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Bhadohi News: 90 दिनों में मजिस्ट्रेट से मुकदमा सेशन कोर्ट में जाएगा, वर्षों नहीं खिंचेगा केस

Mon, 01 Jul 2024 04:13 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 01 Jul 2024 04:13 AM IST
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The case from the Magistrate will go to the Sessions Court in 90 days, the case will not drag on for years
ज्ञानपुर। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता आज से लागू होने जा रही है। अब पुलिस इसी संहिता के तहत काम करेगी। इस नए बदलाव से त्वरित न्याय की संभावना व्यक्त की जा रही है। पुराने कानूनों में तकनीकी कमियों का फायदा उठाकर अपराधी मुकदमों के परीक्षण को काफी देर कराते थे। इससे कई बार तो गवाहों की भी मृत्यु हो जाती थी, जो गवाह रहते थे। समय के साथ-साथ भय या प्रलोभन से अदालत में टूट जाते थे।
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15 साल पहले एक महत्वपूर्ण निर्णय में जज ने लिखा था कि यह जानते हुए भी कि अपराध इन्हीं लोगों ने किया है। साक्ष्य के अभाव में मुझे बरी करना पड़ रहा है। अब तक गंभीर अपराधों के मुकदमों में पुलिस मजिस्ट्रेट कोर्ट में चार्जशीट भेजने के बाद आरोपियों को नकल उपलब्ध कराती थी। इसके बाद मुकदमे को सेशन कोर्ट में भेजा जाता था। जहां मुकदमों का परीक्षण होता था। औपचारिकताओं के लंबा खिंचने से वर्षों का वक्त बीत जाता था। इसका फायदा उठा कर बड़े अपराधी आसानी से बच जाते थे। जिस केस को मजिस्ट्रेट से सेशन कोर्ट भेजने में सालों का वक्त लगता था, अब नई संहिता के तहत 90 दिनों में मजिस्ट्रेट से मुकदमा सेशन कोर्ट में भेजना होगा। जहां पुरानी संहिता में आरोप तय होने की कोई समय सीमा नहीं थी। नए बदलाव के तहत वहां आरोप की पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर चार्जशीट जमा करनी होगी।
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उदाहरण से समझें

भदोही जिला कोर्ट ने हत्या का मुकदमा जो सन 1987 में हुआ था और मजिस्ट्रेट कोर्ट में 1994 में आरोप पत्र भेजा गया था। जिसमें सेशन कोर्ट में उस मुकदमों भेजे जाने में 28 वर्ष बीत गए। 26 जून 2023 को वह मुकदमा सेशन कोर्ट में भेजा गया, लेकिन वहां अभी भी आरोप तय नहीं हो सके। शायद सरकार ने ऐसे ही मुकदमों को ध्यान में रखकर यह अहम बदलाव किये हैं। (सुचिता के लिए मुकदमें का विवरण नहीं दिया जा रहा है।)
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वैज्ञानिक साक्ष्यों पर बल

सक्षम साक्ष्य के रूप में सीसी फुटेज, वीडियो रिकॉर्डिंग, वायरल वीडियो या ऑडियो रिकॉर्डिंग, कॉल डिटेल को प्राथमिक साक्ष्य माना है। इस व्यवस्था से गवाहों के मुकरने के बावजूद भी वैज्ञानिक साक्ष्य होने से अपराधी बच नहीं पायेंगे और निर्दोष को झूठी गवाही से फंसाया नहीं जा सकेगा। इलेक्ट्रानिक साक्ष्यों के बारे में तकनीकी रिपोर्ट भी पुलिस को देनी होगी।


उदाहरण से समझें

भदोही के चर्चित दुष्कर्म के केस में आरोपी पर आरोप था कि वह भदोही से दो लड़कियों का अपहरण कर पहले बंगाल ले गया और वहां दुष्कर्म किया। गवाही बाद आरोपी की कॉल डिटेल मंगाई तो सच का पता चला कि आरोपी अपहरण के दिन भदोही में था ही नहीं, तो वह अपहरण कैसे करता।

लगभग छह माह पूर्व उसे कोर्ट ने बरी कर दिया। (सुचिता के लिए मुकदमे का विवरण नहीं दिया जा रहा है।)

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अदालतों की संख्या बढ़ाने और पुलिस सुधार की भी जरूरत

बदलाव के बाद अब जल्द न्याय दिलाने के लिए अदालतों की संख्या बढ़ाने, पुलिस को आधुनिक बनाने, हर जिले में इलेक्ट्रॉनिक तकनीकी प्रयोगशाला बनाना, तकनीकी साक्ष्यों के संकलन में पुलिस को उचित व्यवस्था मुहैया कराना, अधिक से अधिक जगहों पर सीसी कैमरे लगवाने जैसी चुनौतियां होंगी। पुलिस तो एक जुलाई से ही तीनों संहिता में कार्य करेगी, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया जुड़े लोगों को कुछ वर्षों तक दोनों संहिता में काम करने होंगे।

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ये हैं कुछ अहम बातें

-पुलिस अधिकारी को मुकदमें की जांच पीड़ित को बतानी होगी।

-ईमेल या व्हाट्सअप पर भेजी जा सकेगी नोटिस।

-समयबद्ध न्याय के लिए हर प्रक्रिया की समय सीमा निश्चित होगी।

-क्षेत्राधिकार को लेकर नहीं होगा विवाद, दर्ज करनी होगी जीरो एफआईआर।

-अदालत में तारीख पर तारीख लगवाने के लिए अधिवक्ता को दो बार ही मिलेगा मौका।

-7 वर्ष से ऊपर सजा वाले अपराधों में घटनास्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग व फारेंसिंक जांच जरूरी।
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