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आजीविका का सवाल है, जाना तो पड़ेगा
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ज्ञानपुर। लॉकडाउन में मुंबई, गुजरात समेत दूसरे शहरों से लौटे प्रवासियों की आजीविका फंस गई है। यहां न तो काम मिल रहा है ना ही परिवार का खर्च चल पा रहा है। लिहाजा जहां से आए थे, वहां फिर जाना ही पड़ेगा। ऐसा परदेश से घर लौटे प्रवासियों का मानना है। शनिवार को अमर उजाला से बातचीत में प्रवासियों ने कहा कि माहौल ठीक होगा तो फिर परदेश जाना ही पड़ेगा। वहां जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के बीच प्रवासियों को तमाम सुविधाएं देने का दावा तो शासन-प्रशासन की ओर से किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर कुछ दिख नहीं रहा। शनिवार को अमर उजाला ने कई गांवों में आए प्रवासियों से बात की तो असलियत सामने आई। सुरियावां के तालसुपैला गांव निवासी सोनू यादव का मुंबई में दवा का कारोबार है। तेजी से फैलते कोरोना वायरस को देख घर वाले परेशान हो गए। इसके कारण वह घर आ गए। कहा कि यहां कोई सुविधाएं नहीं मिलीं। भदोही के नयनपुर निवासी संजय पाल अहमदाबाद में मोबाइल कंपनी में मैनेजर हैं। लॉकडाउन के कारण घर आए। कहा कि कंपनी की ओर से बराबर संपर्क में हैं, हालांकि यहां पर कोई सुविधाएं नहीं मिली।
अवधेश कुमार मुंबई में ऑटो चालक हैं। मई के शुरुआत में परिवार लेकर घर आए। प्रशासन की ओर से सूची तो बनाई गई, लेकिन अब तक कोई सुविधा नहीं मिल सकी। कहा कि महामारी खत्म होने पर मुंबई लौटेंगे। मुंबई में टैक्सी चलाने वाले चककलूटी निवासी कल्लू यादव ने कहा कि जान है तो जहान है। कोरोना के बढ़ते ग्राफ को देखकर माह भर पूर्व वह घर आ गया। स्थिति सामान्य होने पर ही अब जाएंगे। सुरियावां के नेतानगर निवासी राजेंद्र गुप्ता सूरत के नानपुरा में दाना भुजा बेचकर परिवार चलाते थे। महामारी से वह घर आ गए। रोजगार जाने के साथ अब दो जून की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो चुका है। राशन न मिलने से पांच बच्चों की परवरिश मुश्किल हो गई है। ऐसे में परदेश लौटना मजबूरी है।
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चकचंदा निवासी राम नारायण यादव मुंबई में एक बर्तन कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन में कंपनी बंद हुई तो घर आ गए। बताया कि यहां न काम मिल रहा और न ही सुविधाएं। अभोली निवासी पंचराम मुंबई में ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार चलाते थे। लॉकडाउन में रिक्शा बेचकर घर आए। यहां पर न तो रोजगार मिला और न ही सुविधाएं। बैंक से लोन लेने के लिए चक्कर काट रहे हैं, जिससे कोई अपना नया रोजगार शुरू कर सके।
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कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के बीच प्रवासियों को तमाम सुविधाएं देने का दावा तो शासन-प्रशासन की ओर से किया जा रहा है, लेकिन धरातल पर कुछ दिख नहीं रहा। शनिवार को अमर उजाला ने कई गांवों में आए प्रवासियों से बात की तो असलियत सामने आई। सुरियावां के तालसुपैला गांव निवासी सोनू यादव का मुंबई में दवा का कारोबार है। तेजी से फैलते कोरोना वायरस को देख घर वाले परेशान हो गए। इसके कारण वह घर आ गए। कहा कि यहां कोई सुविधाएं नहीं मिलीं। भदोही के नयनपुर निवासी संजय पाल अहमदाबाद में मोबाइल कंपनी में मैनेजर हैं। लॉकडाउन के कारण घर आए। कहा कि कंपनी की ओर से बराबर संपर्क में हैं, हालांकि यहां पर कोई सुविधाएं नहीं मिली।
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अवधेश कुमार मुंबई में ऑटो चालक हैं। मई के शुरुआत में परिवार लेकर घर आए। प्रशासन की ओर से सूची तो बनाई गई, लेकिन अब तक कोई सुविधा नहीं मिल सकी। कहा कि महामारी खत्म होने पर मुंबई लौटेंगे। मुंबई में टैक्सी चलाने वाले चककलूटी निवासी कल्लू यादव ने कहा कि जान है तो जहान है। कोरोना के बढ़ते ग्राफ को देखकर माह भर पूर्व वह घर आ गया। स्थिति सामान्य होने पर ही अब जाएंगे। सुरियावां के नेतानगर निवासी राजेंद्र गुप्ता सूरत के नानपुरा में दाना भुजा बेचकर परिवार चलाते थे। महामारी से वह घर आ गए। रोजगार जाने के साथ अब दो जून की रोटी का जुगाड़ करना मुश्किल हो चुका है। राशन न मिलने से पांच बच्चों की परवरिश मुश्किल हो गई है। ऐसे में परदेश लौटना मजबूरी है।
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चकचंदा निवासी राम नारायण यादव मुंबई में एक बर्तन कंपनी में काम करते थे। लॉकडाउन में कंपनी बंद हुई तो घर आ गए। बताया कि यहां न काम मिल रहा और न ही सुविधाएं। अभोली निवासी पंचराम मुंबई में ऑटो रिक्शा चलाकर परिवार चलाते थे। लॉकडाउन में रिक्शा बेचकर घर आए। यहां पर न तो रोजगार मिला और न ही सुविधाएं। बैंक से लोन लेने के लिए चक्कर काट रहे हैं, जिससे कोई अपना नया रोजगार शुरू कर सके।