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नहीं रहे बयोबृद्ध संत उड़िया बाबा
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सीतामढ़ी। धार्मिक एवं पौराणिक स्थली सीतामढ़ी ने शनिवार को एक सच्चे संत को खो दिया है। उड़िया बाबा आश्रम के महंत 125 वर्षीय वयोवृद्ध संत वंशीधर दास जी उड़िया बाबा का देहावसान हो गया। शनिवार को दोपहर लगभग एक बजे वहसदा के लिए चिरनिद्रा में सो गए। संत उड़िया बाबा पिछले काफी समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन की खबर लगते ही आश्रम में बड़ी संख्या में भक्त आश्रम पर पहुंचने लगे। उनका पार्थिव शरीर अंतिम दर्शन के लिए आश्रम में रखा गया है, जहां रविवार को उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा।
मूल रूप से उड़ीसा के रहने वाले संत उड़िया बाबा ने सीतामढ़ी में पतित पावनी गंगा तट पर दिव्य आश्रम का निर्माण कराया और यहीं के हो गए। संतश्री के दर्शन करने के लिए देश के कोने कोने से श्रद्धालु आया करते थे। धार्मिक स्थली और आसपास के जिलों में उनके शिष्यों की भारी तादाद है। उड़िया बाबा एक सच्चे संत माने जाते थे। साथ ही वह मूर्तिकार एवं चित्रकार भी थे। उड़िया बाबा समय की बहुत कद्र करते थे और एक-एक क्षण आश्रम के कार्यों में लगाते रहते थे। वह कहते थे कि समय अमूल्य है। बीता हुआ समय जीवन में दोबारा नहीं आ सकता। मंदिर में स्थापित देवी देवताओं की मूर्तियां उन्होंने अपने हाथों से ही निर्मित की थी। आश्रम की दीवारों पर शानदार चित्रकारी की अमिट छाप छोड़ गए हैं। आश्रम में मंदिर निर्माण के साथ संस्कृत वेद विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा है। उनकी खासियत थी कि उन्होंने कभी अपना आश्रम नहीं छोड़ा और करोड़ों रुपये की लागत से मंदिर, आश्रम, विद्यालय, धर्मशाला आदि का निर्माण कराया। उड़िया बाबा आश्रम में उड़ीसा राज्य के मंदिरों की झलक भी देखने को मिलती है। उन्होंने यहां रहकर अनंत काल के लिए श्री हरिनाम संकीर्तन का अनुष्ठान शुरू कराया, जो अनवरत जारी है। आश्रम में साधु संतों एवं गरीबों आगंतुकों को रहने खाने की व्यवस्था भी वह उपलब्ध कराया करते थे।
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मूल रूप से उड़ीसा के रहने वाले संत उड़िया बाबा ने सीतामढ़ी में पतित पावनी गंगा तट पर दिव्य आश्रम का निर्माण कराया और यहीं के हो गए। संतश्री के दर्शन करने के लिए देश के कोने कोने से श्रद्धालु आया करते थे। धार्मिक स्थली और आसपास के जिलों में उनके शिष्यों की भारी तादाद है। उड़िया बाबा एक सच्चे संत माने जाते थे। साथ ही वह मूर्तिकार एवं चित्रकार भी थे। उड़िया बाबा समय की बहुत कद्र करते थे और एक-एक क्षण आश्रम के कार्यों में लगाते रहते थे। वह कहते थे कि समय अमूल्य है। बीता हुआ समय जीवन में दोबारा नहीं आ सकता। मंदिर में स्थापित देवी देवताओं की मूर्तियां उन्होंने अपने हाथों से ही निर्मित की थी। आश्रम की दीवारों पर शानदार चित्रकारी की अमिट छाप छोड़ गए हैं। आश्रम में मंदिर निर्माण के साथ संस्कृत वेद विद्यालय का निर्माण कार्य चल रहा है। उनकी खासियत थी कि उन्होंने कभी अपना आश्रम नहीं छोड़ा और करोड़ों रुपये की लागत से मंदिर, आश्रम, विद्यालय, धर्मशाला आदि का निर्माण कराया। उड़िया बाबा आश्रम में उड़ीसा राज्य के मंदिरों की झलक भी देखने को मिलती है। उन्होंने यहां रहकर अनंत काल के लिए श्री हरिनाम संकीर्तन का अनुष्ठान शुरू कराया, जो अनवरत जारी है। आश्रम में साधु संतों एवं गरीबों आगंतुकों को रहने खाने की व्यवस्था भी वह उपलब्ध कराया करते थे।
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