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Bhadohi News: 50 साल में गंगा में समाई 2200 बीघा भूमि
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सीतामढ़ी। डीघ ब्लॉक के कोनिया क्षेत्र में गंगा के कटान का दर्द साल दर साल बढ़ रहा है, लेकिन शासन से लेकर प्रशासन तक इस मर्ज को अब तक खत्म नहीं किया गया।
इससे हर साल आने वाली बाढ़ में कई बीघे उपजाऊ जमीन गंगा में समा जाती हैं। हालत यह है कि पांच दशक में छेछुआ-भुर्रा की करीब 22 सौ बीघा जमीन कटान की भेंट चढ़ चुकी, जबकि एक गांव का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।
डीघ ब्लॉक का छेछुआ और भुर्रा गांव गंगा से तीन तरफ से घिरा है। जुलाई-अगस्त में आने वाली बाढ़ में यहां के लोगों की परेशानी बढ़ जाती है। संभावित बाढ़ के मद्देनजर प्रशासन की तरफ से व्यवस्था का दावा तो किया जाता है, लेकिन कटान रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हो सका। छेछुआ-भुर्रा गांव के किसानों की बर्बादी पांच दशक पूर्व ही शुरू हो गई थी, लेकिन 1978 की बाढ़ में कटान अधिक हुई।
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जिससे छेछुआ और भुर्रा के किसानों की लगभग दो हजार बीघे तरी और उपरवार की जमीन गंगा में समा चुकी है। दोनों गांव का रकबा 28 सौ बीघे से घटकर अब मुश्किल से 600 बीघा बचा है।
वर्ष 2022 की बाढ़ में करीब 15 से 20 बीघा जमीन गंगा में समा गई। पांच दशक पूर्व गंगा कटान ने हरिहरपुर गांव का अस्तित्व मिटा दिया। गांव में लगभग 50 से अधिक घर हुआ करता था लेकिन गंगा कटान के कारण लोग छेछुआ और भुर्रा में गंगा कटान रोकने के लिए 2021 में तीन करोड़ रुपये खर्च किया गया, लेकिन सरकार की यह व्यवस्था फेल हो गई। कटान प्रभावित छेछुआ और भुर्रा गंगा नदी में दो किलोमीटर के दायरे में जिओ टेक्सटाइल ट्यूब कटर लगवाया गया था।
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इससे हर साल आने वाली बाढ़ में कई बीघे उपजाऊ जमीन गंगा में समा जाती हैं। हालत यह है कि पांच दशक में छेछुआ-भुर्रा की करीब 22 सौ बीघा जमीन कटान की भेंट चढ़ चुकी, जबकि एक गांव का अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।
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डीघ ब्लॉक का छेछुआ और भुर्रा गांव गंगा से तीन तरफ से घिरा है। जुलाई-अगस्त में आने वाली बाढ़ में यहां के लोगों की परेशानी बढ़ जाती है। संभावित बाढ़ के मद्देनजर प्रशासन की तरफ से व्यवस्था का दावा तो किया जाता है, लेकिन कटान रोकने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं हो सका। छेछुआ-भुर्रा गांव के किसानों की बर्बादी पांच दशक पूर्व ही शुरू हो गई थी, लेकिन 1978 की बाढ़ में कटान अधिक हुई।
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जिससे छेछुआ और भुर्रा के किसानों की लगभग दो हजार बीघे तरी और उपरवार की जमीन गंगा में समा चुकी है। दोनों गांव का रकबा 28 सौ बीघे से घटकर अब मुश्किल से 600 बीघा बचा है।
वर्ष 2022 की बाढ़ में करीब 15 से 20 बीघा जमीन गंगा में समा गई। पांच दशक पूर्व गंगा कटान ने हरिहरपुर गांव का अस्तित्व मिटा दिया। गांव में लगभग 50 से अधिक घर हुआ करता था लेकिन गंगा कटान के कारण लोग छेछुआ और भुर्रा में गंगा कटान रोकने के लिए 2021 में तीन करोड़ रुपये खर्च किया गया, लेकिन सरकार की यह व्यवस्था फेल हो गई। कटान प्रभावित छेछुआ और भुर्रा गंगा नदी में दो किलोमीटर के दायरे में जिओ टेक्सटाइल ट्यूब कटर लगवाया गया था।