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हाईकोर्ट: 'ड्राफ्ट के आधार पर मतदाता सूची से नाम नहीं हटा सकते', अदालत ने किस बात पर जताई चिंता?
Thu, 01 Oct 2026 01:19 PM IST
नितिन गौतम
न्यूज डेस्क अमर उजाला, पणजी
न्यूज डेस्क अमर उजाला, पणजी
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 01 Oct 2026 01:19 PM IST
सार
एसआईआर को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने कहा है कि ड्राफ्ट में नाम नहीं होना मतदाता सूची से नाम हटाने का आधार नहीं हो सकता। आइए जानते हैं कि क्या है पूरा मामला।
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने जताई चिंता।
- फोटो : एआई
विस्तार
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि एसआईआर के तहत तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची, किसी मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का आधार नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि प्रशासनिक सॉफ्टवेयर सिस्टम, वैधानिक कानूनों की जगह नहीं ले सकते। हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने चुनाव आयोग से उन प्रावधानों को लेकर भी सवाल किया, जो उसे बिना सुनवाई के मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का अधिकार देते हैं। अदालत ने कहा कि यह स्थिति बहुत चिंताजनक है।
अदालत ने क्या कहा?
जस्टिस अमित एस. जामसांडेकर और जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस की खंडपीठ ने बुधवार को एक परिवार के छह सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। परिवार के सदस्यों ने मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों ने अदालत को बताया कि वे उसी सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में एक नए घर में रहने चले गए थे। इसके बाद बूथ लेवल ऑफिसर ने उन्हें पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा करने को कहा था।
याचिका में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, जब इन फॉर्मों को प्रोसेस किया गया तो तकनीकी त्रुटियां सामने आईं, क्योंकि उनके निर्वाचक फोटो पहचान पत्र का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। ऐसे में ईआरओनेट सॉफ्टवेयर में उपलब्ध एकमात्र विकल्प 'रिजेक्ट' था। ईआरओनेट यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स नेटवर्क, चुनाव आयोग द्वारा विकसित एक वेब आधारित फॉर्म-प्रोसेसिंग और मतदाता सूची प्रबंधन प्रणाली है।
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सालगांवकर ने बताया कि सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी ने उन्हें सूचित किया कि उनके EPIC नंबर मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और इसलिए उनके फॉर्म-8 आवेदनों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि फॉर्म-6 केवल पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए होता है। चूंकि वे पहले से मतदाता थे, इसलिए उसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर पता बदलने के लिए उन्हें फॉर्म-8 के तहत आवेदन करना था।
अदालत ने कहा कि ड्राफ्ट मतदाता सूची को मतदाताओं के नाम हटाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा, 'फॉर्म-6, 7 या 8 का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि उसके सॉफ्टवेयर सिस्टम ने फॉर्म-8 स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी। अदालत ने कहा, 'वह कभी नया मतदाता था ही नहीं। वह मौजूदा मतदाता था। आपके सिस्टम के लिए वह नया मतदाता बन गया।'
चुनाव आयोग ने पूछा- बिना सुनवाई मतदाता सूची से नाम क्यों हटाए?
पीठ ने चुनाव आयोग से उन प्रावधानों के बारे में भी सवाल किया, जिनके तहत बिना सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाने की शक्ति का दावा किया जा रहा है। न्यायाधीशों ने कहा, 'हमें कानून दिखाइए... ऐसा कौन सा प्रावधान है जो आपको बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार देता है? आपके अधिकारी असहाय थे और उन्होंने इसे सिस्टम पर डाल दिया। उन्होंने आदेश में दर्ज कर दिया कि सिस्टम ने आवेदन खारिज कर दिया। ये बेहद चिंताजनक है और हम सोच रहे हैं कि ऐसे कितने और लोग होंगे जो अदालत तक नहीं पहुंचे।'
पीठ ने कहा कि फॉर्म-8 मिलने के बाद संबंधित प्राधिकारी को विवेकपूर्वक विचार करना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या यह व्यक्ति वास्तव में नए पते पर स्थानांतरित हुआ है। अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से लाखों नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं। पीठ ने कहा, 'यहां केवल एक परिवार है। ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जहां बहुत बड़ी संख्या में लोग अपना निवास स्थान बदल चुके हों।'
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अदालत ने क्या कहा?
