कोई अन्य मुसीबत आने पर गांव वालों से संपर्क करके हालात के बारे में तो मालूम किया जाता है। तटीय गांव के लोग मरें या जिएं इससे प्रशासन को कोई वास्ता नहीं है। अभी तक कोई भी अफसर उनकी सुध नहीं लेने नहीं आया है। मंडावर क्षेत्र में नाव पलटने पर शुक्रवार को जरूर अफसरों के चेहरे दिखाई दिए। अफसर केवल चेहरे दिखाने के लिए ही आए।
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मजबूरी में हर रोज हथेली पर रखनी पड़ती है जान
बिजनौर। जान जोखिम में डालकर रोजाना गंगा पार पशुओं के लिए चारा लेने जाने वाले गांव वालों की जान बचाने का कोई साधन नहीं है। जान हथेली पर रखकर रोज वे नाव के सहारे गंगा पार जाते हैं। घास की गठरी ही उनकी जीवन रक्षक है। इसके सहारे ही वह अपनी जान बचाते हैं। शुक्रवार को भी नाव डूबते समय जिन किसानों के हाथ में चारे की गठरी आ गई वही बच पाए।
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बरसात के दिनों में गंगा उफान पर रहती है। इस दौरान गंगा से सटे गांव वालों को पशुओं के लिए चारा लाने में जान जोखिम में डालनी पड़ती है। ये लोग रोजाना इकट्ठा होकर नाव से जान हथेली पर रखकर पशुओं के लिए चारा लेने के लिए करीब चार किलोमीटर गंगा को पार करके जाते हैं। ये सभी एक साथ चारा लेकर आते हैं। इनकी जान बचाने का कोई साधन नहीं है। रोजाना जान की परवाह किए बगैर किसान ये जोखिम उठाने को मजबूर हैं। शुक्रवार को भी ये सब लोग इकट्ठा होकर चारा लेने के लिए घर से निकले थे। घर से निकलते समय इन्हें क्या मालूम था कि गंगा की लहरों में ही उनकी नाव समा जाएगी।
गंगा से निकाले गए गांव वालों के मुताबिक गंगा की लहरें समुद्र की तरह उफान मार रही थीं। नाव जब लहरों के बीच में आई तो उसमें पानी भर गया। नाव में 28 महिला पुरुषों के अलावा पशुओं के चारे के लिए घास की गठरी थीं। अचानक नाव गंगा में पलट गई। नाव में सवार लोगों में हाहाकार मच गया। कुछ लोगों ने घास की गठरी कब्जा ली और उसे नहीं छोड़ा। घास की गठरी पानी में डूबती नहीं है। गठरी के सहारे यह लोग गंगा में बहते चले आए। गठरी ने ही इन लोगों की जान बचाई। जिनके पास गठरी नहीं थी वे लोग गंगा में डूब गए। रावली गांव के मीर हसन के मुताबिक घास की गठरी ही गंगा पार चारा लाने वालों का सहारा है। इसके अलावा किसी और चीज से जान नहीं बच सकती। गठरी जिसके पास है वह गंगा में नहीं डूब सकता है। उन्होंने बताया कि गंगा पार से चारा लाने वाले इसलिए चारे की गठरी अपने पास ही रखते हैं।
कसकर बांधते हैं घास की गठरी
गांव वालों की मानें तो चारा लाते समय गठरी को मजबूती से इसलिए बांधा जाता है कि कहीं वह डूबने के दौरान खुल न जाए। गठरी खुलने पर इसे पकड़ने वाले की जान भी जा सकती है। सभी गठरी को मजबूती के साथ बांधकर लाते हैं।
गठरी ने बचाई थी पांच लोगों की जान
रावली गांव के मीर हसन के मुताबिक पिछले साल चारा लाते समय उनकी नाव भी गंगा की लहरों में पलट गई थी। नाव में उन समेत पांच लोग सवार थे। सभी के पास घास की गठरी थी। सभी ने नाव पलटते ही अपनी गठरी कब्जा ली और गठरी के सहारे बैराज पर आकर गंगा से बाहर निकल गए। उन्हें बचाने कोई नहीं आया था। इस हादसे के बाद भी वह रोज जान जोखिम में डालकर चारा लेने गंगा पार जाते हैं।