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पेक्षा से रेशम उत्पादन परियोजना तोड़ रही दम
Updated Fri, 08 Dec 2017 12:03 AM IST
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नजीबाबाद। प्रदेश की महत्वाकांक्षी रेशम उद्योग योजना विभाग की लचर व्यवस्थाओं से दम तोड़ रही है। शासन ने सहारनपुर और बिजनौर को रेशम उत्पादन का मुख्य केंद्र केंद्र बनाया था। एक दशक पूर्व शुरू हुई रेशम उद्योग योजना विभाग की उपेक्षा से कागजी रूप लेती जा रही है।
रेशम विकास विभाग ने जनपद बिजनौर में वर्ष 2005-06 में जनपद बिजनौर को सहारनपुर के बाद रेशम उत्पादन के लिए प्रमुख केंद्र बनाया था। जनपद बिजनौर में 86 एकड़ फार्म रेशम उद्योग के लिए विकसित किया गया। गांव सुंगरपुर बेहड़ा, जट्टीवाला, बरमपुर और बुड़गरा में रेशम कीट पालन केंद्र स्थापित किए गए। बंगलूरू, देहरादून, मेरठ और बहराइच से रोग रहित कीटांड (डीएलएफएस) लाकर 10 दिन रेशम कीट पालन केंद्रों पर चाकी (रेशम कीट) विकसित करने के बाद 20 दिन तक किसान रेशम के कीट पालकर रेशम उत्पादन करते आए हैं। जनपद बिजनौर की तहसील नजीबाबाद के सुंगरपुर बेहड़ा में 6.5 एकड़, जट्टीवाला में तीन एकड़, बुड़गरा और बरमपुर में 36-36 एकड़ भूमि में राजकीय चाकी कीट पालन केंद्र स्थापित करने के साथ शहतूत फार्म विकसित किए गए हैं। रेशम कीट पालन व्यवस्था के बिजनौर प्रभारी धर्मेंद्र कुमार और सहायक संदीप कुमार मुख्यालय पर नहीं रहते। सरकार की महत्वाकांक्षी रेशम उद्योग परियोजना केंद्रों पर तैनात प्राइवेट मजदूरों के हाथ में चल रही है। शहतूत फार्म भी बदहाल है। मस्टररोल के आधार पर मजदूरों से शहतूत के पेड़ों की छंटाई का काम कागजी बन गया है।
फरवरी में मुख्य रूप से रेशम कीट (डीएफएलएस) रेशम उत्पादन के लिए चाकी कीट केंद्रों पर पहुंचता है। मार्च के अंत तक रेशम उत्पादन का काम होता है। शहतूत की पत्ती रेशम के कीट और ककून का मुख्य भोजन है। नवंबर के अंत तक शहतूत फार्मों की छंटाई का काम पूरा कर लिया जाता है, लेकिन अभी तक शहतूत के वृक्षों की नाममात्र छंटाई इस बात का प्रमाण है कि रेशम कीट पालन को औपचारिक और कागजी रखने की तैयारी है।
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जानकारी देने से बचते रहे प्रभारी
बिजनौर प्रभारी धर्मेंद्र कुमार के पास गत वित्तीय वर्ष में रेशम का कितना उत्पादन हुआ, चाकी कीट केंद्रों से कितने डीएफएलएस मंगाकर विकसित किए गए, कितने किसान रेशम कीट पालन से जुड़े हैं, इसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। कई बार संपर्क करने के बाद भी बिजनौर प्रभारी ने फील्ड में होने का तर्क देकर जानकारी देने में आनाकानी की।
बदहाल हैं चाकी कीट केंद्र
रेशम उत्पादन के लिए बनाए गए चाकी कीट केंद्रों का संचालन मजदूरों के हाथों में है। लाखों के बजट की रेशम कीट पालन परियोजना के लिए केंद्रों पर उपलब्ध रेशम कीट पालन की ट्रे व अन्य सामग्री धूल फांक रही हैं। आए दिन केंद्रों पर ताले लटके रहते हैं। प्राइवेट मजदूरों को एक ही जवाब रटाया गया है कि साहब कभी भी आ जाते हैं। कितने मजदूर शहतूत के वृक्षों की छंटाई करते हैं इसकी जानकारी पर मजदूर चुप्पी साध जाते हैं।
