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बस तो चल गईं, नहीं आ रहे यात्री
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बस तो चल गईं, नहीं आ रहे यात्री
धामपुर। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भले ही एक जून से यात्रियों को सुविधा मुहैया कराने को रोडवेज की बसों का संचालन शुरू कर दिया गया है। पर यात्री नहीं आने से निगम को लाभ नहीं हो पा रहा है। जहां निगम को दो दिन के भीतर 14 लाख की धामपुर निगम को आय हो जानी चाहिए वहां केवल एक लाख पांच हजार की ही आय हो सकी है। जो चिंता का विषय बना है।
एआरएम एलके त्रिवेदी का कहना है कि धामपुर डिपो में करीब 56 बसों का संचालन होता है। पर यात्रि नहीं आने से एक जून को केवल 29 बसों को चलाया गया था। तो उस दिन शाम तक केवल 45 हजार रुपये की आय हुई। दो जून को 29 बसों के स्थान पर 15 बसों को चलाया गया। तो शाम तक केवल 65 हजार की आय हुई। तीन जून को 17 बसों का संचालन हुआ जिसकी आय का सही पता बुधवार देर रात लग पाएगा। निगम के सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक का कहना है कि जब निगम की यहां से सभी 56 बसों का संचालन हो रहा था तो प्रतिदिन सात लाख रुपये की इनकम हो रही थी। महामारी के चलते सवारियां घरों से ही नहीं निकल रही है। तो वह ऐसे में क्या करें। प्रयास कर रहे है कि जैसे ही सवारियां अधिक हो तो वह बसों की संख्या को बढ़ाने में देरी नहीं करते। ऐसे में न तो परिचालकों को काम करने में मजा आ रहा है और न ही निगम को लाभ हो रहा है। यहां पर बसों में फुंकने वाले तेल के पैसे भी लौटकर वापस नहीं आ रहे है। पता नहीं यह स्थिति कब तक रहेगी।
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धामपुर। उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से भले ही एक जून से यात्रियों को सुविधा मुहैया कराने को रोडवेज की बसों का संचालन शुरू कर दिया गया है। पर यात्री नहीं आने से निगम को लाभ नहीं हो पा रहा है। जहां निगम को दो दिन के भीतर 14 लाख की धामपुर निगम को आय हो जानी चाहिए वहां केवल एक लाख पांच हजार की ही आय हो सकी है। जो चिंता का विषय बना है।
एआरएम एलके त्रिवेदी का कहना है कि धामपुर डिपो में करीब 56 बसों का संचालन होता है। पर यात्रि नहीं आने से एक जून को केवल 29 बसों को चलाया गया था। तो उस दिन शाम तक केवल 45 हजार रुपये की आय हुई। दो जून को 29 बसों के स्थान पर 15 बसों को चलाया गया। तो शाम तक केवल 65 हजार की आय हुई। तीन जून को 17 बसों का संचालन हुआ जिसकी आय का सही पता बुधवार देर रात लग पाएगा। निगम के सहायक क्षेत्रीय प्रबंधक का कहना है कि जब निगम की यहां से सभी 56 बसों का संचालन हो रहा था तो प्रतिदिन सात लाख रुपये की इनकम हो रही थी। महामारी के चलते सवारियां घरों से ही नहीं निकल रही है। तो वह ऐसे में क्या करें। प्रयास कर रहे है कि जैसे ही सवारियां अधिक हो तो वह बसों की संख्या को बढ़ाने में देरी नहीं करते। ऐसे में न तो परिचालकों को काम करने में मजा आ रहा है और न ही निगम को लाभ हो रहा है। यहां पर बसों में फुंकने वाले तेल के पैसे भी लौटकर वापस नहीं आ रहे है। पता नहीं यह स्थिति कब तक रहेगी।
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