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गंगा से सटे 47 गावों में होगी जैविक खेती
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सीतामढ़ी में गंगा के किनारे हो रही औषधीय पौधों की खेती।
- फोटो : BHADOHI
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ज्ञानपुर। मोक्षदायिनी गंगा अब जैविक खेती के लिए भी वरदान बनेंगी। नमामि गंगे योजना के तहत गंगा के किनारे बसे 47 गांवों में गो आधारित जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जाएगा। पहले चरण में करीब 4700 हेक्टेयर में जैविक खेती का लक्ष्य है। इन गांवों में 30 कलस्टर बनाए जाएंगे। प्रत्येक कलस्टर पर सरकार खर्च करेगी और इसमें 50 किसान शामिल होंगे। प्रत्येक किसान जैविक खेती करेगा। किसानों को प्रशिक्षण दिया जाएगा। जैविक अनाज की बिक्री की सुविधा सरकार देगी।
किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही आधुनिक बनाने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, लेकिन गेहूं, धान सहित अन्य फसलों के बेहतर उत्पादन के लिए ज्यादातर किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का अधिक इस्तेमाल करते हैं। बारिश में पानी के साथ रासायनिक खाद और कीटनाशक गंगा में पहुंचकर जलीय जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में प्रदूषण को रोकने के लिए ही नमामि गंगे योजना के तहत अब जैविक खेती कराई जाएगी। उप निदेशक कृषि अरविंद सिंह ने कहा कि गंगा से सटे 47 गांवों में 4700 हेक्टेयर रकबे में गो-आधारित प्राकृतिक खेती की जाएगी। वहां से पैदा होने वाले बीज को बेचने के लिए संस्था का चयन किया जा चुका है। जो हर वर्ष जैविक खेती से तैयार बीज को अधिक कीमत पर खरीदेगी। इसका मकसद गोपालन को बढ़ावा देने के साथ-साथ गोबर और गोमूत्र से बनने वाली जैविक खाद के उपयोग पर जोर देना है। इससे कई तरह के फायदे होंगे।
इनसेट
किसानों को मिलेगा आधुनिक प्रशिक्षण
ज्ञानपुर। जैविक खेती करने के लिए कृषि विभाग किसानों को जागरूक करने के साथ ही प्रशिक्षण भी देगा। जैविक खेती के फायदे बताएगा। मिट्टी की जांच करेगा। खेतों की मेड़बंदी होगी, जिससे कि खेत में बाहर का पानी न आए। हर किसान हरी खाद, गोबर आदि वर्मी कंपोस्ट तैयार करेगा। खेती में गोमूत्र से बनी दवा का छिड़काव किया जाएगा। इसका खर्च सरकार वहन करेगी। रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल प्रतिबंधित रहेगा।
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इनसेट
औषधीय पौधों की खेती का लक्ष्य लड़खड़ाया
ज्ञानपुर। नमामि गंगे योजना के तहत वन विभाग ने गंगा से सटे डीघ के छेछुआ, तुलसीकला, भमौरी-शेरपुर, इनारगांव, अरता, रामदासपुर, शिवनाथपट्टी, जगापुर, सदाशिवपट्टी, गिराई, कौलापुर, बिहरोजपुर, नारेपार, बारीपुर, फुलवरिया, बनकट, गोपालापुर, त्रिभुवनपुर, कलिंजरा, गोलखरा समेत 47 गांवों में छह सौ बीघे रकबे में औषधीय पौधों की खेती का लक्ष्य तय किया था। इसमें लेमन ग्रास, पामारोजा, तुलसी, पीली सतावर, वच, कालमेघ आदि की खेती होनी थी, लेकिन सात हेक्टेयर रकबे में ही खेती हो सकी। सिंचाई की समस्या और लागत के मुकाबले कम सब्सिडी के चलते किसानों का मोह भंग हो गया।
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किसानों की आय दोगुनी करने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही आधुनिक बनाने के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, लेकिन गेहूं, धान सहित अन्य फसलों के बेहतर उत्पादन के लिए ज्यादातर किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाओं का अधिक इस्तेमाल करते हैं। बारिश में पानी के साथ रासायनिक खाद और कीटनाशक गंगा में पहुंचकर जलीय जीव-जंतुओं को नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे में प्रदूषण को रोकने के लिए ही नमामि गंगे योजना के तहत अब जैविक खेती कराई जाएगी। उप निदेशक कृषि अरविंद सिंह ने कहा कि गंगा से सटे 47 गांवों में 4700 हेक्टेयर रकबे में गो-आधारित प्राकृतिक खेती की जाएगी। वहां से पैदा होने वाले बीज को बेचने के लिए संस्था का चयन किया जा चुका है। जो हर वर्ष जैविक खेती से तैयार बीज को अधिक कीमत पर खरीदेगी। इसका मकसद गोपालन को बढ़ावा देने के साथ-साथ गोबर और गोमूत्र से बनने वाली जैविक खाद के उपयोग पर जोर देना है। इससे कई तरह के फायदे होंगे।
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किसानों को मिलेगा आधुनिक प्रशिक्षण
ज्ञानपुर। जैविक खेती करने के लिए कृषि विभाग किसानों को जागरूक करने के साथ ही प्रशिक्षण भी देगा। जैविक खेती के फायदे बताएगा। मिट्टी की जांच करेगा। खेतों की मेड़बंदी होगी, जिससे कि खेत में बाहर का पानी न आए। हर किसान हरी खाद, गोबर आदि वर्मी कंपोस्ट तैयार करेगा। खेती में गोमूत्र से बनी दवा का छिड़काव किया जाएगा। इसका खर्च सरकार वहन करेगी। रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल प्रतिबंधित रहेगा।
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औषधीय पौधों की खेती का लक्ष्य लड़खड़ाया
ज्ञानपुर। नमामि गंगे योजना के तहत वन विभाग ने गंगा से सटे डीघ के छेछुआ, तुलसीकला, भमौरी-शेरपुर, इनारगांव, अरता, रामदासपुर, शिवनाथपट्टी, जगापुर, सदाशिवपट्टी, गिराई, कौलापुर, बिहरोजपुर, नारेपार, बारीपुर, फुलवरिया, बनकट, गोपालापुर, त्रिभुवनपुर, कलिंजरा, गोलखरा समेत 47 गांवों में छह सौ बीघे रकबे में औषधीय पौधों की खेती का लक्ष्य तय किया था। इसमें लेमन ग्रास, पामारोजा, तुलसी, पीली सतावर, वच, कालमेघ आदि की खेती होनी थी, लेकिन सात हेक्टेयर रकबे में ही खेती हो सकी। सिंचाई की समस्या और लागत के मुकाबले कम सब्सिडी के चलते किसानों का मोह भंग हो गया।