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बाबा झारखण्ड मंदिर का प्राकृतिक शिवलिंग पूरी करता है भक्तों की मुराद
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बाबा झारखंड मंदिर में पूरी होती हैं मनोकामनाएं
चांदपुर। बाबा झारखंड शिव मंदिर का प्राकृतिक शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की मिन्नत पूरी होती हैं। वर्ष में दो बार फाल्गुन और श्रावण मास में पड़ने वाली शिवरात्रि पर श्रद्धालु हरिद्वार से कांवड़ में जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग पर स्थित बाबा झारखंड शिव मंदिर के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि करीब 500 साल पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। ग्वाला गांव के लोगों के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर एक स्थान पर रुक जाती थी और उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी। कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया।
ग्रामीणों ने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां काफी गहराई पर पत्थर का शिवलिंग दिखाई दिया। उसके बाद उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। आज मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। प्रत्येक सोमवार को मंदिर पर मेला जैसा दृश्य रहता है। मंदिर पर आने वाले श्रद्धालुओं की मिन्नत पूरी होती हैं। मंदिर में करीब 32 बीघा झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर, श्री हनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शिव परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर निर्माणाधीन, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं। मान्यता है कि मोनी बाबा भी शिव भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।
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चांदपुर। बाबा झारखंड शिव मंदिर का प्राकृतिक शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा अर्चना करने वाले श्रद्धालुओं की मिन्नत पूरी होती हैं। वर्ष में दो बार फाल्गुन और श्रावण मास में पड़ने वाली शिवरात्रि पर श्रद्धालु हरिद्वार से कांवड़ में जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
चांदपुर से करीब दो किलोमीटर दूर स्याऊ-छाछरी मार्ग पर स्थित बाबा झारखंड शिव मंदिर के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि करीब 500 साल पहले यहां घना जंगल हुआ करता था। ग्वाला गांव के लोगों के पशु चराने यहां आता था। पशुओं में एक गाय जंगल के बीच स्थित ऊंचे टीले पर जाकर एक स्थान पर रुक जाती थी और उसके थन से स्वयं ही दूध निकलने लगता था। थोड़ी देर बाद गाय वहां से चली जाती थी। कई दिनों तक गाय का दूध निकलता देख ग्वाले ने गाय मालिक को बताया।
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ग्रामीणों ने उस स्थान पर खुदाई की तो वहां काफी गहराई पर पत्थर का शिवलिंग दिखाई दिया। उसके बाद उस स्थान पर मंदिर का निर्माण कराया गया। आज मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ रहती है। प्रत्येक सोमवार को मंदिर पर मेला जैसा दृश्य रहता है। मंदिर पर आने वाले श्रद्धालुओं की मिन्नत पूरी होती हैं। मंदिर में करीब 32 बीघा झील के बीच में शेषनाग पर विराजमान भगवान विष्णु लक्ष्मी मंदिर, श्री हनुमान मंदिर, मां दुर्गा मंदिर, सरभंग बाबा की समाधि, शिव परिवार मंदिर, मोनी बाबा की समाधि, यज्ञ शाला, शनि देवता मंदिर निर्माणाधीन, गायत्री माता मंदिर, विशाल पीपल देवता वृक्ष, वट देवता वृक्ष आदि मौजूद हैं। मान्यता है कि मोनी बाबा भी शिव भक्तों की मुराद पूरी करते हैं।
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