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8.33 करोड़ के घपले में एसआईटी दर्ज कराएगी केस
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ज्ञानपुर (भदोही)। सरपतहां में सौ बेड का अस्पताल बनाने वाली कार्यदायी संस्था के अफसरों संग सभी ठेकेदारों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 8.33 करोड़ के घपले की जांच कर रही एसआईटी ने भी इसकी पुष्टि कर मुकदमा दर्ज कराने की संस्तुति की है।
स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने के लिए वर्ष 2008 में बसपा शासन में जिला मुख्यालय के सामने 14 करोड़ की लागत से सौ बेड वाले अस्पताल की योजना को स्वीकृति दी गई थी। इसके निर्माण का जिम्मा राजकीय निर्माण निगम को दिया गया। अस्पताल निर्माण के लिए कार्यदायी संस्था ने छह ठेकेदार बदले, लेकिन 11 साल बाद भी अस्पताल हैंडओवर नहीं हो सका। ज्ञानपुर विधायक विजय मिश्र के साथ ही औराई विधायक दीनानाथ भाष्कर इस मामले को सदन में भी उठा चुके हैं।
2015 में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने निर्माणाधीन अस्पताल की निजी एजेंसी से जांच कराई। उस दौरान करीब आठ करोड़ 33 लाख का घपला सामने आया था। मामले में कार्यदायी संस्था के तत्कालीन परियोजना प्रबंधक गिरजाशंकर दीक्षित, ठेकेदार रामकुमार सिंह, हंसराज सिंह, मुंशी सिंह के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कराया गया। जिन धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया गया है, उसमें सरकारी धन का गबन और आपराधिक न्यास भंग करना प्रमुख रहा। परियोजना प्रबंधक को जेल भी जाना पड़ा, हालांकि अभी वह जमानत पर हैं। 14 करोड़ की लागत वाले अस्पताल पर अब तक 18 करोड़ से अधिक रकम खर्च हो चुकी है, लेकिन अस्पताल चालू नहीं हो सका है।
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विशेष सचिव स्वास्थ्य विभाग की संस्तुति पर गृह विभाग ने जांच की जिम्मेदारी एसआईटी को सौंपी थी। दो दिन पूर्व एसआईटी ने जांच पूर्ण कर ली। जिसमें घपलेबाजी की पुष्टि हुई। एसआईटी ने मुकदमा दर्ज कराने की संस्तुति करते हुए शासन को रिपोर्ट भेज दी है। माना जा रहा है कि जल्द ही कार्यदायी संस्था के अफसरों संग काम कराने वाले ठेकेदारों पर शासन की भृकुटी टेढ़ी हो सकती है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. लक्ष्मी सिंह ने कहा एसआईटी ने रिपोर्ट शासन स्तर पर दी है। वहीं से कार्रवाई तय होगी। साल भर पूर्व जरूरी फाइलें मांगी र्गइं थीं, जिसे उपलब्ध करा दिया गया था।
कब क्या हुआ था
- 2008 में राजकीय निर्माण निगम ने शुरू किया सौ बेड वाले वाले अस्पताल का निर्माण।
- 2012 में तैयार कर देने का दिया गया था लक्ष्य, 2020 तक अपूर्ण है अस्पताल।
- 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने कराई थी निर्माण में घपले की जांच
- 8.33 करोड़ का घपला उजागर हुआ था। परियोजना प्रबंधक समेत पांच पर दर्ज हुआ केस।
- 2016 में परियोजना प्रबंधक को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
- 2019 में सदन में मामला उठने पर गृह सचिव ने एसआईटी जांच के लिए दी थी अनुमति।
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स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर करने के लिए वर्ष 2008 में बसपा शासन में जिला मुख्यालय के सामने 14 करोड़ की लागत से सौ बेड वाले अस्पताल की योजना को स्वीकृति दी गई थी। इसके निर्माण का जिम्मा राजकीय निर्माण निगम को दिया गया। अस्पताल निर्माण के लिए कार्यदायी संस्था ने छह ठेकेदार बदले, लेकिन 11 साल बाद भी अस्पताल हैंडओवर नहीं हो सका। ज्ञानपुर विधायक विजय मिश्र के साथ ही औराई विधायक दीनानाथ भाष्कर इस मामले को सदन में भी उठा चुके हैं।
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2015 में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने निर्माणाधीन अस्पताल की निजी एजेंसी से जांच कराई। उस दौरान करीब आठ करोड़ 33 लाख का घपला सामने आया था। मामले में कार्यदायी संस्था के तत्कालीन परियोजना प्रबंधक गिरजाशंकर दीक्षित, ठेकेदार रामकुमार सिंह, हंसराज सिंह, मुंशी सिंह के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कराया गया। जिन धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया गया है, उसमें सरकारी धन का गबन और आपराधिक न्यास भंग करना प्रमुख रहा। परियोजना प्रबंधक को जेल भी जाना पड़ा, हालांकि अभी वह जमानत पर हैं। 14 करोड़ की लागत वाले अस्पताल पर अब तक 18 करोड़ से अधिक रकम खर्च हो चुकी है, लेकिन अस्पताल चालू नहीं हो सका है।
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विशेष सचिव स्वास्थ्य विभाग की संस्तुति पर गृह विभाग ने जांच की जिम्मेदारी एसआईटी को सौंपी थी। दो दिन पूर्व एसआईटी ने जांच पूर्ण कर ली। जिसमें घपलेबाजी की पुष्टि हुई। एसआईटी ने मुकदमा दर्ज कराने की संस्तुति करते हुए शासन को रिपोर्ट भेज दी है। माना जा रहा है कि जल्द ही कार्यदायी संस्था के अफसरों संग काम कराने वाले ठेकेदारों पर शासन की भृकुटी टेढ़ी हो सकती है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. लक्ष्मी सिंह ने कहा एसआईटी ने रिपोर्ट शासन स्तर पर दी है। वहीं से कार्रवाई तय होगी। साल भर पूर्व जरूरी फाइलें मांगी र्गइं थीं, जिसे उपलब्ध करा दिया गया था।
कब क्या हुआ था
- 2008 में राजकीय निर्माण निगम ने शुरू किया सौ बेड वाले वाले अस्पताल का निर्माण।
- 2012 में तैयार कर देने का दिया गया था लक्ष्य, 2020 तक अपूर्ण है अस्पताल।
- 2013 में तत्कालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी ने कराई थी निर्माण में घपले की जांच
- 8.33 करोड़ का घपला उजागर हुआ था। परियोजना प्रबंधक समेत पांच पर दर्ज हुआ केस।
- 2016 में परियोजना प्रबंधक को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया।
- 2019 में सदन में मामला उठने पर गृह सचिव ने एसआईटी जांच के लिए दी थी अनुमति।