जस्टिस अमित एस. जामसांडेकर और जस्टिस वाल्मीकि मेनेजेस की खंडपीठ ने बुधवार को एक परिवार के छह सदस्यों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। परिवार के सदस्यों ने मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्यों ने अदालत को बताया कि वे उसी सांता क्रूज विधानसभा क्षेत्र में एक नए घर में रहने चले गए थे। इसके बाद बूथ लेवल ऑफिसर ने उन्हें पता बदलने के लिए फॉर्म-8 जमा करने को कहा था।
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याचिका में क्या कहा गया?
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, जब इन फॉर्मों को प्रोसेस किया गया तो तकनीकी त्रुटियां सामने आईं, क्योंकि उनके निर्वाचक फोटो पहचान पत्र का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला। ऐसे में ईआरओनेट सॉफ्टवेयर में उपलब्ध एकमात्र विकल्प 'रिजेक्ट' था। ईआरओनेट यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स नेटवर्क, चुनाव आयोग द्वारा विकसित एक वेब आधारित फॉर्म-प्रोसेसिंग और मतदाता सूची प्रबंधन प्रणाली है।
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सालगांवकर ने बताया कि सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी ने उन्हें सूचित किया कि उनके EPIC नंबर मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं और इसलिए उनके फॉर्म-8 आवेदनों पर कार्रवाई नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि फॉर्म-6 केवल पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए होता है। चूंकि वे पहले से मतदाता थे, इसलिए उसी विधानसभा क्षेत्र के भीतर पता बदलने के लिए उन्हें फॉर्म-8 के तहत आवेदन करना था।
अदालत ने कहा कि ड्राफ्ट मतदाता सूची को मतदाताओं के नाम हटाने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने कहा, 'फॉर्म-6, 7 या 8 का कोई अर्थ नहीं रह जाता। पीठ ने चुनाव आयोग से कहा कि उसके सॉफ्टवेयर सिस्टम ने फॉर्म-8 स्वीकार करने की अनुमति नहीं दी। अदालत ने कहा, 'वह कभी नया मतदाता था ही नहीं। वह मौजूदा मतदाता था। आपके सिस्टम के लिए वह नया मतदाता बन गया।'
चुनाव आयोग ने पूछा- बिना सुनवाई मतदाता सूची से नाम क्यों हटाए?
पीठ ने चुनाव आयोग से उन प्रावधानों के बारे में भी सवाल किया, जिनके तहत बिना सुनवाई के मतदाताओं के नाम हटाने की शक्ति का दावा किया जा रहा है। न्यायाधीशों ने कहा, 'हमें कानून दिखाइए... ऐसा कौन सा प्रावधान है जो आपको बिना सुनवाई के नाम हटाने का अधिकार देता है? आपके अधिकारी असहाय थे और उन्होंने इसे सिस्टम पर डाल दिया। उन्होंने आदेश में दर्ज कर दिया कि सिस्टम ने आवेदन खारिज कर दिया। ये बेहद चिंताजनक है और हम सोच रहे हैं कि ऐसे कितने और लोग होंगे जो अदालत तक नहीं पहुंचे।'
पीठ ने कहा कि फॉर्म-8 मिलने के बाद संबंधित प्राधिकारी को विवेकपूर्वक विचार करना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या यह व्यक्ति वास्तव में नए पते पर स्थानांतरित हुआ है। अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई से लाखों नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हट सकते हैं। पीठ ने कहा, 'यहां केवल एक परिवार है। ऐसी स्थिति की कल्पना कीजिए जहां बहुत बड़ी संख्या में लोग अपना निवास स्थान बदल चुके हों।'