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250 रुपये की मजदूरी के लिए रोज मौत से सामना
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बिजनौर में जोधूवाला रोड पर पटाखा फैक्टरी में आग लगने से घायल युवक से पूछताछ करते एसपी।
- फोटो : BIJNOR
बिजनौर। फैक्टरी में काम करने वाले मजदूर रोज 250 रुपये की मजदूरी के लिए मौत से सामना करते थे। फैक्टरी में आग बुझाने और आग लगने पर बच निकलने के इंतजाम भी नहीं थे। यही कारण रहा कि जो अंदर फंसा, उससे बाहर ही नहीं निकला गया और पांच लोग इस अग्निकांड में जान गवां बैठे।
असल में जिस नए मकान में आतिशबाजी बनाई जा रही थी। उसमें तीन कमरे हैं। सबसे अंदर के कमरे में पांच लोग आतिशबाजी बना रहा थे। बाहर मेन गेट के पास के कमरे में समरपाल समेत चार लोग आतिशबाजी बनाने में लगे थे। समरपाल ने पुलिस को बताया कि अचानक आग लगने से वह अपने चार साथियों के साथ किसी तरह बाहर निकल आया, लेकिन अंदर के कमरे में काम करने वाले पांचों लोग बाहर न आ सके और उनकी आग से झुलसकर मौत हो गई। देखते ही देखते आग और धुआं हर तरफ छा गया। समरपाल ने मकान के गेट पर ताले की बात से इन्कार किया। आग इतनी तेजी से फैली कि वह अपने चारों साथियों के साथ आग में झुलस गए। फैक्टरी में एक मजदूर को रोजना 250 रुपये मिलते थे। परिजनों के मुताबिक सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक काम करना होता था। काफी समय से ये लोग फैक्टरी में काम कर रहे थे। यहां पर मजदूर अक्सर बदल जाते थे। मृतक प्रदीप एक माह से फैक्टरी में काम कर रहा था। शानू कुमार दो माह पहले, चिंटू तीन दिन पहले आया था। प्रदीप व चिंटू काम करने वालों मे सबसे छोटे थे।
हर तरह की आतिशबाजी बन रही थी
फैक्टरी में छोटी से लेकर बड़ी हर तरह की आतिशबाजी बन रही थी। जान जोखिम में डालकर ये लोग वहां काम कर रहे थे। मकान के अंदर कैमिकल के जले हुए डिब्बो के अलावा बड़ी अतिशबाजी के डिब्बे भी मिले हैं। मकान में जीने के रास्ते से छत पर जाने का रास्ता तो थ, पर अंदर फंसे लोग संभल ही न सके।
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असल में जिस नए मकान में आतिशबाजी बनाई जा रही थी। उसमें तीन कमरे हैं। सबसे अंदर के कमरे में पांच लोग आतिशबाजी बना रहा थे। बाहर मेन गेट के पास के कमरे में समरपाल समेत चार लोग आतिशबाजी बनाने में लगे थे। समरपाल ने पुलिस को बताया कि अचानक आग लगने से वह अपने चार साथियों के साथ किसी तरह बाहर निकल आया, लेकिन अंदर के कमरे में काम करने वाले पांचों लोग बाहर न आ सके और उनकी आग से झुलसकर मौत हो गई। देखते ही देखते आग और धुआं हर तरफ छा गया। समरपाल ने मकान के गेट पर ताले की बात से इन्कार किया। आग इतनी तेजी से फैली कि वह अपने चारों साथियों के साथ आग में झुलस गए। फैक्टरी में एक मजदूर को रोजना 250 रुपये मिलते थे। परिजनों के मुताबिक सुबह आठ बजे से शाम पांच बजे तक काम करना होता था। काफी समय से ये लोग फैक्टरी में काम कर रहे थे। यहां पर मजदूर अक्सर बदल जाते थे। मृतक प्रदीप एक माह से फैक्टरी में काम कर रहा था। शानू कुमार दो माह पहले, चिंटू तीन दिन पहले आया था। प्रदीप व चिंटू काम करने वालों मे सबसे छोटे थे।
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हर तरह की आतिशबाजी बन रही थी
फैक्टरी में छोटी से लेकर बड़ी हर तरह की आतिशबाजी बन रही थी। जान जोखिम में डालकर ये लोग वहां काम कर रहे थे। मकान के अंदर कैमिकल के जले हुए डिब्बो के अलावा बड़ी अतिशबाजी के डिब्बे भी मिले हैं। मकान में जीने के रास्ते से छत पर जाने का रास्ता तो थ, पर अंदर फंसे लोग संभल ही न सके।
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