{"_id":"48-78027","slug":"Bijnor-78027-48","type":"story","status":"publish","title_hn":"देर रात पहुंचे डीएफओ को ग्रामीणों ने घेरा ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
देर रात पहुंचे डीएफओ को ग्रामीणों ने घेरा
Bijnor
Updated Wed, 15 Oct 2014 05:32 AM IST
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बढ़ापुर। बढ़ापुर के मोजा बहेड़ी में वन गुर्जर के बच्चे को आदमखोर बाघ द्वारा हमला कर मारने के बाद देर रात घटनास्थल पर पहुंचे डीएफओ को ग्रामीणों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि यहां आदमखोर बाघ के हमले की निरंतर घटनाएं हो रही हैं, लेकिन वन विभाग कुछ नहीं कर रहा है।
शनिवार की सायं बाघ द्वारा डेरे पर खेलते समय वन गुर्जर गुलाम रसूल के दस वर्षीय पुत्र मो. रफी को आदमखोर बाघ ने मार डाला था। देर रात बढ़ापुर रेंज के वन क्षेत्राधिकारी इरफान अली व साहूवाला रेंज के बीबीएल शर्मा मौके पर पहुंचे और पीड़ित परिवार से बालक के शव का अंत: परीक्षण कराने की अपील की, लेकिन ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों को मौके पर बुलाने की मांग की। इस पर देर रात डीएफओ नजीबाबाद प्रवीण कुमार राघव घटनास्थल पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। वहां मौजूद ग्रामीणों ने बाघ द्वारा एक के बाद एक व्यक्ति को निवाला बनाने की घटनाओं व इस ओर वन विभाग की नाकामी पर गुस्से का इजहार किया। डीएफओ ने इस मसले पर उच्चाधिकारियों से बात कर समस्या दूर करने का आश्वासन दिया।
वहीं पीड़ित परिवार ने बालक का पीएम कराने से स्पष्ट इंकार कर दिया। अधिकारियों ने बच्चे के परिजनों को समझाया कि शासन से मुआवजा पाने के लिए पोस्टमार्टम जरूर है। परिजनों व ग्रामीणों का कहना था कि बालक को बाघ ने मारा है। सब जानते हैं, फिर वह बच्चे के शव की चीरफाड़ नहीं होने देंगे। परिजन किसी भी हाल में तैयार नहीं हुए और बालक के शव को ग्राम रामजीवाला के कब्रिस्तान में दफना दिया।
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...और जब बाघ पर टूट पड़ीं भैंसे
बढ़ापुर। डेरे पर खेलते समय बालक को बाघ द्वारा मारने की घटना में जहां बहादुर पिता ने बालक को बाघ के जबड़े से निकाला, वहीं वन गुर्जर की भैंसों ने भी बाघ को वहां से भागने के लिए विवश कर दिया। बाघ का शिकार हुए बालक की मां आसमा बी ने बताया कि जब बाघ ने पुत्र पर हमला किया तो वह डेरे के भीतर चूल्हे पर खाना बना रही थी। डेरे के बाहर चारपाई पर तीन वर्ष व आठ माह के दो बच्चे लेटे हुए थे और मो. रफी पास में ही खेल रहा था। जैसे ही बाघ ने रफी का सिर मुंह में भरा तो पास में काम कर रहे पिता गुलाम रसूल डंडा लेकर बाघ से भिड़ गया। आसमा ने बताया कि बाघ के घटना को अंजाम देने पर डेरे के आसपास जमा उसकी भैंसें भागकर आईं और बाघ पर टूट पड़ीं। वन गुर्जर गुलाम रसूल के साहस व उसकी भैंसाें की बहादुरी के रहते ही बाघ को शिकार छोड़कर वहां से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। ग्रामीणों का मानना है कि वन गुर्जर की भैंसों ने भी बाघ को वहां से भगाने में अहम भूमिका निभाई है। क्योंकि बाघ शिकार पर था और रुकावट बनने पर वह बालक के साथ गुलाम रसूल पर भी हमला कर सकता था।
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शनिवार की सायं बाघ द्वारा डेरे पर खेलते समय वन गुर्जर गुलाम रसूल के दस वर्षीय पुत्र मो. रफी को आदमखोर बाघ ने मार डाला था। देर रात बढ़ापुर रेंज के वन क्षेत्राधिकारी इरफान अली व साहूवाला रेंज के बीबीएल शर्मा मौके पर पहुंचे और पीड़ित परिवार से बालक के शव का अंत: परीक्षण कराने की अपील की, लेकिन ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों को मौके पर बुलाने की मांग की। इस पर देर रात डीएफओ नजीबाबाद प्रवीण कुमार राघव घटनास्थल पर पहुंचे और घटना की जानकारी ली। वहां मौजूद ग्रामीणों ने बाघ द्वारा एक के बाद एक व्यक्ति को निवाला बनाने की घटनाओं व इस ओर वन विभाग की नाकामी पर गुस्से का इजहार किया। डीएफओ ने इस मसले पर उच्चाधिकारियों से बात कर समस्या दूर करने का आश्वासन दिया।
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वहीं पीड़ित परिवार ने बालक का पीएम कराने से स्पष्ट इंकार कर दिया। अधिकारियों ने बच्चे के परिजनों को समझाया कि शासन से मुआवजा पाने के लिए पोस्टमार्टम जरूर है। परिजनों व ग्रामीणों का कहना था कि बालक को बाघ ने मारा है। सब जानते हैं, फिर वह बच्चे के शव की चीरफाड़ नहीं होने देंगे। परिजन किसी भी हाल में तैयार नहीं हुए और बालक के शव को ग्राम रामजीवाला के कब्रिस्तान में दफना दिया।
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...और जब बाघ पर टूट पड़ीं भैंसे
बढ़ापुर। डेरे पर खेलते समय बालक को बाघ द्वारा मारने की घटना में जहां बहादुर पिता ने बालक को बाघ के जबड़े से निकाला, वहीं वन गुर्जर की भैंसों ने भी बाघ को वहां से भागने के लिए विवश कर दिया। बाघ का शिकार हुए बालक की मां आसमा बी ने बताया कि जब बाघ ने पुत्र पर हमला किया तो वह डेरे के भीतर चूल्हे पर खाना बना रही थी। डेरे के बाहर चारपाई पर तीन वर्ष व आठ माह के दो बच्चे लेटे हुए थे और मो. रफी पास में ही खेल रहा था। जैसे ही बाघ ने रफी का सिर मुंह में भरा तो पास में काम कर रहे पिता गुलाम रसूल डंडा लेकर बाघ से भिड़ गया। आसमा ने बताया कि बाघ के घटना को अंजाम देने पर डेरे के आसपास जमा उसकी भैंसें भागकर आईं और बाघ पर टूट पड़ीं। वन गुर्जर गुलाम रसूल के साहस व उसकी भैंसाें की बहादुरी के रहते ही बाघ को शिकार छोड़कर वहां से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। ग्रामीणों का मानना है कि वन गुर्जर की भैंसों ने भी बाघ को वहां से भगाने में अहम भूमिका निभाई है। क्योंकि बाघ शिकार पर था और रुकावट बनने पर वह बालक के साथ गुलाम रसूल पर भी हमला कर सकता था।