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Bhadohi News: खंडहर हो रहे हैं अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के प्रतीक
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ज्ञानपुर। जिले में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का प्रतीक पाली गोदाम झाड़-झखाड़ की ओट में गुम हो रहा है।मखमली कालीनों की इस नगरी में 1857 की पहली क्रांति में अंग्रेजी सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका गया था। जिसमें जिले के वीर शहीद झूरी सिंह और उनके भाई संग्राम सिंह ने अंग्रेजी सत्ता के चाटुकारों को चुनौती दी थी। जिन प्रतीकों को दिखाकर नई पीढ़ी के बच्चों को शहीदों के बलिदान की दास्तां सुनाई जाती है। वह पाली नील गोदाम आज खंडहर अवस्था में हैै।
ज्ञानपुर मुख्यालय से लगभग 12 किमी दूर पाली नील गोदाम के खंडहर अंग्रेजों बर्बरता की कहानी बयां करता है और यह भी बताता है कि किस तरह हमारे वीर शहीदों ने ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। ब्रिटिश शासन काल में पाली स्थित नील गोदाम बिहार के बाद दूसरा सबसे बड़ा गोदाम था। जहां अंग्रेज नील की खेती करा कर उसे यूरोप के देशों में बेचते थे। नील बनाने के लिए चार टैंकर और एक विशाल कुएं के साथ चिमनी के भग्नावशेष आज भी हैं। भिडिउरा निवासी प्रमोद दुबे ने बताया कि विशाल कुएं के नीचे बना गोदाम झाड़-झंखाड़ से ढक गया है। इस कारखाने में अंग्रेज स्थानीय किसानाें से जबरन नील की खेती करवाते और उनका शोषण करते थे।
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...मोर साहब मार गए पाली के गोदमियां
ज्ञानपुर। एक क्यारी साग-पात, एक क्यारी धनिया, मोर साहब मार गए पाली के गोदमियां...। भिड़िउरा पाली निवासी दीनानाथ दुबे बताते हैं कि यह गीत आज भी गांवों में गाए जाते हैं। बताया कि मोर साहब पाली गोदाम पर अंग्रेजों के मुनीम के रूप में काम करते थे। यहां एक तरफ किसानों की खेतों पर जबरन कब्जा किया जा रहा था तो दूसरी तरफ उन्हें हंटर के दम पर नील गोदाम में खेती कराई जा रही थी। 1857 की क्रांति के दौरान पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध के स्वर उठ रहे थे। उसी दौरान जिले में भी गोरों के खिलाफ विरोध के स्वर उठे। जिले के बड़े जमींदार शहीद झूरी सिंह के भाई संग्राम सिंह ने किसानों को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। जिससे नाराज अंग्रेजों ने संग्राम सिंह सहित कुछ किसानों को पंचायत के लिए बुलाया और धोखे से जान से मार दिया। जिसके बाद संग्राम सिंह की पत्नी ने शपथ लिया कि जब तक मोर साहब का सिर कटा सर नहीं देखेंगी, तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगी। अपनी भाभी के संकल्प को पूरा करने के लिए शहीद झूरी सिंह ने मोर साहब का सर कलम किया और अंग्रेजों को पाली गोदाम से खदेड़ दिया।
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ज्ञानपुर। गांव निवासी बाबा पाठक, संदीप मौर्या और नरेश कुमार यादव बताते हैं कि इन ऐतिहासिक स्थलों को सहेजे जाने की आवश्यकता है। इन्हीं खंडहरों को दिखाकर हम अपने बच्चों को बलिदानियों के शौर्य से परिचित कराते हैं। नरेश यादव बताते हैं कि गांव के नुक्कड़ पर ही हमारी दुकान है। वहीं गोदाम के गेट का पिलर है। जिसे कई बार ग्राम प्रधान की ओर से हटवाने का प्रयास किया गया, लेकिन मैंने मना कर दिया। संदीप मौर्या बताते हैं कि उन्होंने अपने दादा और पिता जी से काफी सुना है। यह नील गोदाम अंग्रेजों की बर्बरता का प्रतीक है, लेकिन यह वह निशान है। जिससे हम अपने बलिदानियों के बारे में अच्छे से जान सकते हैं। बाबा पाठक कहते हैं कि यह हमारे लिए धरोहर है। देखरेख के अभाव में खंडहर होता जा रहा है। गांव के पुरनिए आज भी नील के पेड़ों को दिखाते हैं।
