Mothers Day: 'यह बच्चा अभी मां की दुआएं ओढ़े हुए है', 65 साल की मां और बेटे की यह कहानी आपको भावुक कर देगी
जरा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये, दिये से मेरी मां मेरे लिए काजल बनाती है। छू नहीं सकती मौत भी आसानी से इसको...यह बच्चा अभी मां की दुआ ओढ़े हुए है। मशहूर शायर मुन्नवर राणा की मां पर लिखी यह बातें भदोही के एक गांव निवासी युवक पर सटीक बैठती है।
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जरा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाये, दिये से मेरी मां मेरे लिए काजल बनाती है। छू नहीं सकती मौत भी आसानी से इसको...यह बच्चा अभी मां की दुआ ओढ़े हुए है। मशहूर शायर मुन्नवर राणा की मां पर लिखी यह बातें भदोही जिले के घनश्यामपुर गांव निवासी शिवशंकर प्रजापति पर सटीक बैठती है। एक हादसे के बाद आंखों की रोशनी गवां चुके शिवशंकर की 65 वर्षीय मां उनकी आंखों की रोशनी बनी हैं। सुबह से लेकर शाम तक उनकी देखभाल करने वाली मां रमना देवी की बस एक ही चिंता है कि मेरे जाने के बाद मेरे बेटे का क्या होगा।
करीब तीन साल पहले जब घनश्याम एक हादसे का शिकार हुआ तो उसे तनिक भी यह अंदाजा नहीं था कि जीवन अब अंधेरे में बीतने वाला है। हादसे के बाद पहले बायीं फिर दायीं आंख में समस्या शुरू हुई। लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी रोशनी नहीं लौट पाई। जीवन के इस कठिन परिस्थिति में उनकी मां उनके साथ चट्टान की तरह खड़ी हैं।
शिवशंकर के दो भाई भी हैं। गरीबी ऐसी है कि वे अपनी ही गृहस्थी में परेशान रहते हैं। ऐसे में शिवशंकर की मां छोटे-मोटे काम कर न सिर्फ अपना और बच्चे का पेट भरती हैं, बल्कि पूरा दिन उनकी देखभाल भी करती हैं। उनके बेटा बैठे-बैठे परेशान न हो जाए। इसके लिए उन्हें सुबह-शाम टहलाती भी हैं।
रमना कहती हैं कि नियति ने मेरे बेटे की आंखे जरूरी छीन ली हैं, लेकिन मेरी हिम्मत नहीं छिनी है। अपनी मां के बारे में शिवशंकर उर्फ कोमल कहते हैं कि मेरी आंखों के इलाज का खर्च बहुत ज्यादा है। मेरी मां वह खर्च तो वहन नहीं कर सकती, लेकिन मैं मेरी मां की आंखों से दुनिया देखता हूं। दुख होता है कि उम्र के इस पड़ाव में जब मां का सहारा बनना चाहिए तो मैं ही इन पर बोझ बना हूं।