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क्रांतिकारियों के डर से मिर्जापुर भागे अंग्रेज सिपाही

Sun, 14 Aug 2022 12:27 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 14 Aug 2022 12:27 AM IST
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British soldiers fled to Mirzapur due to fear of revolutionaries
ज्ञानपुर। 1857 की क्रांति में कालीन नगरी ने बढ़-चढ़कहर हिस्सा लिया। जिले में बाबू झूरी सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूूंका गया। क्रांतिकारियों ने छह महीने में ही अंग्रेजी हुकूमत के नाक में दम कर दिया। तीन अंग्रेजी अफसरों का सिर कलम होने से सैकड़ों सिपाही मिर्जापुर भाग गए। फरारी के दौरान झूरी सिंह बिहार से लेकर मध्य प्रदेश तक क्रांतिकारियों संग मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई को धार देते रहे।
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ज्ञानपुर से छह किमी दूर परऊपुर मेें 21 अक्तूबर 1816 को शहीद झूरी सिंह का जन्म हुआ था। देश में जब मंगल पांडेय के नेतृत्व में क्रांति का बिगुल फूंका गया तब 28 फरवरी 1857 को अभोली में सभा की गई और नील की खेती न करने की रणनीति बनाई गई। इतिहासकार डॉ. आदित्य नारायण मिश्र ने बताया कि बाबू उदवंत सिंह, रामबक्श सिंह सहित दर्जन भर से अधिक क्रांतिकारियों की सभा के बाद तीन जून को क्रांति का बिगुल फूंका गया। नील की खेती और गोदाम दोनो जला दिया गया। यूरोपी इतिहासकार जेक्शन लिखते हैं कि 10 जून को भदोही में क्रांति ने इतनी व्यापक रूप ले लिया कि अंग्रेज सिपाही मिर्जापुर पहाड़ी की तरफ भाग गए। भंडा गांव में अंग्रेजों की ओर से नियुक्त सजावल को घायल कर दिया। डर की वजह से अंग्रेजों के नियुक्त सारे सजावल भूमिगत हो गए। अंग्रेजी हुकूमत की तरफदारी करने वाले चमचों के घरों को लूट लिया गया। उसके बाद मिर्जापुर कमिश्नर ने अंग्रेजी सेना को क्रांतिकारियों को क्रोधाग्नि में झोंकना ठीक नहीं समझा। दो दिन बाद डिप्टी कलेक्टर पीवाकर के साथ एक टुकड़ी सेना लेकर क्रांतिकारियों के घरों को लूटना शुरू किया और लगभग दर्जनों क्रांतिकारियों को घर लूटकर आग लगा दी गई। 16 जून को अंग्रेजों ने अपनी चाल बदली वहां के ज्वाइंट मजिस्ट्रेट बिलियन रिचर्ड मोर जो ने उदवंत सिंह को निमंत्रण पत्र भेजकर बुलवाया और धोखे से तीनों क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करा दिया। गोपीगंज के शाही मार्ग पर इमली के पेड़ पर फांसी पर लटका दिया गया। यह दृश्य देख लोगों का दिल दहल गया। उसके बाद उदवंत सिंह की पत्नी रत्ना सिंह ने तलवार उठा लिया और मोर का वध करने की ठान ली। उसके बाद क्रांति का नेतृत्व झूरी सिंह ने अपने हाथ ले लिया। उन्होंने साथियों से मिलकर नील गोदाम पर हमला कर जला दिया और दो अफसरों का सिर धड़ से अलग कर दिया। रिचर्ड मोर खिड़की से कूदा लेकिन झूरी सिंह ने गोदाम के पास भेड़ चरा रहे शीतल पाल को ललकारा और उसने अपनी लग्गी लगा दी। उसके बाद उसका सिर कलम कर रत्ना सिंह के पास पटक दिया। पांच जुलाई को कर्नल पी वाकर की सेना के साथ क्रांतिकारियों की जमकर मुठभेड़ हुई। उसके बाद सेना ने सदौपुर और परऊपुर के घरों में आग लगा दी। झूरी सिंह को पकड़ने के लिए ईनाम भी घोषित हो गया। युरोपीय इतिहासकार ने लिखा है झूरी सिंह को व्यापक जन समर्थन प्राप्त था। अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने शरण देकर सहायता भी दिया। 24 अगस्त को मिर्जापुर में झूरी सिंह की मुलाकात जगदीशपुर आरा बिहार के क्रांतिकारी कुंवर सिंह से हो जाती है। उनके साथ मिलकर वह दुद्धी सिंगरौली रोहतास बिहार तक व्यापक क्रांति मचा दी घोरावल थाने को लूट लिया गया। राबर्ट्सगंज की तहसील में आग लगा दी गई। 29 अगस्त को चंदेल राजपूतों ने कुंवर सिंह और झूरी सिंह का सहयोग कर दिया। 8 सितंबर को कुंवर सिंह व झूरी सिंह ने विजयगढ़ हलिया आदि व्यापक क्रांति करते हुए रीवा पहुंच गए। पांच अक्टूबर को झूरी सिंह नेपाल के पूर्वी चंपारण होते हुए चंदौली के रास्ते वाराणसी के कपसेठी के अपने ससुराल लोहराडीह पहुंचे। उनके साले ने पैसे की लालच में आकर अंग्रेज अफसरों को सूचना दे दी। मिर्जापुर जेल में बंद रहे और उन पर मुकदमा चला। अंत में औझरानाल विंध्याचल में उन्हें फांसी दे दी गई।
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स्मारक याद दिलाता है गाथा
ज्ञानपुर। शहीद झूरी सिंह प्रपौत्र रामेश्वर सिंह ने बताया कि परऊपुर में उनका शहीद स्मारक बनाया गया। 1981 में तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने उसका शिलान्यास किया। जिलाधिकारी बाबूराम यादव ने प्रतिमा लगवाई। 2019 में तत्कालीन सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त ने स्मारक स्थल का सुंदरीकरण कराया। 2020 में पूर्व विधायक रविंद्रनाथ त्रिपाठी ने वहां पर प्रकाश की व्यवस्था की, हालांकि 10 बीघे का शीतल सरोवर आज भी विकास की बाट जोह रहा है।
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