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दिव्यांग ने शिक्षक बन सपनों को दी नई उड़ान
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sat, 03 Dec 2016 12:23 AM IST
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दिव्यांग शिक्षक रामेंद्र सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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बरुकी (बिजनौर)। यदि व्यक्ति में हौसला हो तो कोई भी मंजिल पाई जा सकती है। अपने हौसले के दम पर कुम्हेड़ा निवासी रामेंद्र सिंह ने दोनों पैर नहीं होने के बावजूद कड़ी मेहनत कर शिक्षक बना और आज दर्जनों गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान कर क्षेत्र के लिए मिशाल बना है।
गांव कुम्हेड़ा निवासी रामेंद्र सिंह जब दो साल के थे तभी उनके दोनों पैरों में पोलियो हो गया था जिससे उनके दोनों पैर घुटनों से नीचे चलने बंद हो गए। उन्हें बचपन से ही पढ़ने की ललक थी। गांव से कक्षा आठ की शिक्षा प्राप्त की और बाद में गांव से छह किलोमीटर दूर ग्राम शादीपुर के सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें सरकार से ट्राईसाइकिल मिली और रामेंद्र ने कक्षा 11 में किरतपुर में हिंदू इंटर कॉलेज में प्रवेश लिया।
रामेंद्र रोज दस किलोमीटर दूर ट्राईसाइकिल चलाकर किरतपुर पढ़ने जाता था। रामेंद्र ने बिजनौर के वर्धमान कॉलेज से स्नातक किया। स्नातक के बाद रामेंद्र ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर एकाउंटेंट नौकरी की। 2008 में वह गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र बन गया। 2014 में वह अध्यापक बना। रामेंद्र सिंह विद्यालय की छुट्टी के बाद दर्जन भर बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं। रामेंद्र के प्रयास से आज गांव में अधिकांश बच्चे विद्यालय जा रहे हैं। रामेन्द्र सिंह कहते हैं कि उनका उद्देश्य हर बच्चे को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का है।
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गांव कुम्हेड़ा निवासी रामेंद्र सिंह जब दो साल के थे तभी उनके दोनों पैरों में पोलियो हो गया था जिससे उनके दोनों पैर घुटनों से नीचे चलने बंद हो गए। उन्हें बचपन से ही पढ़ने की ललक थी। गांव से कक्षा आठ की शिक्षा प्राप्त की और बाद में गांव से छह किलोमीटर दूर ग्राम शादीपुर के सरस्वती विद्या मंदिर विद्यालय से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें सरकार से ट्राईसाइकिल मिली और रामेंद्र ने कक्षा 11 में किरतपुर में हिंदू इंटर कॉलेज में प्रवेश लिया।
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रामेंद्र रोज दस किलोमीटर दूर ट्राईसाइकिल चलाकर किरतपुर पढ़ने जाता था। रामेंद्र ने बिजनौर के वर्धमान कॉलेज से स्नातक किया। स्नातक के बाद रामेंद्र ने एक मल्टीनेशनल कंपनी में बतौर एकाउंटेंट नौकरी की। 2008 में वह गांव के प्राथमिक विद्यालय में शिक्षामित्र बन गया। 2014 में वह अध्यापक बना। रामेंद्र सिंह विद्यालय की छुट्टी के बाद दर्जन भर बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करते हैं। रामेंद्र के प्रयास से आज गांव में अधिकांश बच्चे विद्यालय जा रहे हैं। रामेन्द्र सिंह कहते हैं कि उनका उद्देश्य हर बच्चे को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का है।
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