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रेशम विकास विभाग ने जनपद बिजनौर में वर्ष 2005-06 में जनपद बिजनौर को सहारनपुर के बाद रेशम उत्पादन के लिए प्रमुख केंद्र बनाया था। जनपद बिजनौर में 86 एकड़ फार्म रेशम उद्योग के लिए विकसित किया गया। गांव सुंगरपुर बेहड़ा, जट्टीवाला, बरमपुर और बुड़गरा में रेशम कीट पालन केंद्र स्थापित किए गए। बंगलूरू, देहरादून, मेरठ और बहराइच से रोग रहित कीटांड (डीएलएफएस) लाकर 10 दिन रेशम कीट पालन केंद्रों पर चाकी (रेशम कीट) विकसित करने के बाद 20 दिन तक किसान रेशम के कीट पालकर रेशम उत्पादन करते आए हैं। जनपद बिजनौर की तहसील नजीबाबाद के सुंगरपुर बेहड़ा में 6.5 एकड़, जट्टीवाला में तीन एकड़, बुड़गरा और बरमपुर में 36-36 एकड़ भूमि में राजकीय चाकी कीट पालन केंद्र स्थापित करने के साथ शहतूत फार्म विकसित किए गए हैं। रेशम कीट पालन व्यवस्था के बिजनौर प्रभारी धर्मेंद्र कुमार और सहायक संदीप कुमार मुख्यालय पर नहीं रहते। सरकार की महत्वाकांक्षी रेशम उद्योग परियोजना केंद्रों पर तैनात प्राइवेट मजदूरों के हाथ में चल रही है। शहतूत फार्म भी बदहाल है। मस्टररोल के आधार पर मजदूरों से शहतूत के पेड़ों की छंटाई का काम कागजी बन गया है।
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फरवरी में मुख्य रूप से रेशम कीट (डीएफएलएस) रेशम उत्पादन के लिए चाकी कीट केंद्रों पर पहुंचता है। मार्च के अंत तक रेशम उत्पादन का काम होता है। शहतूत की पत्ती रेशम के कीट और ककून का मुख्य भोजन है। नवंबर के अंत तक शहतूत फार्मों की छंटाई का काम पूरा कर लिया जाता है, लेकिन अभी तक शहतूत के वृक्षों की नाममात्र छंटाई इस बात का प्रमाण है कि रेशम कीट पालन को औपचारिक और कागजी रखने की तैयारी है।
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जानकारी देने से बचते रहे प्रभारी
बिजनौर प्रभारी धर्मेंद्र कुमार के पास गत वित्तीय वर्ष में रेशम का कितना उत्पादन हुआ, चाकी कीट केंद्रों से कितने डीएफएलएस मंगाकर विकसित किए गए, कितने किसान रेशम कीट पालन से जुड़े हैं, इसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। कई बार संपर्क करने के बाद भी बिजनौर प्रभारी ने फील्ड में होने का तर्क देकर जानकारी देने में आनाकानी की।
बदहाल हैं चाकी कीट केंद्र
रेशम उत्पादन के लिए बनाए गए चाकी कीट केंद्रों का संचालन मजदूरों के हाथों में है। लाखों के बजट की रेशम कीट पालन परियोजना के लिए केंद्रों पर उपलब्ध रेशम कीट पालन की ट्रे व अन्य सामग्री धूल फांक रही हैं। आए दिन केंद्रों पर ताले लटके रहते हैं। प्राइवेट मजदूरों को एक ही जवाब रटाया गया है कि साहब कभी भी आ जाते हैं। कितने मजदूर शहतूत के वृक्षों की छंटाई करते हैं इसकी जानकारी पर मजदूर चुप्पी साध जाते हैं।