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ज्ञानपुर मुख्यालय से लगभग 12 किमी दूर पाली नील गोदाम के खंडहर अंग्रेजों बर्बरता की कहानी बयां करता है और यह भी बताता है कि किस तरह हमारे वीर शहीदों ने ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। ब्रिटिश शासन काल में पाली स्थित नील गोदाम बिहार के बाद दूसरा सबसे बड़ा गोदाम था। जहां अंग्रेज नील की खेती करा कर उसे यूरोप के देशों में बेचते थे। नील बनाने के लिए चार टैंकर और एक विशाल कुएं के साथ चिमनी के भग्नावशेष आज भी हैं। भिडिउरा निवासी प्रमोद दुबे ने बताया कि विशाल कुएं के नीचे बना गोदाम झाड़-झंखाड़ से ढक गया है। इस कारखाने में अंग्रेज स्थानीय किसानाें से जबरन नील की खेती करवाते और उनका शोषण करते थे।
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...मोर साहब मार गए पाली के गोदमियां
ज्ञानपुर। एक क्यारी साग-पात, एक क्यारी धनिया, मोर साहब मार गए पाली के गोदमियां...। भिड़िउरा पाली निवासी दीनानाथ दुबे बताते हैं कि यह गीत आज भी गांवों में गाए जाते हैं। बताया कि मोर साहब पाली गोदाम पर अंग्रेजों के मुनीम के रूप में काम करते थे। यहां एक तरफ किसानों की खेतों पर जबरन कब्जा किया जा रहा था तो दूसरी तरफ उन्हें हंटर के दम पर नील गोदाम में खेती कराई जा रही थी। 1857 की क्रांति के दौरान पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विरोध के स्वर उठ रहे थे। उसी दौरान जिले में भी गोरों के खिलाफ विरोध के स्वर उठे। जिले के बड़े जमींदार शहीद झूरी सिंह के भाई संग्राम सिंह ने किसानों को लेकर अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। जिससे नाराज अंग्रेजों ने संग्राम सिंह सहित कुछ किसानों को पंचायत के लिए बुलाया और धोखे से जान से मार दिया। जिसके बाद संग्राम सिंह की पत्नी ने शपथ लिया कि जब तक मोर साहब का सिर कटा सर नहीं देखेंगी, तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगी। अपनी भाभी के संकल्प को पूरा करने के लिए शहीद झूरी सिंह ने मोर साहब का सर कलम किया और अंग्रेजों को पाली गोदाम से खदेड़ दिया।
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ज्ञानपुर। गांव निवासी बाबा पाठक, संदीप मौर्या और नरेश कुमार यादव बताते हैं कि इन ऐतिहासिक स्थलों को सहेजे जाने की आवश्यकता है। इन्हीं खंडहरों को दिखाकर हम अपने बच्चों को बलिदानियों के शौर्य से परिचित कराते हैं। नरेश यादव बताते हैं कि गांव के नुक्कड़ पर ही हमारी दुकान है। वहीं गोदाम के गेट का पिलर है। जिसे कई बार ग्राम प्रधान की ओर से हटवाने का प्रयास किया गया, लेकिन मैंने मना कर दिया। संदीप मौर्या बताते हैं कि उन्होंने अपने दादा और पिता जी से काफी सुना है। यह नील गोदाम अंग्रेजों की बर्बरता का प्रतीक है, लेकिन यह वह निशान है। जिससे हम अपने बलिदानियों के बारे में अच्छे से जान सकते हैं। बाबा पाठक कहते हैं कि यह हमारे लिए धरोहर है। देखरेख के अभाव में खंडहर होता जा रहा है। गांव के पुरनिए आज भी नील के पेड़ों को दिखाते हैं।