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तकनीक से बदल सकती है तकदीर

Tue, 04 Jun 2019 12:21 AM IST
Deepak Sharma अमर उजाला ब्यूरो/बिजनौर
अमर उजाला ब्यूरो/बिजनौर Published by: Deepak Sharma Updated Tue, 04 Jun 2019 12:21 AM IST
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बिजनौर के ग्राम रामठेरा में बायो फ्लॉक विधि से मत्स्य पालन के प्लांट का शुभारंभ करते उपनिदेशक कृषि जेपी चौधरी। - फोटो : अमर उजाला
बिजनौर में बायो फ्लोक विधि से मत्स्य पालन का सोमवार से जिले में शुभारंभ हो गया। उपनिदेशक कृषि जेपी चौधरी ने फीता काटकर मत्स्य पालन केंद्र का शुभारंभ किया। उन्होंने बाकी किसानों से भी इस विधि से मत्स्य पालन का आह्वान किया। बायो फ्लॉक विधि से 150 गज जमीन में ही एक हेक्टेयर जमीन के तालाब के बराबर मत्स्य पालन किया जा सकता है।
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किसानों को फसलों के साथ-साथ मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, दुग्ध उत्पादन करके आमदनी दोगुनी करने को प्रेरित किया जा रहा है। धामपुर के गांव रामठेरा के किसान बिजेंद्र सिंह ने बायो फ्लॉक विधि से मत्स्य पालन शुरू किया है। इस विधि में 150 गज जमीन में ही एक हेक्टेयर के तालाब से भी अधिक मछली उत्पादन किया जा सकता है। सोमवार को कृषि विभाग ने गांव रामठेरा में ब्लॉक स्तरीय गोष्ठी कर आसपास के गांव वालों को भी बुलाया। किसानों को बायो फ्लॉक विधि से खेती करने के बारे में बताया गया। उपनिदेशक कृषि जेपी चौधरी व आत्मा परियोजना निदेशक योगेंद्रपाल सिंह योगी ने किसानों को बताया कि यह मत्स्य पालन की आधुनिक तकनीक है। इसमें बहुत कम लागत, कम जगह में अधिक उत्पादन किया जाता है। गोष्ठी के बाद मत्स्य पालन केंद्र का शुभारंभ किया गया। इस मौके पर भारी तादाद में किसान मौजूद रहे।
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ऐसे हो रहा मत्स्य पालन
किसान बिजेंद्र सिंह ने 150 गज जमीन में साढ़े चार फीट के चार टैंक बनवाए हैं। अभी दो टैंक और बनाए जा सकते हैं। कंप्रेशर मशीन से इन टैंक में ऑक्सीजन घोली जा रही है। अभी दो टैंक में ही 600 से 800 मछली प्रति टैंक छोड़ी गई है। क्षमता से अधिक पानी को निकालने के लिए टैंक से एक पाइप जोड़ा गया है। चार टैंक के सेट में करीब ढाई लाख रुपये का खर्च आया है।
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ऐसे होगा फायदा
एक हेक्टेयर के तालाब में एक बार में उंगली के आकार की दस हजार मछलियां छोड़ी जाती हैं। इन बच्चों को 600 ग्राम का होने में दस से 11 महीने का समय लगता है, जबकि एक टैंक में एक बार में मछली के 1200 बच्चे यानि चार टैंक में 4800 बच्चे छोड़े जा सकते हैं। चार महीने में ही ये बच्चे 600 ग्राम के हो जाते हैं। चार टैंक एक साल में 14 हजार से ज्यादा मछली विकसित होती हैं।

जैविक होती हैं मछली
बायो फ्लॉक विधि में टैंक में पानी को साफ करने के लिए किसी प्रकार का केमिकल नहीं डाला जाता है। इसमें होने वाली मछली पूर्णत: जैविक होती हैं। इनकी बाजार में अधिक कीमत मिलती है।

यह होता है बायो फ्लॉक विधि
बायो फ्लॉक विधि में मछली पालन में भी जैविक विधि अपनाई जाती है। तालाब के पानी में मछली मल करती हैं। इस मल के अधिक संख्या में एकत्रित होने से पानी में अमोनिया बढ़ जाता है। अमोनिया मछलियों के लिए जहर का काम करता है। इससे मछली मर जाती हैं। बायो फ्लॉक विधि में जार में बैक्टीरिया पैदा की जाती हैं। यह बैक्टीरिया मछली के 20 प्रतिशत मल को प्रोटीन में बदल देता है। मछली इस प्रोटीन को खा लेती हैं। बचा मल जार में नीचे जमा हो जाता है। इसे टोटी के जरिये निकाल दिया जाता है। मछलियों को कोई नुकसान नहीं होता है।


ऐसे ज्यादा विकसित होती हैं मछली
बायो फ्लॉक विधि में जार में हर चीज इंसानी कंट्रोल में होती है। तालाब में मछली का दाना ज्यादा गिरने या मल से अधिक केमिकल बनते हैं। इन्हें निकालने का साधन नहीं होता है। पानी में ऑक्सीजन घुलनी बंद हो जाती है। पानी में ऑक्सीजन घोलने के लिए तरह तरह के केमिकल डाले जाते हैं, जबकि जार में वेस्टेज को निकालने का पूरा साधन होता है। मछलियों को ज्यादा खुराक देने पर भी उन्हें नुकसान नहीं होता।
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