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बागी घोषित हुआ था फीना, पूरे गांव पर लगा था जुर्माना
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नूरपुर क्षेत्र के गांव फीना में बना कीर्ति स्तंभ।
- फोटो : BIJNOR
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बागी घोषित हुआ था फीना, पूरे गांव पर लगा था जुर्माना
बिजनौर। स्वतंत्रता संग्राम में नूरपुर थाना क्षेत्र के ग्राम फीना का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ग्राम फीना से स्वतंत्रता आंदोलन में 16 क्रांतिकारी जेल गए और सैकड़ों लोग आंदोलन से जुड़े रहे। अज्ञात वास में दो सेनानियों का निधन हो गया था। ग्राम फीना में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी चेतना जगी कि विद्रोह की भावना को दबाने के लिए अंग्रेजों को 80 सशस्त्र सैनिक भेजने पड़े थे। फीना को बागी घोषित कर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगा दिया गया था।
1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1941 के व्यक्तिगत असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गांव के लोगों ने भागीदारी की थी। फीना के क्रांतिकारी बसंत सिंह, क्षेत्रपाल सिंह, रणधीर सिंह, डॉ. भारत सिंह और होरी सिंह ने इसके लिए अथक प्रयास किए। इन सबकी कोशिश का परिणाम यह हुआ कि 16 अगस्त 1942 को जब नूरपुर थाने पर तिरंगा लगाने के लिए आम जनता से वहां पहुंचने की अपील की गई तो केवल फीना से ही 250-300 की संख्या में लोग वहां पहुंच गए। बिजनौर के इतिहास के जानकार हेमंत कुमार बताते हैं कि नूरपुर पहुंचने के दौरान सेनानियों ने ग्राम रतनगढ़ के डाकघर में तोड़फोड़ की तथा नूरपुर में बन रहे सरकारी डाक बंगले को तहस-नहस कर डाला। इससे आगे बढ़ने पर पुलिस की बेरिकेडिंग में हुए लाठीचार्ज के दौरान डॉ. भारत सिंह के सिर में गंभीर चोटें आ गईं, जबकि नूरपुर थाने पर तिरंगा लगाए जाने के प्रयास में हुए लाठीचार्ज में क्षेत्रपाल सिंह के पैर में गंभीर चोट आ गई।
इन घटनाओं की जब एकीकृत जानकारी अंग्रेज सरकार को हुई तो उन्हें लगा कि लगभग पूरा गांव अंग्रेजों के खिलाफ है। इसके बाद फीना को बागी घोषित कर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगा दिया गया था। 16 अगस्त की घटना के बाद सेनानी जब गांव लौटे तो उनमें से परवीन सिंह तथा बलकरन सिंह का अज्ञातवास के दौरान जंगलों में तेज बुखार के कारण निधन हो गया था। गांव वाले इन्हें शहीद मानते हैं, भले ही ये दोनों गुमनाम रह गए। बसंत सिंह को 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में चार माह की कड़ी कैद और 25 रुपये का जुर्माना हुआ। फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान छह महीने की कड़ी कैद मिली। क्षेत्रपाल सिंह को तीन बार जेल भेजा गया। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में 18 महीने की कड़ी कैद और 100 रुपये जुर्माने की सजा पाई। गांधी जी का साथ देने के लिए ये पूना तक गए। वहां एक महीने की जेल हुई। फिर नूरपुर थाना केस में दौ वर्ष कैद की सजा मिली।
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भारत सिंह ने दी सबसे अधिक कुर्बानी
रणधीर सिंह को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में नौ मास की कड़ी कैद की सजा हुई। डॉ. भारत सिंह ने स्वतंत्रता के लिए सबसे अधिक कुर्बानी दी। 16 अगस्त 1942 को नूरपुर में पुलिस की लाठी चार्ज में उनका सिर फटा। नूरपुर तिरंगा केस में भारत रक्षा कानून के अंतर्गत 9 मास की कड़ी कैद की सजा मिली। साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा के अंतर्गत 3 मास कड़ी कैद की सजा मिली। जेल में रहने के दौरान इनके एकलौते बालक का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। घर से कोई संदेश लाया और जेलर से इनको छोड़ने की बात कही। जेलर ने कहा, माफी लिख दी तो छोड़ दूंगा। भारत सिंह ने माफी लिखने से साफ इंकार कर दिया। समुचित देखभाल के अभाव में इनके पुत्र का निधन हो गया। होरी सिंह को भारत छोड़ो आंदोलन में एक वर्ष कड़ी कैद और 90 रुपये जुर्माने की सजा हुई। ग्राम फीना निवासी हेमंत कुमार ने निरंतर प्रयासों से फीना के सैकड़ों गुमनाम सेनानियों में से 29 के नाम पता लगाए। इन्होंने सेनानियों की याद में स्मारक निर्माण की परिकल्पना की तथा डिजाइन तैयार किया। ग्राम फीना कल्याण समिति के तत्वावधान में फीनावंशियों ने कीर्ति स्तंभ का निर्माण कराया है। इसका लोकार्पण इसी 16 अगस्त को किया जाएगा।
