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सारे समीकरण ध्वस्त, वोटरों ने चुपके से दिखाई ताकत
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ज्ञानपुर। 2019 के लोकसभा चुनाव में देश में ही नहीं मोदी मैजिक से कालीन नगरी भी अछूती नहीं दिखी। सपा-बसपा गठबंधन के सारे समीकरण ध्वस्त हो गए। वोटरों ने चुपके से अपनी ताकत दिखाई और भाजपा ने सीट अपनी झोली में डाल ली। पांच साल के विकास से यादव, मुस्लिम और दलित वोटरों का गठजोड़ भी कमजोर पड़ गया। गरीब तबके के वोटरों ने मोदी को ही वोट दिया।
2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही सपा-बसपा का गठबंधन होने से सूबे में भाजपा की सीटें आधी से कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन पांच साल में हुए विकास कार्यों ने मोदी मैजिक को कायम रखा। जिले के छह ब्लॉकों में नौ हजार से अधिक प्रधानमंत्री आवास हो या डेढ़ लाख से अधिक उज्ज्वला योजना का सिलेंडर गरीब परिवार तक पहुंचा। डेढ़ लाख से अधिक बने शौचालय भी मतदाताओं के मन को बदल दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के मतों को जोड़ दिया जाए तो उस समय सांसद बने वीरेद्र सिंह मस्त से करीब 81 हजार अधिक हो जाते लेकिन 2019 के चुनाव में वीरेंद्र सिंह मस्त से अधिक मत पाकर भी गठबंधन प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र जीत दर्ज नहीं कर सके। राजनीतिक जानकार प्रभुनाथ शुक्ला की माने तो यादव, मुस्लिम और दलित समीकरण ध्वस्त हो गया। गरीब तबके के मुस्लिम और दलित वोटरों ने मोदी में दिलचस्पी दिखाई। आवास, शौचालय और गैस का असर वोटरों में दिखा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पर एअरस्ट्राइक भी मतदाताओं को भाजपा की तरफ ले गया। 2014 की तरह यादव को छोड़ कर अन्य पिछड़ों का मत भी भाजपा की तरफ ट्रांसफर हो गया। अलमऊ में पांच मई को प्रधानमंत्री की सभा होने के बाद से ही भाजपा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। जिसमें प्रत्याशी के बजाए प्रधानमंत्री खुद ही जनता के एक-एक वोट को अपने पास आने की बात कह दी थी। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रत्याशी के बजाए मोदी ही जनता के दिल और दिमाग में रहे।
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2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व ही सपा-बसपा का गठबंधन होने से सूबे में भाजपा की सीटें आधी से कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन पांच साल में हुए विकास कार्यों ने मोदी मैजिक को कायम रखा। जिले के छह ब्लॉकों में नौ हजार से अधिक प्रधानमंत्री आवास हो या डेढ़ लाख से अधिक उज्ज्वला योजना का सिलेंडर गरीब परिवार तक पहुंचा। डेढ़ लाख से अधिक बने शौचालय भी मतदाताओं के मन को बदल दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के मतों को जोड़ दिया जाए तो उस समय सांसद बने वीरेद्र सिंह मस्त से करीब 81 हजार अधिक हो जाते लेकिन 2019 के चुनाव में वीरेंद्र सिंह मस्त से अधिक मत पाकर भी गठबंधन प्रत्याशी रंगनाथ मिश्र जीत दर्ज नहीं कर सके। राजनीतिक जानकार प्रभुनाथ शुक्ला की माने तो यादव, मुस्लिम और दलित समीकरण ध्वस्त हो गया। गरीब तबके के मुस्लिम और दलित वोटरों ने मोदी में दिलचस्पी दिखाई। आवास, शौचालय और गैस का असर वोटरों में दिखा। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान पर एअरस्ट्राइक भी मतदाताओं को भाजपा की तरफ ले गया। 2014 की तरह यादव को छोड़ कर अन्य पिछड़ों का मत भी भाजपा की तरफ ट्रांसफर हो गया। अलमऊ में पांच मई को प्रधानमंत्री की सभा होने के बाद से ही भाजपा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थीं। जिसमें प्रत्याशी के बजाए प्रधानमंत्री खुद ही जनता के एक-एक वोट को अपने पास आने की बात कह दी थी। जिससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रत्याशी के बजाए मोदी ही जनता के दिल और दिमाग में रहे।
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