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सर्द रातों में याद आते हैं ‘रात के मसीहा’
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विपिन महर्षि।
- फोटो : BIJNOR
सर्द रातों में याद आते हैं ‘रात के मसीहा’
बिजनौर। विपिन चंद्र महर्षि को दिवंगत हुए 17 साल बीत गए, लेकिन उन्हें लोग आज भी जाड़ों की रात के मसीहा के रूप में याद करते हैं। धार्मिक प्रवृति के विपिन महर्षि जाड़ों की देर रात में घर से निकलते और राह में मिलने वाले गरीबों को कंबल बांटते जाते। उन्होंने कभी कोई प्रचार नहीं चाहा और न ही कभी किसी से कुछ लिया।
विपिन महर्षि का जन्म 16 अगस्त 1929 में ग्राम खारी के जमींदार परिवार में हुआ था। वह हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी रहे। पारिवारिक जिम्मेदारी के कारण खेती करते रहे। 1967 में क्रांति कुमार व कुंवर सत्यवीर की आपसी प्रतिस्पर्धा में क्रांति कुमार के कहने पर ये निर्दलीय विधायक का चुनाव लड़े । 25000 पोलिंग में से 5500 वोट ले कर आप तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन उसके बाद राजनीत में कभी नहीं गए। साधु संतों में बाल्यकाल से रुचि थी। आसपास आने वाले किसी भी संत की महीनों अपने संसाधनों से सेवा में नि:स्वार्थ लगे रहते थे। 30 नवंबर 2003 में ब्रेन कैंसर के कारण इनका निधन हो गया। विपिन महर्षि की बैठ-उठ बिजनौर के स्कूल मार्ग स्थित गांधी आश्रम पर थी। यहां के स्टाफ से पारिवारिक संबंध था। जाड़े आते ही गांधी आश्रम वाले इंतजार में रहते कि विपिन महर्षि कंबल का आर्डर दें। पुराने लोग बताते रहे हैं कि वे जाड़ों में कई हजार रुपये के कंबल गांधी आश्रम से खरीदकर लोगों में बांट देते थे। आज किसी को एक केला देकर लोग अखबार में अपना फोटो छपवाने का प्रयास करते हैं, किंतु महर्षि जी ने कभी नहीं चाहा। इसके अलावा भी जिसकी जो मदद बनी, कर दी। उनके मित्र अनिल सोती बताते हैं कि विपिन महर्षि प्रत्येक साल कंबल बांटते थे। गांधी आश्रम में राधे श्याम शर्मा के पास खूब बैठ उठ थी। वहीं से जाड़ों में कंबल लेते और रात में निकल जाते।
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बिजनौर। विपिन चंद्र महर्षि को दिवंगत हुए 17 साल बीत गए, लेकिन उन्हें लोग आज भी जाड़ों की रात के मसीहा के रूप में याद करते हैं। धार्मिक प्रवृति के विपिन महर्षि जाड़ों की देर रात में घर से निकलते और राह में मिलने वाले गरीबों को कंबल बांटते जाते। उन्होंने कभी कोई प्रचार नहीं चाहा और न ही कभी किसी से कुछ लिया।
विपिन महर्षि का जन्म 16 अगस्त 1929 में ग्राम खारी के जमींदार परिवार में हुआ था। वह हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी रहे। पारिवारिक जिम्मेदारी के कारण खेती करते रहे। 1967 में क्रांति कुमार व कुंवर सत्यवीर की आपसी प्रतिस्पर्धा में क्रांति कुमार के कहने पर ये निर्दलीय विधायक का चुनाव लड़े । 25000 पोलिंग में से 5500 वोट ले कर आप तीसरे स्थान पर रहे, लेकिन उसके बाद राजनीत में कभी नहीं गए। साधु संतों में बाल्यकाल से रुचि थी। आसपास आने वाले किसी भी संत की महीनों अपने संसाधनों से सेवा में नि:स्वार्थ लगे रहते थे। 30 नवंबर 2003 में ब्रेन कैंसर के कारण इनका निधन हो गया। विपिन महर्षि की बैठ-उठ बिजनौर के स्कूल मार्ग स्थित गांधी आश्रम पर थी। यहां के स्टाफ से पारिवारिक संबंध था। जाड़े आते ही गांधी आश्रम वाले इंतजार में रहते कि विपिन महर्षि कंबल का आर्डर दें। पुराने लोग बताते रहे हैं कि वे जाड़ों में कई हजार रुपये के कंबल गांधी आश्रम से खरीदकर लोगों में बांट देते थे। आज किसी को एक केला देकर लोग अखबार में अपना फोटो छपवाने का प्रयास करते हैं, किंतु महर्षि जी ने कभी नहीं चाहा। इसके अलावा भी जिसकी जो मदद बनी, कर दी। उनके मित्र अनिल सोती बताते हैं कि विपिन महर्षि प्रत्येक साल कंबल बांटते थे। गांधी आश्रम में राधे श्याम शर्मा के पास खूब बैठ उठ थी। वहीं से जाड़ों में कंबल लेते और रात में निकल जाते।
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