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बिजनौर। स्वतंत्रता संग्राम में नूरपुर थाना क्षेत्र के ग्राम फीना का महत्वपूर्ण योगदान रहा। ग्राम फीना से स्वतंत्रता आंदोलन में 16 क्रांतिकारी जेल गए और सैकड़ों लोग आंदोलन से जुड़े रहे। अज्ञात वास में दो सेनानियों का निधन हो गया था। ग्राम फीना में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी चेतना जगी कि विद्रोह की भावना को दबाने के लिए अंग्रेजों को 80 सशस्त्र सैनिक भेजने पड़े थे। फीना को बागी घोषित कर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगा दिया गया था।
1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन, 1941 के व्यक्तिगत असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में गांव के लोगों ने भागीदारी की थी। फीना के क्रांतिकारी बसंत सिंह, क्षेत्रपाल सिंह, रणधीर सिंह, डॉ. भारत सिंह और होरी सिंह ने इसके लिए अथक प्रयास किए। इन सबकी कोशिश का परिणाम यह हुआ कि 16 अगस्त 1942 को जब नूरपुर थाने पर तिरंगा लगाने के लिए आम जनता से वहां पहुंचने की अपील की गई तो केवल फीना से ही 250-300 की संख्या में लोग वहां पहुंच गए। बिजनौर के इतिहास के जानकार हेमंत कुमार बताते हैं कि नूरपुर पहुंचने के दौरान सेनानियों ने ग्राम रतनगढ़ के डाकघर में तोड़फोड़ की तथा नूरपुर में बन रहे सरकारी डाक बंगले को तहस-नहस कर डाला। इससे आगे बढ़ने पर पुलिस की बेरिकेडिंग में हुए लाठीचार्ज के दौरान डॉ. भारत सिंह के सिर में गंभीर चोटें आ गईं, जबकि नूरपुर थाने पर तिरंगा लगाए जाने के प्रयास में हुए लाठीचार्ज में क्षेत्रपाल सिंह के पैर में गंभीर चोट आ गई।
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इन घटनाओं की जब एकीकृत जानकारी अंग्रेज सरकार को हुई तो उन्हें लगा कि लगभग पूरा गांव अंग्रेजों के खिलाफ है। इसके बाद फीना को बागी घोषित कर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना लगा दिया गया था। 16 अगस्त की घटना के बाद सेनानी जब गांव लौटे तो उनमें से परवीन सिंह तथा बलकरन सिंह का अज्ञातवास के दौरान जंगलों में तेज बुखार के कारण निधन हो गया था। गांव वाले इन्हें शहीद मानते हैं, भले ही ये दोनों गुमनाम रह गए। बसंत सिंह को 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में चार माह की कड़ी कैद और 25 रुपये का जुर्माना हुआ। फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान छह महीने की कड़ी कैद मिली। क्षेत्रपाल सिंह को तीन बार जेल भेजा गया। 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में 18 महीने की कड़ी कैद और 100 रुपये जुर्माने की सजा पाई। गांधी जी का साथ देने के लिए ये पूना तक गए। वहां एक महीने की जेल हुई। फिर नूरपुर थाना केस में दौ वर्ष कैद की सजा मिली।
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भारत सिंह ने दी सबसे अधिक कुर्बानी
रणधीर सिंह को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में नौ मास की कड़ी कैद की सजा हुई। डॉ. भारत सिंह ने स्वतंत्रता के लिए सबसे अधिक कुर्बानी दी। 16 अगस्त 1942 को नूरपुर में पुलिस की लाठी चार्ज में उनका सिर फटा। नूरपुर तिरंगा केस में भारत रक्षा कानून के अंतर्गत 9 मास की कड़ी कैद की सजा मिली। साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा के अंतर्गत 3 मास कड़ी कैद की सजा मिली। जेल में रहने के दौरान इनके एकलौते बालक का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया। घर से कोई संदेश लाया और जेलर से इनको छोड़ने की बात कही। जेलर ने कहा, माफी लिख दी तो छोड़ दूंगा। भारत सिंह ने माफी लिखने से साफ इंकार कर दिया। समुचित देखभाल के अभाव में इनके पुत्र का निधन हो गया। होरी सिंह को भारत छोड़ो आंदोलन में एक वर्ष कड़ी कैद और 90 रुपये जुर्माने की सजा हुई। ग्राम फीना निवासी हेमंत कुमार ने निरंतर प्रयासों से फीना के सैकड़ों गुमनाम सेनानियों में से 29 के नाम पता लगाए। इन्होंने सेनानियों की याद में स्मारक निर्माण की परिकल्पना की तथा डिजाइन तैयार किया। ग्राम फीना कल्याण समिति के तत्वावधान में फीनावंशियों ने कीर्ति स्तंभ का निर्माण कराया है। इसका लोकार्पण इसी 16 अगस्त को किया जाएगा।