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नेकियां कमाने का महीना है मुकद्दस रमजान :उलेमा
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नेकियां कमाने का महीना है मुकद्दस रमजान : उलमा
नींदडू़। आज से शुरू हो रहा मुकद्दस रमजान फर्ज रोजे रखने, अच्छे कार्य कर नेकियां कमाने और बुरे कामों से बचते हुए अपने गुनाहों की माफी मांगने का महीना है। इस महीने में हर वयस्क मुसलमान पर रोजा रखना फर्ज अर्थात् लाजमी है। रोजा नहीं रखने वाला शख्स गुनहगार है।
रमजान के बारे में मुफ्ती मोहम्मद अशरफ मजाहिरी का कहना है कि इस्लाम में रमजान महीने के रोजे फर्ज किए गए हैं। इनके रखने और इशा की नमाज के साथ तरावीह की विशेष नमाज पढ़ने वाले को सवाब (पुण्य) मिलता है। रमजान में एक नेक कार्य का सवाब 70 गुना मिलता है। रोजे में कुछ खाने पीने, बीवी से संबंध बनाने, मुंह भर कर उल्टी होने, महिला को मासिक धर्म या बच्चा पैदा होने, सूरज डूबने या सुबह की नमाज का समय होने तक खाते पीते रहने आदि से रोजा टूट जाता है। ऐसी हालत में रोजा दुबारा रखना पड़ेगा।
मोलवी अबरार अहमद कासमी का कहना है कि कुछ लोग रमजान के महीने में रोजा रखने के बाद भी एक दूसरे की बुराई और चुग़ली करने के अलावा बेकार की बातों में लगे रहते हैं। इनसे बचना चाहिए तथा हर हालत में रोजे का अहतराम (आदर) करना चाहिए। मोलाना गयासुद्दीन मंसूरी ने कहा कि रमजान में तरावीह पढ़ते वक्त कुछ लोग इमाम के साथ नमाज शुरू नहीं कर पीछे पंक्ति में खड़े रहते हैं। ऐसा करने से तरावीह में उनका कुरान पूरा नहीं होता। कुछ लोग रोजा नहीं रखते और खुले आम बाजारों में खाते फिरते हैं। रोजा रखना फर्ज है, उन्हें रोजा रखना चाहिए। अगर किसी कारणवश रोजा नहीं रखा है, तो रोजे का अहतराम कर घर में खाना पीना चाहिए।
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मौलाना शमशीर अहमद ने कहा कि हमारी आंख, नाक, कान, जुबान, हाथ, पैर और बदन के तमाम अंगों का भी रोजा होता है। रोजेदार को अपने शरीर के सभी अंगों की हिफ़ाजत करते हुए रोजा पूरा करना चाहिए। अपने दिल, दिमाग़ और शरीर को गुनाहों से बचाना चाहिए। रमजान में खूब कुरान पढ़ने और जिक्र करना चाहिए तथा दूसरे लोगों को किसी किस्म की तकलीफ नहीं देना चाहिए। कारी राशिद हमीदी का कहना है कि रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहले 10 दिन रहमत के, बीच के 10 दिन गुनाहों से माफी के और अंतिम नौ या 10 दिन जहन्नुम की आग से सुरक्षा के लिए हैं।
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नींदडू़। आज से शुरू हो रहा मुकद्दस रमजान फर्ज रोजे रखने, अच्छे कार्य कर नेकियां कमाने और बुरे कामों से बचते हुए अपने गुनाहों की माफी मांगने का महीना है। इस महीने में हर वयस्क मुसलमान पर रोजा रखना फर्ज अर्थात् लाजमी है। रोजा नहीं रखने वाला शख्स गुनहगार है।
रमजान के बारे में मुफ्ती मोहम्मद अशरफ मजाहिरी का कहना है कि इस्लाम में रमजान महीने के रोजे फर्ज किए गए हैं। इनके रखने और इशा की नमाज के साथ तरावीह की विशेष नमाज पढ़ने वाले को सवाब (पुण्य) मिलता है। रमजान में एक नेक कार्य का सवाब 70 गुना मिलता है। रोजे में कुछ खाने पीने, बीवी से संबंध बनाने, मुंह भर कर उल्टी होने, महिला को मासिक धर्म या बच्चा पैदा होने, सूरज डूबने या सुबह की नमाज का समय होने तक खाते पीते रहने आदि से रोजा टूट जाता है। ऐसी हालत में रोजा दुबारा रखना पड़ेगा।
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मोलवी अबरार अहमद कासमी का कहना है कि कुछ लोग रमजान के महीने में रोजा रखने के बाद भी एक दूसरे की बुराई और चुग़ली करने के अलावा बेकार की बातों में लगे रहते हैं। इनसे बचना चाहिए तथा हर हालत में रोजे का अहतराम (आदर) करना चाहिए। मोलाना गयासुद्दीन मंसूरी ने कहा कि रमजान में तरावीह पढ़ते वक्त कुछ लोग इमाम के साथ नमाज शुरू नहीं कर पीछे पंक्ति में खड़े रहते हैं। ऐसा करने से तरावीह में उनका कुरान पूरा नहीं होता। कुछ लोग रोजा नहीं रखते और खुले आम बाजारों में खाते फिरते हैं। रोजा रखना फर्ज है, उन्हें रोजा रखना चाहिए। अगर किसी कारणवश रोजा नहीं रखा है, तो रोजे का अहतराम कर घर में खाना पीना चाहिए।
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मौलाना शमशीर अहमद ने कहा कि हमारी आंख, नाक, कान, जुबान, हाथ, पैर और बदन के तमाम अंगों का भी रोजा होता है। रोजेदार को अपने शरीर के सभी अंगों की हिफ़ाजत करते हुए रोजा पूरा करना चाहिए। अपने दिल, दिमाग़ और शरीर को गुनाहों से बचाना चाहिए। रमजान में खूब कुरान पढ़ने और जिक्र करना चाहिए तथा दूसरे लोगों को किसी किस्म की तकलीफ नहीं देना चाहिए। कारी राशिद हमीदी का कहना है कि रमजान को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहले 10 दिन रहमत के, बीच के 10 दिन गुनाहों से माफी के और अंतिम नौ या 10 दिन जहन्नुम की आग से सुरक्षा के लिए हैं।