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Bijnor News: 1857 की क्रांति में अंग्रेज अफसरों ने दस माह के लिए छोड़ दिया था बिजनौर

Sat, 15 Aug 2026 01:02 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 15 Aug 2026 01:02 AM IST
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During the Revolution of 1857, British officers abandoned Bijnor for ten months.
-मेरठ की क्रांति की खबर 13 मई 1857 को पहुंची थी बिजनौर
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- अंग्रेजों ने कलक्ट्रेट के पीछे कुएं में फेंक दिया था जिला मुख्यालय का खजाना
संवाद न्यूज एजेंसी
बिजनौर। यूं तो 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ। मगर आजादी की जंग के लिए बिगुल साल 1857 में बज चुका था। इस पहली क्रांति में बिजनौर ने भी बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। भयंकर विद्रोह के बीच अंग्रेज अफसरों अपनी जान बचाने के बिजनौर छोड़ दिया था और रुड़की पहुंच गए थे। दस महीने बाद अंग्रेजों ने फिर से बिजनौर व्यवस्था संभाल ली थी।
बिजनौर के जिला गजेटियर के अनुसार मेरठ में 10 मई 1857 को शुरू हुए विद्रोह की खबर 13 मई को बिजनौर पहुंची। इससे जिले में लोगों के बीच आक्रोश बढ़ गया। अंग्रेज अधिकारियों ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए इंतजाम शुरू कर दिए। भारतीय सैनिकों को छुट्टी से वापस बुलाया गया और स्थानीय जमींदारों से शहर की सुरक्षा में सहयोग मांगा गया। मगर तमाम इंतजामों के बीच 21 मई को विद्रोहियों ने नगीना तहसील का खजाना लूट लिया था। इसी दिन बिजनौर जेल में बंद 341 कैदियों ने विद्रोह कर और जेल का गेट तोड़ दिया था। मौके पर पहुंचे मजिस्ट्रेट ने गोली चलवाई, जिसमें सात लोग मारे गए। बड़ी संख्या में कैदी भागकर गंगा के रेतीले तट की ओर चले गए।
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अंग्रेजों ने कुएं में डाल दिया खजाना
बगावत के बीच अंग्रेजों के सामने सबसे बड़ी चिंता सरकारी खजाने को बचाने की थी। जिला गजेटियर 1974, पृष्ठ 48 के अनुसार, अंग्रेजों ने बिजनौर के खजाने को कलक्ट्रेट में ही स्थित एक गहरे कुएं में डाल दिया। बाद में महमूद खान कई खाली गाड़ियों के साथ खजाना नजीबाबाद ले जाने के लिए बिजनौर पहुंचे, लेकिन अंग्रेज प्रशासन और स्थानीय जमींदारों की सक्रियता के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा।
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जून में अंग्रेजी प्रशासन हुआ बेअसर
एक जून 1857 को क्रांतिकारी महमूद खान 250 अफगानों के साथ बिजनौर पहुंचे। इस समय तक अंग्रेजी प्रशासन की पकड़ बेहद कमजोर हो चुकी थी। खजाने की कुछ रकम मेरठ भेजी गई, जबकि शेष रकम को सुरक्षित रखने के प्रयास जारी रहे। आखिरकार 8 जून को अंग्रेज अधिकारियों ने बिजनौर छोड़ दिया और 11 जून को रुड़की पहुंच गए। इसके बाद महमूद खान ने बिजनौर में सत्ता संभाली और खुद को दिल्ली के बादशाह की ओर से शासक घोषित किया। उन्होंने प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव किए, डाक व्यवस्था रोक दी और घाटों पर पहरे बैठा दिए थे। लगभग 10 महीने तक जनपद में कोई अंग्रेज अधिकारी नहीं रहा था। क्रांति की ज्वाला ठंडी पड़ने पर 26 अप्रैल 1858 को फिर से बिजनौर में अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिए गए थे।
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